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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 192 में से

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पृष्ठ 143

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जाननेवाला ) इत्यादि दोषों से युक्त होता है और वेद में इस
प्रकार की बातें देखने में आती हैं, जो बिना सर्वज्ञ के नहीं हो
सकतीं, और जीव अल्पज्ञ है, इस प्रमाण से भी वेदों की नित्यता
सिद्ध हो गई। इसी विषय को और भी दृढ़ करते हैं।
नापौरुषेयत्वान्नित्यत्वमंकुरादिवत् ॥४८॥
अर्थ—वेद अपौरुषेय हैं, इसवास्ते नित्य हैं, ऐसा नहीं ;
क्योंकि अंकुर किसी पुरुष का बनाया हुआ नहीं होता, परन्तु
अनित्य होता है।
तेषामपि तद्योगे दृष्टबाधादिप्रसक्तिः ॥४९॥
अर्थ—यदि वेदों को भी बनाया हुआ माना जायगा, तो
प्रत्यक्ष जो दीखता है, उसमें दोष प्राप्त होगा। दृष्टान्त—जैसे कि
अंकुर का लगानेवाला दीखता है और उपादान कारण जो बीज है
वह भी दीखता है। इस प्रकार वेदों का बनानेवाला और
उपादान कारण नहीं दीखता है, इस कारण नित्य है। यदि नित्य
न माना जाय, तो प्रत्यक्ष से विरोध हो जायगा। वेदों को जो
अपौरुषेय कहा है, उसमें यह सन्देह होता है कि पौरुषेय किसको
कहते हैं और अपौरुषेय किसको कहते हैं ? इस सन्देह को दूर .
करने के लिये पौरुषेय का लक्षण लिखते हैं।
यस्मिन्नदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजायते तत्पौरुषे-
यम् ॥५०॥
अर्थ—जिस पदार्थ का कर्त्ता प्रत्यक्ष न हो, अर्थात् बनाने
वाला न दीखता हो, लेकिन उस पदार्थ के देखने से यह ज्ञान
हो, कि इसका बनानेवाला कोई अवश्य है ; इसका ही नाम पौरु-
षेय है। लेकिन वेदों के देखने से यह बुद्धि उत्पन्न नहीं होती,
क्योंकि वेदों की उत्पत्ति ईश्वर में मानी गई है और उन वेदों