सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 81 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा
आत्मा अनेक या अनन्त हैं यह अनेकत्व धर्म व्यक्त
या प्रकृति के कार्य भूत महत्तत्वादिकोंका साधारण धर्म है।
जैसे कि—आत्मा अनन्त हैं, उसी प्रकार महत्तत्वादिक भी
सब अनन्त हैं।
अब आत्मा के वे धर्म कहे जाते हैं, जो प्रकृति या प्रधान
से मिलते हैं।
आत्माका कोई उत्पन्न करने वाला या कारण नहीं है।
इसीसे वह नित्य है। विभु अर्थात् व्यापक है, किसी स्थानमें
भी उसका अभाव नहीं है। उसमें कोई क्रिया नहीं होती।
वह किसीमें आश्रित होकर नहीं रहता। प्रधान या प्रकृति का
वह अनुमान करानेवाला भी नहीं है, जैसे-धूम, अग्निका
अनुमापक है। उसमें कोई अवयव विभाग नहीं है, जैसेकि-वस्त्र
में सूत्र तथा घटमें कपाल है। तथा आत्मा स्वतन्त्र है, अर्थात्
जैसे पुरुषका अंश उसके बेटे-पोतों में अनुवर्त्तमान होता है,
दीपक का तैल उसकी बत्तीमें आता रहता है, तथा प्रकृतिका
अंश उसके कार्य महत्तत्वमें और उसका उसके कार्य अहंकार
में पूरण होता रहता है, वैसे आत्मा में किसी वस्तु का आपूर
जो उक्त दृष्टान्तों में दिखाया गया है, नहीं होता। क्यों कि-
वह किसी से उत्पन्न नहीं होता। उक्त सब लेख का संक्षिप्त
तात्पर्यार्थ यह है कि-आत्मा शुद्ध स्फटिक के समान स्वच्छ या
निर्गुण, आकाश के समान विभु ( व्यापक ) तथा नित्य और
संख्या से अनन्त हैं।
सांख्य का लिङ्ग शरीर ।
सांख्य के मत में सृष्टि के आरम्भ काल में प्रधान या
प्रकृति एक २ आत्मा के पीछे एक २ लिङ्ग शरीर को उत्पन्न
करती है। यह लिङ्ग शरीर अव्याहत होता है, अर्थात् शिला