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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

( ५२ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
आसुरिने अपने पञ्चशिख नाम शिष्यको दिया, और उस
पञ्चशिखने इस शास्त्र को बहुत विस्तृत किया तथा प्रचार
किया ॥ ७० ॥
शिष्यपरम्परयाऽऽगत मीश्वरकृष्णेनचैतदार्याभिः।
संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग् विज्ञाय सिद्धान्तम् ।७१।
इसी प्रकार शिष्य परम्परा से आये हुये इस शास्त्र को
आर्यमति (श्रेष्ठबुद्धि ईश्वरकृष्ण ने समीचीन या उत्तम प्रकार
से सिद्धान्त को जान कर आर्या छन्दोंमें संक्षेपसे कहा ॥७१॥
सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्थाः कृत्स्नस्य षष्टितन्त्रस्य ।
आख्यायिकाविरहिताः परिवादविवर्जिताश्चापि॥७२
जो अर्थ ७० आर्या छन्दोंमें कहे गये हैं वेही अर्थ सम्पूर्ण
षष्टितन्त्र या ६० पदार्थों के प्रतिपादक सांख्यशास्त्र के हैं। क्यों
कि-इसमें आख्यायिकाएं और दूसरे शास्त्रों के वाद छोड़दिये
गये हैं ॥७२॥
इति हिन्दीसांख्य दर्शनम्

सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा ( ५३ )
श्रीहरिः शरणम्
सांख्य, न्याय और वैशेषिक
दर्शन का जीवात्मा
( सांख्य )
सांख्यदर्शन में आत्मा को किस प्रकारका माना गया है,
इस प्रश्न के सम्बन्ध में जितनी बातें उस दर्शन में बताई गई
हैं या स्वीकार की गई हैं, नीचे दिखाई जाती हैं-
१
सांख्यशास्त्र के आचार्य कहते हैं कि-आत्मामें सत्व, रजस्
तथा तमोगुण नहीं है। प्रधान या प्रकृति से बिलकुल भिन्न है
न प्रकृति या उसके महत्तत्व आदि कार्यों का उसमें कोई अंश
सम्मिलित है, और न आत्मा ही का उनमें है। सर्वसाधारण
का वह विषय नहीं है, किन्तु योग सम्पन्न या तत्वज्ञ पुरुषही
उसे जान सकते हैं। चेतन है। सरूप या अपने समान तथा
अपने से विजातीय परिणाम से रहित है, अर्थात् वह किसी कार्यको
उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि-मृत्तिका घट, शराव आदि अनेक
कार्यों को उत्पन्न करती रहती है।
उपर्युक्त सब धर्म ऐसे हैं, जो प्रकृति या उसके कार्यों में
(महत्तत्व अहंकार, मन, चक्षुः, श्रोत्र, घ्राण, रसन, त्वक्, वाक्
हस्त, पाद्, गुदं, उपस्थ, (लिङ्ग या योनि) शब्द, स्पर्श, रूप,
रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी में) नहीं
रहते हैं।
१-हेतुमदनित्यमव्यापि, सक्रियमनेकममाश्रितं लिङ्गम् ।
सावयवं परतन्त्रं, व्यक्तं विपरीतमव्यक्तम् ॥ त्रिगुणमविवेकि
विषयः सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि। व्यक्तं तथा प्रधानं, तद्विप-
रीतस्तथाच पुमांन् ॥
• (सां० त० कौ० श्लोक १०, ११ )

( ५४ ) सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा
आत्मा अनेक या अनन्त हैं यह अनेकत्व धर्म व्यक्त
या प्रकृति के कार्य भूत महत्तत्वादिकोंका साधारण धर्म है।
जैसे कि—आत्मा अनन्त हैं, उसी प्रकार महत्तत्वादिक भी
सब अनन्त हैं।
अब आत्मा के वे धर्म कहे जाते हैं, जो प्रकृति या प्रधान
से मिलते हैं।
आत्माका कोई उत्पन्न करने वाला या कारण नहीं है।
इसीसे वह नित्य है। विभु अर्थात् व्यापक है, किसी स्थानमें
भी उसका अभाव नहीं है। उसमें कोई क्रिया नहीं होती।
वह किसीमें आश्रित होकर नहीं रहता। प्रधान या प्रकृति का
वह अनुमान करानेवाला भी नहीं है, जैसे-धूम, अग्निका
अनुमापक है। उसमें कोई अवयव विभाग नहीं है, जैसेकि-वस्त्र
में सूत्र तथा घटमें कपाल है। तथा आत्मा स्वतन्त्र है, अर्थात्
जैसे पुरुषका अंश उसके बेटे-पोतों में अनुवर्त्तमान होता है,
दीपक का तैल उसकी बत्तीमें आता रहता है, तथा प्रकृतिका
अंश उसके कार्य महत्तत्वमें और उसका उसके कार्य अहंकार
में पूरण होता रहता है, वैसे आत्मा में किसी वस्तु का आपूर
जो उक्त दृष्टान्तों में दिखाया गया है, नहीं होता। क्यों कि-
वह किसी से उत्पन्न नहीं होता। उक्त सब लेख का संक्षिप्त
तात्पर्यार्थ यह है कि-आत्मा शुद्ध स्फटिक के समान स्वच्छ या
निर्गुण, आकाश के समान विभु ( व्यापक ) तथा नित्य और
संख्या से अनन्त हैं।
सांख्य का लिङ्ग शरीर ।
सांख्य के मत में सृष्टि के आरम्भ काल में प्रधान या
प्रकृति एक २ आत्मा के पीछे एक २ लिङ्ग शरीर को उत्पन्न
करती है। यह लिङ्ग शरीर अव्याहत होता है, अर्थात् शिला

वाणी (६) हस्त (१०) पाद (११) गुद् (१२) उपस्थ (लिङ्ग या

सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का जीवात्मा ( ५५ )

में भी प्रवेश कर जाता है, संसार में कोई ऐसी कठोर वस्तु
नहीं है, जिस में वह प्रवेश न कर सके । सृष्टि के आरम्भ से
महाप्रलय तक बना ही रहता है । महत्तत्व (१) अहकार (२)
मन (३) चक्षुः (४) श्रोत्र (५) घ्राण (६) रसन (७) त्वक् (८)
वाणी (६) हस्त (१०) पाद (११) गुद् (१२) उपस्थ (लिङ्ग या
योनि) (१३) रूप (१४) रस (१५) गन्ध (१६) स्पर्श (१७) शब्द
(१८) इन अठारह तत्वों का समुदाय रूप है । यही लिङ्ग
शरीर पूर्व २ स्थूल शरीर को छोड़ता और नवीन २ को ग्रहण
करता है । इस लिङ्ग शरीर के विना स्थूल शरीर आत्मा के
भोग का साधन नहीं, बनता, इसी से इसकी कल्पना करनी
पड़ती है । धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य,
ऐश्वर्य और अनैश्वर्य ये आठों भाव इसी लिङ्ग शरीर में,
रहते हैं, इसीसे जन्म-मरण रूप संसार इसीको होता है, और
इसी के द्वारा इसके आत्माका होता है, जो इसके साथ सम्ब-
न्ध रखता है । वास्तव में उक्त आठों भाव, बुद्धि-जिसको मह-
त्तत्व या अन्तः करण कहते हैं,और जो लिङ्ग शरीरके अठारह
तत्वों में से एक है, उसी में रहते हैं, और उसमें रहने के
कारण ही लिङ्ग शरीर में माने जाते हैं । महाप्रलयके अनन्तर
जैसे कि-प्रधान बना रहता है नहीं रहता है किन्तु उसी प्रधान
में जिससे कि-यह सृष्टि के आरम्भ कालमें उत्पन्न होता है,
लय होजाने से ही इसे 'लिङ्ग' कहते हैं ।
मोक्ष ।
प्रकृतिका परिणाम बुद्धि है, अर्थात्-सृष्टि के आरम्भमें
प्रकृति से पहले बुद्धिही उत्पन्न होती है, इस के महत्तत्व
और अन्तःकरण ये दो नाम और हैं । सांख्य-- मतमें इसी
बुद्धिमें सुख दुःख रहते हैं, इसीके सुख दुःखोंकी छाया आत्मा

विवेक ज्ञानसे बुद्धिका नाश होजाता है, और उसके नाश के

( ५६ ) सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा
में पड़ती है, इसीसे आत्मा सुख, दुःख वाला प्रतीत होता है
इसी छायाको पुरुषका संसार समझना चाहिये । प्रकृति पुरुषके
विवेक ज्ञानसे बुद्धिका नाश होजाता है, और उसके नाश के
साथही सुख दुःखोंका भी नाश होजाता है, आत्मामें जिनकी
छाया पड़ती है, उनके न रहनेसे आत्मा भी शुद्ध रह जाता
है, इसी आत्मा की अवस्था का नाम मोक्ष है।
न्याय-वैशेषिकका आत्मा ।
न्याय व वैशेषिक दर्शनके आचार्य कहते हैं कि-आत्मा
विभु या व्यापक है ( १ ) संख्यासे अनन्त है अर्थात् कितने
आत्मा हैं, ऐसे गिना नहीं जासकता ( २ ) नित्य है, अर्थात्
भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालों में बना ही रहता
है, उसका अभाव कभी नहीं होता ( ३ ) तथा प्रतिशरीर
भिन्न होता है, एक कालमें उस का एकही शरीर से सम्बन्ध
होता है, उसीमें सुख दुःखोंका उपभोग करता रहता है, यद्यपि
वह सकल लोकों में रहता है, तो भी वह भिन्न लोकमें भी
एक समयमें दूसरे शरीर को धारण नहीं कर सकता, किन्तु
एक शरीरके नष्ट होनेके पश्चात् दूसरे शरीरको सृष्टि व महाप्रलय
के मध्यकालमें मोक्ष होनेसे पहिले अवश्य ही धारण करता है
( ४ ) यह चारों बातें सांख्यवाले भी इसी प्रकार से आत्मामें
स्वीकार करते हैं।
(१) “विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा” ( वै० ७, १, २२)
“जीवात्मा प्रति शरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च” ( तर्क सं०)
(२) “नानात्मानोव्यवस्थातः” ( व० ३, २, २० )
(३) “पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्यहर्षभयशोकसंप्रतिपत्तेः”
( न्याय द० ३, १६१ )
(४) “शरीरोत्पत्तिनिमित्तवत्संयोगोत्पत्तिनिमित्तकर्म” (न्या
य द० ३, १, ६६ )

सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का जीवात्मा ( ५७ )
इसके अतिरिक्त आत्मा में संख्या, परममहत्व-परिमाण
पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,प्रयत्न
धर्म, अधर्म, भावना-संस्कार,- जिससे कि-अनुभूत वस्तु का
कालान्तर में स्मरण होता है, ये चौदह गुण रहते हैं, किन्तु
सांख्य के समान निर्गुण नहीं है । (५)
न्याय और वैशेषिक दर्शन का मन ।
न्याय तथा वैशेषिक दर्शन में लिङ्ग शरीर की कल्पना
नहीं है, वे लिङ्ग शरीर का कार्य केवल मन से ही ले लेते हैं,
जीवन काल में तो उन के मत में सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर जो
सांख्यमत में अठारह तत्वों से बना हुआ होता है, उस का
कोई प्रयोजन नहीं है, शरीर के सब कार्य स्थूल शरीर से ही
निकल जाते हैं, किन्तु मरण के पश्चात् जब एक शरीर को
छोड़ कर दूसरे शरीर में मनको प्रवेश करना पड़ता है, अथवा
स्वर्ग तथा नरक में दूर देश में वहां के शरीर में प्रवेश करनेके
लिये उसे जाना पड़ता है, उस काल में एक सूक्ष्म शरीर की
उत्पत्ति मानते हैं, जिसका नाम प्रशस्तपादाचार्य जो वैशेषिक
दर्शन के भाष्यकार हैं “ अतिवाहित ” बताते हैं, इस शरीर
की उत्पत्ति के मानने की आवश्यकता इन्हें इस लिए हुई कि
सृष्टि के आरम्भ से महाप्रलय पर्य्यन्त शरीर में प्रवेश करकेही
मन कार्य करता है। विना शरीर के सृष्टिकालमें कार्य कर्त्ता
हुआ नहीं देखा जाता है ।
उस काल में भी इस अतिवाहिक शरीर की कल्पना
प्रशस्तपादाचार्य के वचन से ही प्रतीत होती है सूत्रकार केवल
मनकी ही गति कहते हैं ।
( ५ )“तस्यगुणाः बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म संस्कार
संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः” ( प्रशस्तपाद-भाष्य म् )

( ५८ ) सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा
मरणानन्तर मन में क्रिया तथा अतिवाहित शरीर की
उत्पत्ति अदृष्ट वश से होती है । जीवनकाल में पहिले आत्मा
में कोई प्रकार की इच्छा या द्वेष उत्पन्न होकर, प्रयत्न उत्प
न्न होता है, उसकी सहायताकी लिये हुए आत्मा और मनका
संयोग होता है, उसी से फिर नेत्र तथा श्रोत्र आदि इन्द्रियों
के साथ संयोग होने के लिये मन में क्रिया होती है, क्यों कि-
जैसा अभिप्राय होता है, उसी के अनुसार अन्य इन्द्रियों से
विषयों, (रूपरसादिकों) का ज्ञान होता है । स्वतंत्रता से
कोई इन्द्रिय किसी वस्तु के ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर सकता
इसी लिये आत्मा और चक्षुः आदि इन्द्रियों के बीच में मन
के सम्बन्ध की कल्पना करनी पड़ती है । क्यों कि-आत्मा
व्यापक होने से सदा ही सब इन्द्रियों से सम्बन्ध रखता है,
यदि बीच में कोई अन्य वस्तु न हो तो सब इन्द्रियोंसे दर्शन
आस्वादन आदि कार्य एक ही काल में हो जावें, किन्तु ऐसा
होता नहीं है ॥
न्याय-वैशेषिक दोनों दर्शनों में मनके अतिरिक्त अन्य
चक्षु आदि सब इन्द्रिय शरीर के साथ ही उत्पन्न होते हैं,
और उसके नाशके साथ नष्ट होजाते हैं । केवल मनही आत्मा
का निरन्तर साथदेता रहताहै जब तककि-महाप्रलय न हो ।
महाप्रलयके अनन्तर फिर सृष्टिके आरम्भसे पहिले निस्त-
ब्ध (निश्चेष्ट) जैसा रहता है, जब सृष्टि का आरम्भ काल
आताहै अदृष्ट (धर्म, अधर्म) के अनुसार उसमें क्रिया होने
लगती है, जिसके कारण वह उस समयमें नवीन उत्पन्न हुए
शरीरमें जा प्रवेश करताहै । सृष्टिके आरम्भकालमें सब आत्मा-
ओंके लिए जैसा २ अदृष्ट हो अलग २ शरीर उत्पन्न हो जाते
हैं, और प्रत्येक आत्माओंके जो भिन्न २ मन हैं, वे उस उस

तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ५६ )
के शरीरमें प्रवेश कर लेते हैं। उसी समयसे फिर सब जीवात्मा
अपने २ धर्म व अधर्मके अनुसार सुख दुःखोंको भोगने लगते हैं
न्या० वै० सोक्त ।
जब पुरुष ईश्वरार्पण बुद्धिसे निषिद्ध वर्जित कर्मोंका
अनुष्ठान करता है, जिससे कि-फिर कोई नवीन सुख दुःखका
बीज उसके आत्मा में उत्पन्न नहीं होता, और पूर्व संचित
पाप पुण्यकी थैली भोगते २ खाली हो जाती है, उसी समय
जीव का बन्धन टूट जाता है अर्थात् उसके पीछे जो परमाणु
रूप मनका अदृष्टकारित सम्बन्ध लगा हुआ है, टूट जाता है,
और जीव मुक्त हो जाता है। उस समय मन भी जड़ता को
धारण कर लेता है आत्मा के साथ किसी प्रकारके कार्य करने
की उसमें शक्ति नहीं रहती ।
सांख्य, न्याय और वैशेषिक
तीनों दर्शनोंकेतात्पर्यका उद्घाटन
तीनों दर्शनोंके मतमें आत्मा नाना और विभुहै, अन्य२
आत्मा के विशेषणों में न्याय और वैशेषिक दर्शन दोनों समान
विचार हैं, किन्तु सांख्य प्रायः उनसे पृथक् मार्ग पर चलता है।
जिन बातोंमें उक्त दोनों पक्ष विभिन्न मत हैं, उनके सम्बन्ध
में पहिले लिखा जा चुका है, अब उनके तुल्य सिद्धान्तों के
अवलम्बन पर सम्मिलित भाव प्रकाशित किया जाता है।
ये तीनोंही दर्शनकार आत्मा को संख्यासे अनन्त और
परिमाण से परम महान् समझते हैं। जितने जीवात्मा हैं,
सभी आकाश तथा परमात्मा के समान व्यापक हैं, जिस प्रकार
आकाश का अनुमान मात्र होता है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा
भी अनुमान से ही निश्चित होता है, किन्तु प्रत्यक्ष प्रमाण का
गोचर नहीं है । व्यापक होनेसे आत्मा चल फिर नहीं सकता

(६०) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन ।
जो कुछ चलना फिरना होता है, वह सब शरीरों का है। मृत्यु
के समय में भी आत्मा शरीर को छोड़ नहीं सकता । शरीर
का छोड़ना तथा ग्रहण करना मन या सूक्ष्म शरीर का कार्य है
स्वर्ग और नरकं में मन या लिङ्ग शरीर ही आता जाता रहता
है, आत्मा व्यापक होनेसे सदा ही स्वर्ग व नरक आदि सकल
स्थानों में रहता ही है, सर्व काल में सब स्थानों में रहने पर
भी सब स्थानों के सुख दुःखों को नहीं भोगता, किन्तु जहां उस
का मन या लिङ्ग शरीर चला जाता है, वहीं सुख दुःखों को
भोगता है सब स्थानों मे आत्मा अज्ञान शून्य रहता है, किन्तु
उसका मन जितने आत्मा को आकलित या व्याप्त कर लेता
है उतने ही आत्म देश में ज्ञान रहता है मन परिमाण से
अत्यन्त सूक्ष्म अथवा परमाणु रूप है वह कुछ बड़ा नहीं है उस
परमाणु रूप मन के देश में ही जहां वह रहे या चला जाय,
वहीं जितना आत्मा परमाणु परिमाण है, सुख दुःखों का अनु-
भव करता है, उस स्थान के अतिरिक्त अन्य सब विश्वव्यापी
आत्मा सदा मुक्त तथा जड़ रूपसे अविशिष्ट रहता है, मानों
एक मच्छर ने महाकाश को बद्ध कर रक्खा है, मच्छरके भीतर
महाकाश के एक सूक्ष्म भाग के आजाने से महाकाश बद्ध हो
जाता है, किन्तु उसके अतिरिक्त उस जगद्व्यापी महाकाशके
मुक्त महाभाग से मुक्त नहीं, ऐसी ही सूक्ष्म शरीर या मन के
कारण विभु आत्मा की शोच्य अवस्था है, संसारावस्था में
जीवात्मा का यह वृत्तान्त है, मुक्तावस्था में समीप २ तीनों
ही दर्शनों के मतमें संसारावस्था के समान जीवात्मा का (१)
मन से संयोग नहीं छूटता, क्यों कि नित्य और परमाणु रूप
होने से वह विभु आत्मा से बाहर जावे भी कहां? केवल उस
के अदृष्टकृत सम्बन्ध का अभाव मात्र होता है प्रयोजन यह
१-सांख्य के सत्कार्यवाद के अनुसार अव्यक्त रूपमें है ।

तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ६१ )

है कि-पहिले के समान आत्मा के अन्तर्गत रह कर भी मन
उससे उदासीन होजाता है, पहिले उस महान् आत्माके किसी
एक स्थान में सुख दुःखोंका कांटा या मच्छर सा लड़ता रहता
था, किन्तु अब वह लड़ना बन्ध होगया मुक्तावस्था से पहिले
भी सूक्ष्म शरीर के मच्छर से अन्य स्थल में ज्ज्ञान शून्य होने
के कारण आत्मा मुक्त के अविशेष ही था, अब केवल उसके
महत् स्वरूप में मच्छर का खटका ही कम हुआ है, आत्मा
में कुछ चेतनपना है, तो यही है कि मुक्तावस्था से पहिले
संसार दशा में मनके सम्बन्धसे उसे एक परमाणु देशमें ज्ज्ञान
होता है, ऐसी चेतनता उसके मनोरूप छोटे से घर के भीतर
ही रहती है, उस के बाहर आकाश से विशिष्ट उस में कोई
अधिक महत्वकी बात नहीं है, जिस प्रकार कोई मनुष्य पुष्पों
की गठरी को शिर पर रखकर जहां ले जाता है वहीं गठरी के
भीतर रहते हुये पुष्प चले जाते हैं, उसी प्रकार मन या लिङ्ग
जहां चलता रहता है, उसी के अन्तर्देश में बुद्धि, सुख, दुःख
आदि धर्म भी रहते हुए खिसकते रहते हैं, जैसे २ शरीर गति
के अनुसार एक देश से दूसरे देश में जाता है, वैसेही वैसे आ-
काश के समान पिछला २ आत्मा का भाग पीछे रहता जाता
है, और आगे २ का आत्मभाग शरीर में आता जाता है,
जिस प्रकार शरीर में सदा ही पूर्व २ का वायु निकलता रहता
है, और नवीन २ भरता रहता है, वही व्यवस्था शरीर की
गति के साथ शरीर में आत्म-भाग के सम्बन्ध की है ।
मोक्षावस्था में जब तत्व-ज्ज्ञान होता है, जिस से कि-
उससे उस मनोरूप मच्छर का सम्बन्ध टूटेगा उसी आत्मदेश
में तत्वज्ज्ञान नहीं होता जिसमें कि-पहिले अज्ञान था,
अर्थात् शरीर में निरन्तर आत्मदेशके परिवर्त्तन की धारा उस

[Page-header] (६२) तीनों दर्शनके तात्पर्यका उद्घाटन ।
की गतिके अनुसार अविच्छिन्न ही रहती है, जिस आत्मदेश
को "मैं शरीरी हूं" "मैं सुखी हूं" "मैं दुःखी हूं" ऐसा
ज्ञान होता है, उसी में "मैं अशरीरी हूं" "मैं सुख दुःख
रहित तथा विभू हूं" ऐसा ज्ञान नहीं होता, सर्वथा अन्य
आत्मदेशमें अज्ञान और अन्यही आत्मदेशमें ज्ञान उत्पन्न
होता, अन्य ही देश बद्ध और अन्य ही मुक्त होता है ।
सम्पूर्ण आत्मा में बंधन तथा मोक्षका प्रभाव नहीं पड़ता ।
क्योंकि मनोदेश के अतिरिक्त देशमें आत्मा को न ज्ञान होता
है, और न सुख दुःख आदि की प्रतीति होती है, इसी से वह
अन्य देश में मुक्त ही रहता है ।
सब शरीरों में सभी आत्मा रहते हैं, तथा उनके वहां
रहने में किसी की अपेक्षा किसीमें विशेष नहीं है, देवदत्त के
शरीर में जिस प्रकार देवदत्त का आत्मा रहता है उसी प्रकार
अन्य सम्पूर्ण आत्मा रहते हैं, किन्तु देवदत्त के मन के संयोग
से देवदत्त के आत्माको ही ज्ञान होता है, अन्य सब आत्मा
जो वहां उसके समान ही रहते हैं, उन्हें किसी प्रकारका बोध
नहीं होता, जैसे आकाश कदाचित् संख्या से अनन्त हों, और
वे सब मिल कर एक हो सकते हैं, इसी प्रकार सब आत्माभी
मिल कर एकीभाव से रहते हैं, उनके विभाग का करने वाला
कोई अन्य पदार्थ इन शास्त्रों में कल्पित नहीं है कि-जिसके
मध्य में पड़ने से सब आत्मा परस्पर भिन्न रहें । विभु;आत्मा
के भेद के स्वीकार करने में इन्हें यही आवश्यकता थी कि
यदि एक ही आत्मा रहा तो एक के मुक्त होने पर सब जीव
मुक्त होजांयगे, अर्थात्-संसार में कोई न कोई मुक्त होते ही
सब संसार ही लय हो जायगा, सब संसार का एक दम नष्ट

तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । (६३)
होना तथा कभी कोई एक आत्मा मुक्त न हो ये दोनोंही बातें
इनको स्वीकृत नहीं हैं ।
दूसरी बात यह है कि-एकही आत्मा रहे तो सभी
जीवोंको एक के सुखी या दुःखी होनेपर सुखी या दुःखी होना
पड़ेगा, किन्तु ऐसा नहीं होता है, इस लिए नाना आत्मा
मानना आवश्यक है ।
आत्माको विभु या व्यापक इसलिए मानते हैं कि-यदि
विभु न हो, किन्तु परमाणु रूप ही हो तो शरीरके सर्व देशोंमें
कण्टकादि वेधसे दुःख और अनुकूल द्रव्यके संयोग से सुखकी
प्रतीति होती है, यह दोनों बातें न होंगी, किन्तु नाना आ-
त्मा जब विभु हैं तो वे तत्वतः अलग २ किस रीति पर सिद्ध
होंगे या ख्यालमें आवेंगे, इस बातकी अधिक चिन्ता नहीं की ।
व्यापक आत्माके जन्म, मरण बन्ध, मोक्ष तथा स्वर्ग,
नरकआदि लोकोंमें गमन की व्यवस्था कर ली है, जैसेकि-पहिले
दिखाई जाचुकी है ।
शरीरके बराबर विभुत्व (व्यापकत्व) मानने में शरीर
की वृद्धि व ह्रासके साथ आत्माकी भी वृद्धि तथा ह्रास मानना
होगा, जिससे आत्माकी अनित्यता आती है, इसलिए पूर्ण
रूपसे आकाशके समान आत्माको विभु मानने को ये बाध्य
होते हैं ।
शुभ, अशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाले धर्म-अधर्म, जिन
से आत्माओंको स्वर्ग और नरक आदि का भोग होता है, वे
सब नित्य सम्बंध से आत्मा में ही रहते हैं ।
जिस आत्माके शरीर द्वारा कर्मों का अनुष्ठान होता है,
उनसे होनेवाला अदृष्ट (धर्म-अधर्म) उसी आत्मामें रहता है,
और उस का परिपाक होने पर उसी आत्मा को उसके फलो-

( ६४ ) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्‍घाटन
कीय ( जो उस लोकमें उत्पन्न हुआ है-) शरीर के द्वारा उस
के स्वर्ग नरक आदि रूप फलोंका उपभोग होता है ।
सब आत्माओंके समान देश होने परभी लिङ्ग या स्थूल
शरीर किसी एकही आत्मासे सम्बन्ध किस प्रकार करता है ?
और किस रीति पर भिन्न २ शरीर पृथक् २ आत्माओंको
कृतकर्म या कर्म सम्बंधी बना देते हैं ? तथा किस चाल पर
अलग २ आत्मा, फलों का उपभोग कर लेते हैं ? इन विचित्र
प्रश्नोंका उत्तर यही देते हैं कि-पृथक् २ मनों या लिङ्ग शरी-
रोंका सम्बन्ध, पृथक् आत्माओंके साथ अनादि कालसे चला
आता है,एक मन या लिङ्ग शरीरका सभी आत्माओंसे समान
रूप से संयोग होने परभी अपने आत्मा से उसका विलक्षण
सम्बंध है, उसी के कारण उसके द्वारा अपने ही नियत आत्म-
मा को फलोपभोग करता है,अन्य आत्माभी उसी प्रकार से
भिन्न २ देशीय अपने २ लिङ्ग शरीरोंके द्वारा उपभोग करते हैं
मोक्षके पश्चात् लिङ्ग शरीरका नाश होजाता है, उसकी
स्थिति का काल आत्माको संसारके सम्बन्धके आरम्भसे मोक्ष
होने तक ही है, नैयायिक तथा वैशेषिक दर्शनके मतमें मन
नित्य है, और सब इन्द्रिय अनित्य हैं, इस कारण मोक्षके
अनन्तर मन निष्फलही उड़ता फिरता है, और अमुक्त आत्मा
बहुत हैं, किन्तु उनके प्रति नियत मन पृथक् २ हैं, इसलिए
उनके साथ उस अनाथ मनका उपयोग नहीं ।
उसका नाश इसलिए नहीं मानते कि-उनके मतमें पर-
माणु रूप सब द्रव्य नित्य हैं उनका नाश नहीं होता है । यही
सिद्धान्त मनके नाश माननेमें गले पड़कर उन्हें उसके नाश
मानने से हटा देता है ।
सांख्यने न्याय वैशेषिक के समान आत्मामें ऽज्ञान, इच्छा,

तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ६५ )
प्रयत्न, सुख, दुःख, द्वेष, तथा धर्म अधर्म साक्षात् सम्बन्ध से
स्वीकार न कर उसको शुद्ध स्फटिक पाषाण के समान स्वच्छ
या निर्गुण माना है, उस में ज्ञानादि गुणों का सम्बन्ध
ऐसा स्वीकार किया है, जैसा कि-लाल पुष्प पर काच या स्फ-
टिक धरनेसे उसमें साक्षात् जैसा लाल रङ्ग प्रतीत होने लगता
है, किन्तु वास्तविक नहीं, परमार्थतः- उनके मतमें अन्तःकरण
में ही उक्त सब गुण रहते हैं, उससे वह अन्य दोनों दर्शनों में
जो कई एक झंझट उपस्थित हो जाते हैं, उनसे बच जाता है
उनके मत में आत्मा में ज्ञानादि गुण मनके साथ इस प्रकार
चलते रहते हैं, जैसे-किसी सूत्र में कोई जलका बिन्दु हो, और
उस पर उसी सूत्र में मणिक या गोली पोई (प्रोत) हुई हो,
जिसके चलाने से सूत्र के भीतर रह करभी वह जलविन्दु गोली
के साथ सरकता रहे, किन्तु पीछे या अन्यत्र नहीं रहता, इस
चाल पर वह विन्दु सूत्र और गोली दोनों के ही भीतर रहा
हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि-गोली के भीतर सूत्र और सूत्र
में विन्दु है। परन्तु सांख्यवालों ने समझा कि-“जब गोली के
भी भीतर है, और उसके गमनके साथ ही वह चलता है तथा
उससे अतिरिक्त वह कहीं मिलता भी नहीं” तो उसको उस
सूत्र का धर्म न मानकर उस गोली का ही धर्म क्यों न माना
जावे? तथा जिस आत्म देश में पहिले किसी वस्तुका अनुभव
उत्पन्न होकर उससे उत्पन्न हुए भावना संस्कार के द्वारा जो
फिर उसी वस्तुका स्मरण होता है, वह आत्मा के देशान्तर में
ही होता है, जहां स्मरण काल में उसका लिङ्ग शरीर रहे, उसी
प्रकार लिङ्ग शरीर के देशमें आत्मा ज्ञानवान् है और अन्य
देश में ज्ञान शून्य, यह द्विविध भाव भी सांख्योंको मानना

( ६६ ) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन
न होगा, क्यों कि-यह एकान्त रूपसे ज्ञानादि गुणोंको अन्तः-
करण सम्बन्धी मान कर आत्मा को निर्गुणमात्र कहते हैं, सब
देश में आत्मा एकसा होने से द्वैविध्य नहीं आता है।
(विद्यामार्तण्ड )
सीताराम शर्मा शास्त्री ।

यह निबन्ध "सारस्वत" अलीगढ़ के भाग ५ अङ्क २-३
में प्रकाशित हो चुका है।

The University Library,
ALLAHABAD
──────
Accession No. 57148
Section No. 120 / 5
(Form No. 30.)