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रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)

Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary

कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished18 पृष्ठ

भाषाटीकासहिता । १३
अथ नागपादासनलक्षणम्—
स्कन्धे पादौ समाधाय योनौ लिङ्गं प्रवेश्य च।
कामी रमेद्दृढं नारीं नागपादासनं स्मृतम् ॥४४॥
टी०—दोनों पैरों को कन्धे पर रखकर योनि में लिङ्ग को प्रवेश कर
कामी पुरुष नारी से दृढ रमण करै, इसको नागपाद नाम आसन कहा है ॥
अथ लतावेष्टनासनलक्षणम्—
बाहुभ्यां पादयुग्माभ्यां वेष्टयित्वा रमेत् स्त्रियम् ।
लिंगेन ताडयेद्योनिं लतावेष्टोऽयमुच्यते ॥४५॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों और दोनों पैरों से स्त्री को लपेट
कर रमण करै। और लिङ्ग से भग को ताडन करे, यह लतावेष्ट नामका
आसन कहा गया है। जैसे लता वृक्ष में लिपटती है वैसे स्त्री में लिपट
जाने से यह लतावेष्ट नाम से प्रसिद्ध है ॥ ४५ ॥
अर्द्धसम्पुटासनलक्षणम्—
अन्तरिक्षे स्त्रियः पादौ कृत्वा स्वस्य च भूतले ।
हस्ताभ्यां मर्दनं कृत्वा स्तनयोश्च निरन्तरम् ।
कामी रमेत्स्त्रियं तूर्णं बन्धोऽयमर्द्धसम्पुटः ॥४६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री के दोनों पैरों को ऊपर उठा कर अपने दोनों
पैरों को पृथ्वी पर रखकर दोनों हाथों से स्तनों को निरन्तर मर्दन करके
स्त्री से शीघ्र रमण करै, यह अर्द्धसम्पुट आसन है ॥ ४६ ॥
अथ कुलिशासनलक्षणम्—
स्त्रीपादद्वयमास्फाल्य हठाल्लिंगेन ताडनम् ।
योनौ कुर्यात्सदा कामी बन्धः कुलिशसंज्ञकः ॥४७॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री के दोनों पैरों को मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग से सदा ताडन करै, यह कुलिश नाम आसन है ॥ ४७ ॥

१४ रतिमञ्जरी-
रतिसुन्दरासनलक्षणम्-
नारीपादद्वयं स्वामी धारयेदूर्ध्वदेशतः ।
कुचौ धृत्वा पिबेद्वक्त्रं बन्धोऽयं रतिसुन्दरः ॥४८॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों पगों को ऊपर रक्खै । स्तनों को
पकड़ कर मुख का चुम्बन करै, यह रतिसुन्दर नाम आसन है ॥ ४८ ॥
केशरासनलक्षणम्-
स्त्रिया जङ्घे समापीड्य दोर्भ्यां गात्रस्य मर्दनम् ।
पुनः प्रपीडयेद्योनिं बन्धः केसरसंज्ञकः ॥४९॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों जङ्घे को मर्दन कर और दोनों
हाथों से शरीर का मर्दन फिर योनि को लिङ्ग से ताडन करै यह
केसरासन कहा है ॥ ४९ ॥
अथ नृसिंहासनलक्षणम्-
पादौ सम्पीड्य योनौ च हठाल्लिङ्गप्रवेशनम् ।
हस्ताभ्यां वेष्टनं गाढं बन्धो नृसिंहसंज्ञकः ॥५०॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री की योनि का मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग प्रवेश कर दोनों हाथों से दृढ लिपट कर रमण करै यह नृसिंह
नाम आसन कहा है ॥ ५० ॥
अथ विपरीतासनलक्षणम्-
अंशावेकं पदं कृत्वा द्वितीयं कटिसंस्थितम् ।
नारीं च सुरमेत्कामी विपरीतासनं स्मृतम् ॥५१॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के एक पैर को अपने जङ्घे पर रख कर
दूसरे पैर को कमर के समीप कर नारी से अच्छी तरह रमण करै यह
विपरीतासन कहा गया है ॥ ५१ ॥
अथ क्षुद्रारासनलक्षणम्-
पार्श्वोपरि पदौ कृत्वा योनिं लिंगेन ताडयेत् ।

भाषाटीकासहिता । १५
बाहुभ्यां ताडयेद्गाढं क्षुद्गारो बन्धसंज्ञकः ॥५२॥
टी०—स्त्री के दोनों पगों को अपने पसवाड़े पर रख लिङ्ग से
योनि को ताडन करै । और दोनों हाथों से दृढ ताडन करै, यह क्षुद्रारा-
सन कहा है ॥ ५२ ॥
धेनुकासनलक्षणम्—
सुप्तां स्त्रियं समालिंग्य स्वयं सुप्तो रमेत्पुनः ।
यल्लिगं चालयेद्योनौ बन्धोऽयं धेनुकः स्मृतः ॥५३॥
टी०—सोती हुई स्त्री को आलिङ्गन कर आप भी सोता हुआ जिस
हेतु योनि में लिंग चलाता हुआ कामी रमण करता है इस लिये धेनुक
नाम का यह आसन कहा गया है ॥ ५३ ॥
उत्कण्ठासनलक्षणम्—
नारीपादौ च हस्तेन धारयेद्गलके पुनः ।
स्तनार्पितकरः कामी बन्धश्चोत्कण्ठसंज्ञकः ॥५४॥
टी०—कामी पुरुष के दोनों पगों को हाथ से कण्ठ में रख फिर
अपने दोनों हाथों को स्तन पर धरै, यह उत्कण्ठासन है ॥ ५४ ॥
अथ सिंहासनबन्धलक्षणम्—
स्वीये जङ्घाद्वये कामी कृत्वा योषित्पदद्वयम् ।
स्तनौ धृत्वा रमेन्नारीबन्धः सिंहासनो मतः ॥५५॥
टी०--कामी पुरुष अपने दोनों जंघे पर स्त्री के दोनों पैरों को रख-
कर स्तनों को मर्दन कर स्त्री से रमण करै, यह सिंहासन बन्ध कहा है ॥
अथ रतिनागबन्धलक्षणम्—
पीडयेदुरुयुग्मेन कामुकः कामिनीं यदि ।
रतिनागः समाख्यातः कामिनीनां मनोहरः ॥५६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री को दोनों उरुओं से पीड़ित कर उसके साथ

१६ रतिमञ्जरी—
रमण करै । यह कामिनियों के मनको हरने वाला रतिनाग नाम आसन
कहा है ॥ ५६ ॥
अथ विद्याधरासनलक्षणम्—
नार्याश्चोरुयुगं धृत्वा कराभ्यां ताडयेत्पुनः ।
रमयेन्निर्भरं कामी बन्धो विद्याधरो मतः ॥५७॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों से स्त्री के दोनों जङ्घे को धारण कर
फिर योनि ताडन करता हुआ दृढ रमण करै, यह विद्याधर नाम आसन
कहा है ॥ ५७ ॥
अथ कामिजनप्रशंसा—
स्त्रियमानीय यत्नेन विधृत्य चरणद्वयम् ।
वशं नयति यः कामी रतिशास्त्रविचक्षणः ॥५८॥
टी०—जो कामी पुरुष यत्न से स्त्री को लाकर उसके दोनों चरणों
को धर कर वशीभूत करता है, वह रतिशास्त्र का पण्डित है ॥ ५८ ॥
रतिशास्त्रं समाकर्ण्य बन्धान् पद्मादिषोडश ।
नानाविधरतिं कुर्यात्कामिन्या कामुको जनः ॥५९॥
टी०—कामी पुरुष रतिशास्त्र को सुनकर पद्मादि सोलह आसन को
जानकर कामिनी के साथ अनेक प्रकार से रति करै ॥ ५९ ॥
सर्वशास्त्रार्थवक्त्रेण जयदेवेन धीमता ।
मञ्जरी रतिशास्त्रस्य कृत्वा नीता समाप्तताम् ॥६०॥
टी०—सब शास्त्रों का अर्थ मुख में है जिसके ऐसा बुद्धिमान् जय-
देव कवि ने रतिशास्त्र की मञ्जरी समाप्त की ॥ ६० ॥

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