सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 81 में से
संदर्भ में पढ़ेंसांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का जीवात्मा ( ५७ )
इसके अतिरिक्त आत्मा में संख्या, परममहत्व-परिमाण
पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,प्रयत्न
धर्म, अधर्म, भावना-संस्कार,- जिससे कि-अनुभूत वस्तु का
कालान्तर में स्मरण होता है, ये चौदह गुण रहते हैं, किन्तु
सांख्य के समान निर्गुण नहीं है । (५)
न्याय और वैशेषिक दर्शन का मन ।
न्याय तथा वैशेषिक दर्शन में लिङ्ग शरीर की कल्पना
नहीं है, वे लिङ्ग शरीर का कार्य केवल मन से ही ले लेते हैं,
जीवन काल में तो उन के मत में सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर जो
सांख्यमत में अठारह तत्वों से बना हुआ होता है, उस का
कोई प्रयोजन नहीं है, शरीर के सब कार्य स्थूल शरीर से ही
निकल जाते हैं, किन्तु मरण के पश्चात् जब एक शरीर को
छोड़ कर दूसरे शरीर में मनको प्रवेश करना पड़ता है, अथवा
स्वर्ग तथा नरक में दूर देश में वहां के शरीर में प्रवेश करनेके
लिये उसे जाना पड़ता है, उस काल में एक सूक्ष्म शरीर की
उत्पत्ति मानते हैं, जिसका नाम प्रशस्तपादाचार्य जो वैशेषिक
दर्शन के भाष्यकार हैं “ अतिवाहित ” बताते हैं, इस शरीर
की उत्पत्ति के मानने की आवश्यकता इन्हें इस लिए हुई कि
सृष्टि के आरम्भ से महाप्रलय पर्य्यन्त शरीर में प्रवेश करकेही
मन कार्य करता है। विना शरीर के सृष्टिकालमें कार्य कर्त्ता
हुआ नहीं देखा जाता है ।
उस काल में भी इस अतिवाहिक शरीर की कल्पना
प्रशस्तपादाचार्य के वचन से ही प्रतीत होती है सूत्रकार केवल
मनकी ही गति कहते हैं ।
( ५ )“तस्यगुणाः बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म संस्कार
संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः” ( प्रशस्तपाद-भाष्य म् )