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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 81 में से

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पृष्ठ 25

( १० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
अनुवृत्ति हो जाती है । अतः व्यक्त से ही व्यक्त और उस
का गुण उत्पन्न होता है, अव्यक्त रूप कारण की कल्पना
व्यर्थ है ? इस आपत्ति पर यह कारिका -
भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तितः प्रवृत्तेश्च ।
कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥१५॥
कारणमस्त्यव्यक्तम् प्रवर्त्तते त्रिगुणतः समुदयाच्च ।
परिणामतः सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात्
( क ) भेदों ( महत् आदिकों ) का कारण अव्यक्त है ।
क्योंकि कछुवे के अङ्गों का उसके शरीर के साथ विभाग और
अविभाग होता है, ऐसे ही कारण में विद्यमान रहते हुये ही
कार्य के कारण से विभाग और अविभाग होते हैं ।
( ख ) कारण की शक्तिसे कार्य प्रवृत्त होता है, और
कारणमें शक्ति कार्यकी अव्यक्तरूप ही होती है । सत्कार्य पक्ष
में कार्य की अव्यक्तता + ( अप्रकटता ) से भिन्न कारण की
कोई शक्ति नहीं । जैसे तिलों से उनमें रहता हुआ ही तैल
प्रकट होता है, किन्तु बालू से नहीं ।
( ग ) महत्तत्व को ही परम अव्यक्तता क्यों नहीं ?
परिमित या अव्यापी होने से वह अव्यक्त कारण वाला है ।
क्योंकि जो २ वस्तु परिमित होती है वह सब अव्यक्त कारण
वाली होती है । जैसे घट ( घड़ा ) आदि । और-
× अव्यक्तता नाम अज्ञात सत्ता का है । जैसे अँधेरे में
कोई वस्तु रहे, और हम उसे न देखें, किन्तु इस से उस का
वहां अभाव नहीं होता । इसी प्रकार सब कार्य अपनी उत्प-
त्तिसे पहिले अपने कारण में अप्रकटरूप से रहते उनका वहां
अभाव नहीं होता । इसी अज्ञात सत्ताको अव्यक्तता कहते हैं