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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

( ३२ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
लिङ्ग शरीर सृष्टि के आदि काल में प्रधान से प्रतिपुरुष
अलग २ उत्पन्न किया गया है । असक्त है, अर्थात्-शिलामें भी
प्रवेश कर जाता है । नियत या महाप्रलय तक ठहरने वाला है
१-महत्तत्व १-अहंकार १-मन ५-ज्ञानेन्द्रियें ५-कर्मेन्द्रियें और
५ तन्मात्र कुल १८ तत्वों का समूहरूप है । षाट्कौशिक ( ६
कोशों के समूहरूप ) स्थूल शरीरके बिना अकेला भोगका स्थान
नहीं बन सकता, और धर्म अधर्म आदि ८ भावों की वासना
से युक्त होनेके कारण संसरण करता है ( पूर्व २ शरीरको छोड़र
कर नये २ शरीरकी धारण करता है) ॥ ४० ॥
लिङ्ग शरीर को स्थूल शरीर की अपेक्षा ।
चित्रंयथाश्रयमृते स्थाण्वादिभ्योविनायथाच्छाया।
तद्वद् विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥४१॥
जिस प्रकार आश्रय (दीवार आदि) के बिना और छाया
वृक्ष आदि के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार स्थूल शरीर
के विना लिङ्ग शरीर नहीं रहता ( यहां तक कि-मृत्युके पश्चात्
दूसरे शरीर के ग्रहण करने से पहिले उस अवान्तर में भी
तात्कालिक अदृष्टनिर्मित एक पाञ्चभौतिक शरीर उसे मिल
जाता है सर्वथा वह निराश्रय नहीं रहता) ॥४१॥
लिङ्ग शरीर की संसृति का प्रकार और कारण ।
पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसंगेन ।
प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद्व्यवतिष्ठतेलिङ्गम् ॥४२॥
पुरुषार्थ (जीवों के अदृष्ट) की प्रेरणा से युक्त होकर यह
लिङ्ग शरीर धर्म, अधर्म और षाट्कौशिक शरीर के सम्बन्धसे
नटके समान नानारूप ( मनुष्यदेव तिर्यक्रूप) से व्यव-
स्थित होता है । प्रकृतिके विभुत्व (महिमा) से उसे विलक्ष-

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३३ )
कार शरीरों की दुर्लभता नहीं है ॥४२॥
निमित्त और नैमित्तिक का विभाग ।
सांसिद्धिकाश्चभावाःप्राकृतिकावैकृताश्चधर्माद्या ।
दृष्टाःकरणाश्रयिणः कार्याश्रयिणश्चकललाद्याः॥४३॥
धर्म आदि भाव दो प्रकार के होते हैं, प्राकृतिक और
वैकृतिक । प्राकृतिक सांसिद्धिक या स्वाभाविक कहे जाते हैं
जैसे-सृष्टिके आदि कालमें भगवान् कपिलदेव महामुनि जन्म
से ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य युक्त प्रकट हुये । इन
में धर्म आदि जो भाव थे वे स्वाभाविक थे । और जो किसी
देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न होते हैं, वे वैकृ-
तिक असांसिद्धिक या अस्वाभाविक कहे जाते हैं । जैसे-प्राचेतस
आदि महर्षियोंको धर्म आदिकी प्राप्तिहुई । ये भाव करणों में
या इन्द्रियसम्मूहरूप लिङ्ग शरीर में रहते हैं ॥ षाट्कौशिक
शरीर की गर्भ में कलल, बुद्बुद, मांस-पेशी, अङ्ग प्रत्यङ्ग व्यूह
आदि अवस्थायें होतीहैं । तथा गर्भसे बाहर निकले हुये स्थल
शरीर की बाल्य, कौमार, यौवन और बुढापा अवस्थाएं होती
हैं । ( भावोंका विभाग निमित्त विभाग है और शरीरों का
विभाग नैमित्तिक विभाग है )
गौड़पाद यहां भावों के तीन भेद मानते हैं-सांसिद्धिक,
प्राकृत, और वैकृत । इनके उदाहरण में आदि विद्वान् कपिल
सनकादि और अस्मदादि हैं इस मतमें सांसिद्धिक स्वाभाविक
प्राकृत देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न और वैकृत
अध्ययन से उत्पन्न हैं ॥४३॥
किस निमित्त का कौन नैमित्तिक है ।
धर्मेणगमनमूर्ध्वंगमनमधस्ताद्भवत्यधर्मेण ।

( ३४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
ज्ञानेनचापवर्गो विपर्ययादिष्यतेबन्धः ॥४४॥
धर्म से ऊर्ध्वगमन ( स्वर्ग आदि की प्राप्ति ) अधर्म से
अधोगति ( नरक आदि दुःख की प्राप्ति ) ज्ञान से अपवर्ग
( मोक्ष ) और अज्ञान से बन्धन ( संसार ) माना . गया
है ॥ ४४ ॥
वैराग्यात्प्रकृतिलयःसंसारो भवति राजसाद्रागात्।
ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः ॥४५॥
जिनको आत्मज्ञान नहीं हुआ और उन्हें पहिले ही इस
लोक तथा परलोक के सुख में वितृष्णा ( अनिच्छा ) हो गई
तथा वे प्रकृति या उसके कार्य महत्तत्त्व आदि में ही आत्म
बुद्धि करके उनकी उपासना करते हैं, उनका उनकी उपासना
के अनुसार प्रकृति आदिमें लय हो जाता है और फिर संसार
में आगमन होजाता है राजस राग से संसार होता है। ऐश्वर्य
से इच्छा का अविघात होता है, अर्थात् जिस वस्तु की इच्छा
करता है उसे वही मिल जाती है । एवम् अनैश्वर्य से इच्छा
का विघात होता है, जिस वस्तु की इच्छा करता है वह उसे
नहीं मिलती ॥ ४५ ॥
फल सहित आठ भाव ।
( का० ४४-४५ )
निमित्त नैमित्तिक निमित्त नैमित्तिक
१ धर्म से ऊर्ध्वगमन ५ वैराग्यसे प्रकृतिलय ।
२ अधर्म से अधोगति । ६ अवैराग्य से संसार
३ ज्ञान से मोक्ष ७ ऐश्वर्य से इच्छानभि
४ अज्ञान से बन्धन । घात

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३५ )
निमित्त नैमित्तिक
अनैश्वर्य से सर्वत्र इच्छा का विघात
बन्ध चित्र का० ४४-४५

बन्धअधिकारीफलकालव्यवस्था
प्राकृतॐ प्रकृति का उपासकप्रकृतिलयएककल्पॐ प्रकृति को आत्म बुद्धि से उपासना करने वाला
वैइन्द्रिय में आत्मबुद्धि से चिन्तन करने वालाविगतज्वरतादश मन्वन्तर
काबुद्धिको आत्मबुद्धि से उपासना करनेवालाबुद्धिमेंलय१० सहस्र
रिअहंकार को आत्मबुद्धि से उपासना करने वालाअहंकार में लय१ सहस्र
कपृथिवीआदि भूतोंमें आत्मबुद्धि सेउपासकभूतलय१००
दाक्षिणिकइष्टापूर्तकारी (यज्ञानुष्ठानकारी)स्वर्गविधि कहा गयाकाल
(८)ईश्वरापर्ण बुद्धि से इष्टापूर्तकारीक्रममुक्तिक्रम यह है कि- पहिले निष्काम कर्म, फिर उससे अन्तःकरणशुद्धि, फिर तत्त्वज्ञान, फिर मोक्ष ।

( ३६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
बुद्धि का संक्षिप्त सर्ग ।
एषप्रत्ययसर्गोविपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्यः ।
गुणवैषम्यविमर्दात्तस्यचभेदास्तुपंचाशत् ॥४६॥
विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, और सिद्धि-यह बुद्धि का
संक्षिप्त सर्ग ( सृष्टि ) है । गुणों के न्यून अधिक होने से जो
उन का आपस में विमर्द्द होता है, या आपस में एक को
दूसरा दबा कर प्रधान हो जाता है, उससे उसके ५० भेद
होते हैं ॥ ४६ ॥
संक्षिप्त सर्ग—चित्र ( का० ४६ )
कारण कार्य
बुद्धि ( १ ) विपर्यय ( २ ) अशक्ति ( ३ ) तुष्टि ( ४ )
सिद्धि ।
अन्तर्भाव चित्र ( का० ४६ )
जिसमें अन्तर्भाव जिसका अन्तर्भाव
(१) विपर्यय (१) अज्ञान ।
(२) अशक्ति (२) अनैश्वर्य (३) अवैराग्य (४) अधर्म ।
(३) तुष्टि (५) धर्म (६) वैराग्य (७) ऐश्वर्य ।
(४) सिद्धि (८) ज्ञान ।
संक्षिप्त सर्ग के ५० भेदों की गणना ।
पञ्चविपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् ।
अष्टाविंशतिभेदा, तुष्टिर्नवधा,ऽष्टधासिद्धिः ॥४७॥
विपर्यय के ५ भेद होते हैं, अशक्ति,-बुद्धि आदि १३
करणों के वैकल्य ( विकल हो जाने ) से २८ प्रकार की, तुष्टि
९ प्रकार की और सिद्धि ८ प्रकार की होती है । इन सब का
योग करने से ५० भेद होते हैं ॥

हिन्दी सांख्यदर्शन ( ३७ )
५० भेदों के नाम ।
( विपर्यय के भेदों के नाम )
( १ ) विपर्यय- ( १ ) अविद्या ( तमः ) ( २ ) अस्मिता
( मोह ) ( ३ ) राग ( महामोह ) ( ४ ) द्वेष ( तामिस्र )
( ५ ) अभिनिवेश ( अन्धतामिस्र ) ॥ ७७ ।
विपर्यय के भेदों के भेद ।
भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधोमहामोहः ।
तामिस्रोऽष्टादशधा तथाभवत्यन्धतामिस्रः ॥ ४८ ॥
तम या अविद्या के ८ भेद हैं । मोह ( अस्मिता ) के ८
हैं । महामोह ( राग ) के १० भेद हैं । तामिस्र (द्वेष) के १८
भेद हैं । अन्धतामिस्र ( अभिनिवेश ) के १८ भेद हैं ।
कुल ६२ भेद हैं ) ॥
व्याख्या ।
( १ ) तम या अविद्या अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार और शब्द
आदि ५ तन्मात्रों में आत्म-बुद्धिरूप ८ प्रकार की
होती है ।
( २ ) अस्मिता या मोह । देवताओंको ८ प्रकार के ऐश्वर्य की
प्राप्तिसे "यह अणिमा आदि हमारा शाश्वतिक (सदाका)
ऐश्वर्य है" ऐसा अभिमान होता है, तद्रूप अस्मिता ८
प्रकार की होती है ।
( ३ ) राग या महामोह-दिव्य अदिव्य शब्द आदि दशविध
रञ्जनीय ( जिन में राग हो ) विषयों में आसक्तिरूप
दश प्रकार का महामोह होता है ।
( ४ ) द्वेष ( तामिस्र ) दिव्य अदिव्य भेद से १० प्रकार के
शब्द आदि विषय परस्पर से उपघात किये जाते हुये
द्वेष के विषय होते हैं और अणिमा आदि ८ सिद्धियें

( ३८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
स्वरूप से ही कोपनीय होती हैं, अतः १० शब्द आदि
और ८ अणिमा आदि मिलकर १८ क्रोध के विषय
होने से क्रोध या द्वेष १८ प्रकार का होता है ।
( ५ ) अभिनिवेश (अन्धतामिस्र) । अणिमा आदि ८ ऐश्वर्य
और शब्द आदि १०, कुल १८ विषयों या उपायों को
प्राप्त होकर देवताओं को भय होता है, कि-इन्हें असुर
न छीन लें। इस प्रकार भयका विषय १८ प्रकारका होनेसे
भय या अन्धतामिस्र भी १८ प्रकार का होता है ॥४८॥
२८ प्रकार की अशक्ति ।
( ११ इन्द्रिय बध, ६ अतुष्टियें और ८ असिद्धियें )
एकादशेन्द्रियबधाः सहबुद्धिबधैरशक्तिरुद्दिष्टा ।
सप्तदशबधा बुद्धे र्विपर्ययात्तुष्टिसिद्धीनाम् ॥४९॥
१७ बुद्धि बधों के सहित ११ इन्द्रियों के बधरूप २८
प्रकार की अतुष्टि कही गई है । तुष्टियों और सिद्धियोंके वि-
परीत रूप सेअर्थात्-६ अतुष्टियों और ८असिद्धियों के रूप से
बुद्धि-बध १७ होते हैं ॥ ४६ ॥
नवधा ( ६ ) तुष्टि ।
आध्यात्मिक्यश्चतस्रःप्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः
बाह्याविषयोपरमात्पञ्च, नवतुष्टयोऽभिमताः ।५०।
चार अध्यात्मिकी (भीतरी) तुष्टियें होती हैं। जिनके
प्रकृति उपादानकाल और भाग्य ये नाम हैं'विषयों से उपरति
( निवृत्ति) के कारण बाह्य ( बांहरी ) तुष्टियें ५ होती हैं ।
सब मिलकर ६ तुष्टियें हैं ।
व्याख्या ।
'प्रकृति से आत्मा भिन्न वस्तु है'-ऐसा निश्चय करके फिर
इसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा विवेक साक्षा-

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३६ )
त्कार के लिये असत् उपदेश से सन्तुष्ट होकर जो पुरुष यत्न
• नहीं करता, उसको ये चार आध्यात्मिक्री तुष्टियें होती हैं ।
क्योंकि-ये तुष्टियें प्रकृति से भिन्न आत्मा को लेकर होती हैं
इसी से ये आध्यात्मिक्री हैं। इन की विशेष व्याख्या इस
प्रकार है कि-
(क) किसी ने किसी को उपदेश दिया कि- विवेक साक्षा-
त्कार ( प्रकृति और आत्माके भेद को अपने अनुभवमें लाना )
प्रकृति का ही परिणाम विशेष है, अतः उसे प्रकृति स्वयम् ही
करदेगी इससे तुझे ध्यान का अभ्यास नहीं करना चाहिये
हे वत्स ! तू इसी प्रकार रह । सो यह उस शिष्यको जो प्राकृ-
ती (प्रकृति पर निर्भरता ) तुष्टि होती है उसका नाम 'प्रकृति'
( अम्भः ) ही है ।
(ख) [ दूसरा उपदेश ] यद्यपि वह विवेकख्याति प्रकृति
से होती है, तथापि केवल प्रकृति से ही नहीं । क्योंकि-यदि
प्रकृति से ही विवेक-ख्याति या तत्वज्ञान हो तो उस को सब
के प्रति समान होनेके कारण सबको सब कालमें विवेकख्याति
होना चाहिये? इस कारण हे वत्स ! तू संन्यास धारण कर ।
संन्यास से तुझे वह ख्याति प्राप्त होगी। इस उपदेश से जो
शिष्य को तुष्टि होती है, वह उपादान ( सलिल ) कह-
लाती है ।
(ग) [ तीसरा उपदेश ] यद्यपि संन्याससे निर्वाण (मुक्ति)
होती है, किन्तु तत्काल नहीं, अर्थात् वही संन्यास तुझे काल
पाकर सिद्धि देगा, अतः तू उतावला मत हो, इस उपदेश से
जो काल में तुष्टि होती है वह काल कहलाती है, दूसरा नाम
इसका मेघ है ।
• (घ) [ चौथा उपदेश ] विवेक-ख्याति को न काल कर

सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती

( ४० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती
है इसीसे मदालसा के पुत्र अति बालक होने पर भी माता के
उपदेश मात्र से ही विवेक-ख्यातिको प्राप्त हुये और मुक्त भी।
उस में भाग्य ही कारण था, किन्तु और कुछ नहीं। इस उप-
देश से जो भाग्य में तुष्टि है वह भाग्य (वृष्टि) कहलाती है।
जो तुष्टियें प्रकृति, महत्‌तत्व, अहंकार आदि अनात्म
वस्तुओं को आत्मा समझ कर वैराग्य से होजाती हैं, वे सब
बाह्य तुष्टियें हैं। क्योंकि-आत्म-ज्ञान के न होने की अवस्था
ही में वे अनात्म ( बाह्य ) वस्तु के अवलम्बन से होती हैं।
इन तुष्टियों का कारण वैराग्य है, और वह वैराग्य ५ कारणों
से होता है, अतः वह पांच प्रकार का समझा जाता है; तथा
उसके कारण ही उस से होने वाली तुष्टियें भी ५ ही मानी
जाती हैं। अर्थात्-भोग्य विषय शब्द आदि ५ हैं, और उनके
उपरम (वैराग्य) भी ५ हैं। विषय की संख्या के समान इस
के कारण भी (१) अर्जन (२) रक्षण (३) क्षय (४) भोग
(५) हिंसा, ये पांच हैं, इससे भी वैराग्य या उपरम ५ हैं।
इनकी विशेष व्याख्या इस प्रकार है—
(क) [ अर्जन ] धनके अर्जन या संग्रह करनेके उपाय सेवा
आदि हैं, जो सेवक आदि को दुःखित करने वाले हैं। क्यों
कि-सेवा में क्रोधी स्वामी से कभी २ थप्पड़ या गर्दना
आदि भी खाना पड़ता है। सुतराम् इन दुःखों को अनुभव
करने वाले बुद्धिमान् उसमें प्रवृत्त नहीं होते। इसी प्रकार अन्य
उपायों में भी दोष हैं, इस प्रकार जो विषयसे उपरम तुष्टि है
वह 'पार' कहलाती है।
(ख) [ रक्षण ] धन किसी प्रकार इकट्ठा हो भी गया, तो
उसके राजा, चोर, अग्नि जलप्रवाह आदि से नांश होजाने की

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४१)
संभावना है, अतः उसकी रक्षा में महादुःख है, ऐसी भावना
वाले को जो विषय से उपरम में तुष्टि है, वह दूसरी 'सुपार'
'तुष्टि है।
(ग) [क्षय] ऐसे ही बड़े परिश्रम से इकट्ठा किया हुआ
धन भोग करने से क्षीण होजाता है, इस प्रकार उसके क्षय हो
जाने की भावना करने वाले को जो विषय के उपरम में तुष्टि
होती है, वह तीसरी 'पारापार' कहलाती है।
(घ) इसी प्रकार शब्द आदि विषयों के भोगाभ्यास से
काम (मनोरथ) बढ़ते हैं, और वे विषय की प्राप्ति न होने
पर कामी पुरुषको दुःखित करते हैं इससे भोग दोषको जानने
वालेको जो विषयसे उपरम में तुष्टि होती है, वह चौथी 'अनु-
त्तमाम्भ' कहलाती है।
(ङ) ऐसे ही दसरे प्राणियों की हानि किये बिना या
सताये बिना विषयों का उपभोग नहीं हो सकता, इस हिंसा
दोष को देख कर जो विषय से उपरम में तुष्टि होती है, वह
५ वीं 'उत्तमाम्भ' कहलाती है।
ऐसे चार आध्यात्मिकौ और ५ बाह्य तुष्टियों को
मिलाकर ६ तुष्टियें होती हैं ॥ ५० ॥
गौण और मुख्य सिद्धियें ॥
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः ।
दानंचसिद्धयोऽष्टौसिद्धेपूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥५१॥
तीन दुःखों के नाश तीन मुख्य सिद्धियें हैं। और सब
(१) अध्ययन (२) शब्द (३) ऊह (४) सुहृत्प्राप्ति और
(५) दान ये ५ सिद्धियें गौण हैं।
सिद्धिके पूर्व जो विपर्यय अशक्ति और तुष्टि के भेद से
तीन प्रकार की बुद्धि की सृष्टि (का० ४६ में) देखी गई है,

दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि)

( ४० ) हिन्दीसांख्यदर्शन
उसको अंकुश संज्ञा है। क्योंकि वह सिद्धि को रोकती है।
गौणसिद्धियें-(१) अध्ययन (तार) (२) शब्द (सुतार)
(शब्दसे अर्थ का ज्ञान) (३) ऊह (तर्क) (तारतार) (४)
सुहृत्प्राप्ति (मित्र मिलन) (रम्यक) और (५) दान (मुदामु-
दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि)
मुख्यसिद्धियें-(१) आध्यात्मिक दुःख का नाश (प्रमोद)
(२) आधिभौतिक दुःख का नाश (मुदित) और (३) आधि-
दैविक दुःख का नाश (मोदमान) (कुल ८ सिद्धियें)॥५१॥
प्रकारान्तर से सिद्धियें ।
(१) ऊह--जिस में पूर्व जन्म के अभ्यास से आप से
आप तत्व ज्ञान हो जावे।
(२) शब्द-जिस में दूसरे के सांख्य शास्त्रीय अध्ययन
को सुन कर तत्वों का ज्ञान उत्पन्न हो।
(३) अध्ययन-जिस में गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से
संवाद पूर्वक ग्रन्थ और अर्थ दोनों प्रकार से सांख्य शास्त्र को
अध्ययन करने से ज्ञान उत्पन्न हो।
(४) सुहृत्प्राप्ति--जिस में तत्वों के ज्ञाता मित्र की
प्राप्ति से ज्ञान उत्पन्न हो।
(५) दान-जिस में धन के दान से सन्तुष्ट हो कर
गुरु ज्ञान देवे, वह सिद्धि धन दान के कारण होने से 'दान'
कहलाती है॥ ५१॥
प्रत्यय (बुद्धि) और तन्मात्र या भूत सर्ग का प्रयोजन
नविनाभावैर्लिङ्गं नविनालिङ्गेन भावनिर्वृत्तिः ।
लिङ्गाख्योभावाख्यस्तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः।५२।
बुद्धि तत्व से दो प्रकार की सृष्टि होती है, एक सृष्टि
भाव-सृष्टि है और दूसरी लिङ्ग-सृष्टि है। पहिली भावसृष्टि

हिन्दी सांख्यदर्शन (४३)
का संक्षेप धर्म आदि ८भेदों में और विस्तार ५० भेदों में कहा
गया है। तथा दूसरी लिङ्ग सृष्टि, अहंकार के द्वारा ११ इन्द्रि-
यों और ५ तन्मात्रों के रूप में है, जिस का विस्तार
स्थूल देह आदि स्थावर जङ्गम सभी है। इन दोनों सृष्टियों
के सम्बन्ध में यह प्रश्न होता है, कि बुद्धि ने दो सृष्टियें क्यों
कीं, एक ही सृष्टि से भी उस की चरितार्थता हो जाती ? इसी
के उत्तर के अर्थ यह कारिका है।
इस का भाव यह है, कि-धर्म, अधर्म आदि भावों के
विना लिङ्ग या तन्मात्र की सृष्टि का सम्भव नहीं । क्यों कि
पूर्व २ संस्कारों ( धर्म अधर्म आदिकों ) के अनुसार ही
पिछले २ या अपूर्व २ शरीरों की प्राप्ति होती है। एवम् लिङ्ग
आदि के विना धर्म आदि भी नहीं हो सकते । क्योंकि धर्म
अधर्म आदि सब स्थूल सूक्ष्म देह के ही साध्य हैं। इस प्रकार
बीज अंकुर के दृष्टान्त पर दोनों सृष्टियों का प्रयोजन है।
इसे अन्योऽन्याश्रय दोष भी न समझना चाहिये, क्योंकि जो
बीज जिस अंकुर से होता है, वह अंकुर उसी बीज से नहीं
होता, बल्कि-वह किसी दूसरे बीज से हुआ है। ऐसे ही
अंकुर पक्ष को भी समझना चाहिये ॥ ५२ ॥
१४ प्रकार का भूत सर्ग ।
अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति ।
मानुषकश्चैकविधः, समासतो भौतिकः सर्गः ॥५३॥
( क ) ८ प्रकार का देव सर्ग ( सृष्टि ) है—( १ ) ब्रह्मा
( २ ) प्रजापति ( ३ ) इन्द्र ( ४ ) पितर ( ५ ) गन्धर्व ( ६ )
यक्ष ( ७ ) राक्षस ( ८ ) पिशाच ।
( ख ) तिर्यग्योनि-सर्ग ५ प्रकार का-( १ ) पशु ( २ )
मृग (३) पक्षी (४) सरीसृप (सर्पादि) (५) स्थावर (वृक्षादि) ।

( ४४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
( ग ) मनुष्य-सर्ग १ प्रकार का है । यहसंक्षेप से १४ प्रकार
का भूतसर्ग है ॥ ५३ ॥
तीन प्रकार से भूत सर्ग
ऊर्ध्वंसत्वविशालस्तमोविशालश्चमूलतःसर्गः ।
मध्येरजोविशालो, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥५४॥
पहिला ऊर्ध्व सर्ग है, जिस में सत्वगुण की प्रधानता
रहती है, एवम् उसकी परिस्थिति द्य लोक से सत्यलोक पर्यन्त
है । २रा सर्ग मूलसर्ग या जीव की नीच गति का सर्ग है ।
इस में तमोगुण की प्रधानता है, इसी से यह मोहमय होता
है, इस की गणना पशु से वृक्ष पर्यन्त है । और तीसरा मध्य
( बीच ) का सर्ग है, इस में रजोगुण की प्रधानता है, अतएव
यह दुःख बहुल है, इस की गणना में सम्पूर्ण भूलोक है, जिस
में सातों द्वीप और सातों समुद्र आजाते हैं ॥५४ ॥
सर्ग ( सृष्टि ) की दुःख रूपता ।
तत्रजरामरणकृतं दुःखम्प्राप्नोतिचेतनःपुरुषः ।
लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद्दुःखंस्वभावेन ॥५५॥
उस पूर्वोक्त सृष्टि में सब स्थानों में जरा ( बुढापा )
और मरण के दुःख को चेतन पुरुष, लिङ्ग शरीर की निवृत्ति
से पहिले प्राप्त होता रहता है । इस से संसार में दुःख स्वाभा-
विक है ।
यद्यपि भिन्न २ शरीरों में भिन्न २ प्रकार का सुख
भोग भी है, तथापि जरा मरण का दुःख सर्वत्र समान है ।
जो बुद्धि के ( प्राकृत ) गुण हैं, वे सब लिङ्ग शरीर में
रहते हैं, और लिङ्ग शरीर पुरुष का सम्बन्धी है । क्योंकि
पुर ( लिङ्ग ) में शयन करने से ही वह पुरुष है । अतः लिङ्ग

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४५ )
के द्वारा अध्यासवश पुरुष में भी दुःखों का सम्बन्ध हो
जाता है ॥ ५५ ॥
निःसन्देह उक्त सब सर्ग प्रकृति से ही हुआ है ।
इत्येषप्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः ।
प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थइवपरार्थआरम्भः ॥५६॥
( क ) यह सब महत् तत्व आदि विशेष ( स्थूल ) भूत
पर्यन्त जितना सर्ग है, वह सब प्रकृति का किया हुआ है।
क्योंकि-
( १ ) सर्ग को अकारण मानने में सर्ग का अत्यन्त भाव
( होता ही रहे कभी रुके नहीं ) अथवा अत्यन्त अभाव ही
हो ( कभी सृष्टि हो ही नहीं ) ।
( २ ) ब्रह्म से भी सृष्टि नहीं। क्योंकि-चिति शक्ति में
परिणाम का अभाव है ।
( ३ ) ईश्वर से अधिष्ठित प्रकृति से भी सृष्टि नहीं ।
क्योंकि-निर्व्यापार ( व्यापार रहित ) ईश्वर का अधिष्ठातृत्व
हो नहीं सकता, अर्थात् - जब वह कुछ करता ही नहीं, तो
वह अधिष्ठाता कैसे हो सकता या अधिष्ठाता उसे मान भी
लिया जावे तो उससे क्या लाभ ? क्योंकि जैसे-क्रियाशून्य
खाती की कुल्हाड़ी कुछ नहीं कर सकती ।
( ख ) प्रकृति का जो महत् तत्व ( बुद्धि ) आदि २३
तत्वों के रूप में आरम्भ या कार्य है, वही प्रत्येक पुरुष को
क्रम प्राप्त ( संयोगवश ) मोक्ष का भी कारण हो जाता है । उस
का आरम्भ ऐसा है, जैसा-कोई स्वार्थ के समान अपने मित्र
के कार्य को बिना अपने प्रयोजन के ही करे । हमें इसमें यह
प्रतीति होती है, कि-इनके मतमें ईश्वर नहीं और न पुरुष में
कोई क्रिया और ज्ञान आदि गुण ही है, जो कुछ है, वह

( ४६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सब प्रकृति का ही है, और साक्षात् सम्बन्ध से उसी में रहता
है । फिर अनादि काल से संसार में बंधा हुआ पुरुष छूट कैसे
सकता है, यही प्रश्न इनके मनमें हुआ । यदि ये अनिर्मोक्ष
को ही लेलेवें, तो इनके दर्शन को भी कौन पढ़े या कौन
अन्धा इनके सम्प्रदाय के वश्य हो, सुतराम् इन्हें मोक्षका
मार्ग भी बताना चाहिये जिसे और सब दर्शनकार भी अपने २
मतके अनुसार बता रहे हैं। यही सब सोच समझकर कह रहे
हैं- “ प्रति पुरुष०-०” अर्थात्-प्रकृति परिणाम शील है,तत्व-
ज्ञान और उसके साधन भी सब प्राकृत हैं,इस रीति पर जब
कभी तत्वज्ञान या प्रकृति पुरुष का भेदज्ञान हो जायगा,
तभी निर्वाण (मोक्ष) हो जायगा । इस में दूसरे का कोई
आरम्भ मानना निष्प्रयोजन है ॥५६॥
विना अधिष्ठाता के प्रधान की प्रवृत्ति में युक्ति
वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथाप्रवृत्तिरज्ञस्य ।
पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथाप्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥५७॥
जिस प्रकार वत्स (शिशु) की विवृद्धि या पोषण के
लिये माता के स्तनोंका दूध अज्ञ होकर भी आपसे आप बहने
लगता है, उसी प्रकार पुरुष के मोक्ष या निर्वाणके लिये ज्ञान
शून्य (जड़) प्रकृति भी प्रवृत्त होती है । अभिप्राय यह है,कि-
उसको अपने चेतन अधिष्ठाता ईश्वर की अपनीं प्रवृत्ति में
कोई अपेक्षा नहीं है । सुतराम् वह अपने सृष्टि कार्य में स्व-
तन्त्रता से प्रवृत्त होती है । इसीसे ईश्वर तत्वकी कल्पना भी
विपश्चित्तियों को अनावश्यक है ॥ ५७ ॥
“स्वार्थ इव” का दृष्टान्त ।
औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्त्ततेलोकः ।

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४७ )
पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्त्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥
जिस प्रकार लोक अपने औत्सुक्य ( चाव ) या इच्छाओं
को मिटाने के लिये क्रियाओं में प्रवृत्त होता है, तथा उस कार्य
के पूरी होने पर निवृत्त हो जाता है, वैसे ही अव्यक्त (प्रकृति )
भी पुरुष के मोक्ष के अर्थ प्रवृत्त होता है तथा निवृत्त हो
जाता है ॥ ५८ ॥
प्रकृति का प्रवर्त्तक तो पुरुषार्थ हो सकता है, किन्तु
निवृत्ति कैसे होगी ?
रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्त्तते नर्त्तकी यथानृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्यविनिर्वर्त्तते प्रकृतिः ५९
( समाधान- ) रङ्ग ( सभा ) को नर्त्तकी (वेश्या) अपना
नृत्य दिखाकर जिस प्रकार निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार
प्रकृति भी पुरुष के प्रति अपने आपे को दिखाकर निवृत्त हो
जाती है। प्रयोजन यह है कि-उसे निवर्त्तक (निवृत्त करने वाले)
की कोई अपेक्षा नहीं है, किन्तु निवृत्ति उसकी स्वाभाविक
हो जाती है ॥ ५६ ॥
केवल परार्थ-आरम्भ के आक्षेप का समाधान ।
नानाविधैरुपायै रुपकारिण्यनुपकारिणः पुंसः
गुणवत्यगुणस्यसतः तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥६०॥
( जिस प्रकार कोई भृत्य स्वयम् उपकारी भी होकर नि-
र्गुण या अनुपकारी स्वामी का निष्फल आराधन करता है,
उसी प्रकार ) यह तपस्विनी गुणवती उपकारिणी प्रकृति
पुरुष को अनुपकारी और निर्गुण होते हुये भी उसके अर्थ को
विना प्रयोजन ही नाना प्रकारके उपायोंसे साधन करती है ६०
वेश्या परिषद् को नृत्य दिखाकर निवृत्त हो जाती है,

( ४८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
और दर्शकों के कौतूहल के कारण फिर भी प्रवृत्त हो जाती है,
ऐसे ही प्रकृति भी निवृत्त होकर फिर प्रवृत्त हो सकती है, जिस
से कि- मुक्त हुए पुरुष का फिर बन्ध हो जाये ? इस आपत्ति
के उत्तर के अर्थ यह कारिका है—
प्रकृतेःसुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीतिमेमतिर्भवति।
या दृष्टाऽस्मीति पुनर्नदर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥६१॥
‘प्रकृति से अधिक सुकुमार और कोई वस्तु नहीं है’
यह मेरी (ईश्वर-कृष्ण की) मति है । जो ‘"दृष्टाऽस्मि"
(मैं देख ली गई) इस बुद्धि से फिर पुरुष के देखने में नहीं
आती ॥ ६१ ॥
बन्धन (संसार) और मोक्ष पुरुष के नहीं, प्रकृति के हैं
तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यतेनापिसंसरतिकश्चित्।
संसरति बध्यते मुच्यतेच नानाश्रया प्रकृतिः ॥६२॥
तिस (इस) कारण से (का० ६१) वह पुरुष न बन्धन
को प्राप्त होता है, न संसरण करता है अर्थात् एक शरीर को
छोड़ कर दूसरे शरीरमें नहीं जाता, और न मोक्षको ही प्राप्त
होता है, किन्तु नाना गुणोंको आश्रय करने वाली प्रकृति ही
संसरण करती है, बद्ध होती है, और मुक्त होती है ॥६२॥
प्रकृति के बन्ध और मोक्ष के साधन ।
रूपैः सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः ।
सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥
धर्म आदि ७ भावों से प्रकृति अपने से अपने को बांध
लेती है, और वही प्रकृति पुरुषार्थ (मोक्ष या अपवर्ग) के
प्रति एक भाव (तत्व ज्ञान) से अपने को मुक्त कर देती है
तथा फिर भोग और अपवर्ग (मोक्ष) को नहीं करती ॥६३॥

हिन्दीसांख्यदर्शन ( ४६ )
सांख्य शास्त्र के तत्व का उपयोग ।
एवं तत्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् ।
अविपर्ययाद्विशुद्धं केवल मुत्पद्यते ज्ञानम्॥६४॥
इस सांख्यशास्त्र की रीति से जो तत्वों का निर्णय या
निरूपण किया गया है उसके अनुसार तत्वों के अभ्यास करने
से, उस में आदर करनेसे, निरन्तर दीर्घ काल तक मनन करने
से प्रकृति और पुरुष के भेदको साक्षात्कार करने वाला ज्ञान
उत्पन्न होता है, जो अविपर्यय या संशय तथा भ्रम से रहित
होनेके कारण विशुद्ध, मिथ्या ज्ञानसे अमिश्रित होनेके कारण
केवल, और किसी विषयका भी अपरिज्ञान न होनेके कारण
अपरिशेष (सम्पूर्ण) होता है । उस ज्ञानका स्वरूप- “नास्मि”
(मैं क्रिया शून्य हूँ ) “ नाहम् ” ( अकर्ता हूं ) “ नमे ”
(स्वामिता रहित हूँ ) यह है ॥ ६४ ॥
पूरे विशुद्ध केवल ज्ञान का फल ।
तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात्सप्तरूपविनिवृत्ताम् ।
प्रकृतिंपश्यतिपुरुषःप्रेक्षकवदवस्थितःस्वच्छः॥६५॥
उस विशुद्ध तत्व ज्ञान से भोग, और विवेक के साक्षा-
त्कार के प्रसव से निवृत्त, तथा विवेक ज्ञानरूप अर्थ के वश
या सामर्थ्य से धर्म आदि ७ रूपों से निवृत्त हुई हुई प्रकृति
को पुरुष दर्शकके समान अवस्थित और निष्क्रिय होकर देखता
है, किन्तु उस अवस्थामें भी सात्विकी बुद्धिसे पुरुष का संभेद
रहता है, अथवा उसकी छाया पुरुषमें पड़ती रहती है,अन्यथा
ऐसी प्रकृति का दर्शन भी नहीं घट सकता ॥ ६५ ॥
मोक्ष के अनन्तर प्रकृति और पुरुष के रहते हुये भी सर्ग
(सृष्टि) क्यों नहीं ?
दृष्टामयेत्युपेक्षकएको, दृष्टाऽहमिति विरमत्यन्या।

( ५० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सतिसंयोगेऽपितयोःप्रयोजनंनास्ति सर्गस्य ६६
“मैं इसे देख चुका” इस बुद्धि से उन दोनों में एक
अर्थात् पुरुष प्रकृतिसे उपेक्षा कर देता है, और दूसरी प्रकृति
इस लिये विरत या निवृत्त होजाती है कि-“मैं देखली गई”
ऐसा उसे अपना प्रयोजन भाव प्रतीत होता है। इस कारण
दोनों को उदासीन होने से उनका संयोग होने पर भी सर्ग
(सृष्टि) का प्रयोजन नहीं है ॥६६॥
तत्त्वज्ञान के अनन्तर शरीर की स्थिति ।
सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठतिसंस्कारवशात्,चक्रभ्रमिवद्धृतशरीरः॥६७॥
जब यथेष्ट (जैसा चाहिये) तत्त्वों का साक्षात्कार उदय
होजाता है, उस समय धर्म आदि अकारण होजाते हैं, किसी
कार्य के उत्पन्न करने में समर्थ नहीं रहते-जले हुये बीज के
समान सुख दुःखरूप अंकुरों को उत्पन्न नहीं कर सकते, इसी
से अब जो शरीर वर्त्तमान है वह कैसे रहे? किन्तु जैसे कुम्हार
का चक्र एकबार घुमाकर छोड़ देने पर भी कुछ देर बेग के
अधीन घूमता रहता है, ऐसे ही इस अन्तिम शरीर को जिस
प्रारब्ध कर्मने प्रवृत्त किया है, उसके समाप्त होने तक यह उसी
के अधीन खड़ा रहता है (अर्थात्-वेग के पूरा होते ही जैसे
कुम्हार का चक्र निष्क्रिय होजाता है, ऐसे ही यह शरीर भी
अपनी अन्तिम लीला को पूरी कर देता है-गिर जाता है या
अपने अव्यक्त कारण में लीन हो जाता है। बस संसार उस
पुरुष का पूरा होचुका तथा वह निर्वाण पद को प्राप्त होगया
फिर उसे संसार न होगा। दीपक के निर्वाण (बुझ जाने) के
दृष्टान्त से ही मोक्ष का नाम भी निर्वाण है) ॥६७॥
यदि संस्कारवश से शरीर है भी, तो कब इसका मोक्ष होगा?

हिन्दी सांख्यदर्शन (५१)
प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृत्तौ ।
ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥६८॥
संचित सम्पूर्ण कर्माशयों (धर्म अधर्मों) का तत्वज्ञानरूप
अग्नि से बीजपना (अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति) दग्ध हो
गया, तथा प्रारब्ध (जिनका भोग वर्त्तमान है या जिनका फल
स्वरूप यह वर्त्तमान शरीर है) कर्मों का भी उपभोग होचुका
इससे शरीर (इस अन्तिम शरीर) का भेद (नाश) प्राप्त होते
ही प्रधान को कृतकार्य होजाने से वह भी निवृत्त होजाता है,
तथा पुरुष भी उस समय ऐकान्तिक (अवश्यंभावी) और आ-
त्यन्तिक (अविनाशी) कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त होजाता है,
जिसका प्रस्ताव ग्रन्थ के आरम्भ में “एकान्तात्यन्ततोऽभावात्”
वाक्य से किया गया था ॥६८॥
शास्त्र का आविष्कार ।
पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् ।
स्थित्युत्पत्तिप्रलया श्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥६९॥
यह गुह्य (गुफामें रहने वाला जैसा) या स्थूल बुद्धि वालों
को दुर्ज्ञेय पुरुषार्थ-ज्ञान (सांख्यशास्त्र) परमर्षि कपिलदेवने
प्रथम समीचीन रीति से आख्यान किया था, जिसमें ज्ञान के
निमित्तभूतों (पदार्थों) की स्थिति उत्पत्तिऔर प्रलय चिन्तन
किये जाते हैं ॥६६॥
एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पयाप्रददौ ।
आसुरिरपि पञ्चशिखायतेनच बहुधाकृतंतन्त्रम् ७०
इस पवित्र श्रेष्ठ शास्त्र को मुनि कपिलदेवने आसुरिनाम
अपने शिष्य के लिये अनुकम्पा (दया) से प्रदान किया था,