रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
व्याख्या भाग २२५
करियै उपायै बास डारियै कटाय,
नाहिं उपजैगौ बाँस नाहिं बाजे फेरि बाँसुरी ॥१०८॥
शब्दार्थ—घट=घड़ा। वधि=वध करके, मार करके।
अर्थ—कृष्ण की बाँसुरी के अपूर्व प्रभाव का वर्णन करती हुई एक गोपी
अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने जब बाँसुरी बजाई तो सारे
ब्रज के काम बन्द हो गए। जो गोपियाँ यमुना नदी मे घुस कर पानी भरने
वाली थी वे पानी मे खड़ी की खड़ी रह गईं और अपना घड़ा न भर सकी।
जो मार्ग मे आ रही थी, वे वही रुक गईं, एक कदम भी आगे न रख सकी।
जो घर मे थी, वे अपना सारा कार्य छोड़कर केवल लम्बे-लम्बे साँस भरने
लगी। एक गोपी बांसुरी की धुनि को सुनकर तथा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर
गिर गई, एक लोट-पोट हो गई, एक की आँखो से आँसू निकल आये।
रसखान कहते है कि वह गोपी अपनी सखी से कहती ही गई कि कृष्ण तो
सारी ब्रज-नारियो का वध करके बधिक बन गये और हम उसके प्रेम मे पड़-
कर अपने कुल की हँसी का कारण बन गई। अब तो यही उपाय करना
चाहिए कि दुनिया के सारे बाँसो को कटवा डालो। इससे न तो बाँस रहेगा
और न फिर बाँसुरी बनकर हमे व्यथित करेगी।
विशेष—१. कृष्ण की बाँसुरी.का प्रभाव-वर्णन अत्यन्त भावपूर्ण है।
२. अतिम पक्ति मे लोकोक्ति का सुन्दर प्रयोग है।
३. डा० भवानीशंकर आशिक इस कवित्त को रसखानकृत नही मानते।
अतः हमने इसे संदिग्ध छन्दो के अन्तर्गत भी रखा है।
सवैया
चद सो आनन मैन-मनोहर बैन मनोहर मोहत हौ मन।
बक बिलोकनि लोट भई रसखानि हियो हित दाहत हौ तन॥
मैं तब तै कुलकानि की मैड़ नखी जु सखी अब डोलत हो बन।
वेनु बजावत आवत है नित मेरी गली ब्रजराज को मौहन ॥
शब्दार्थ-आनन = मुख। मैन = कामदेव। हित = प्रेम। कुल-कानि
की मैंड = कुल की मर्यादा की सीमा।
अर्थ—बाँसुरी के प्रभाव से कृष्ण के प्रति उत्पन्न प्रेम की बात एक गोपी
अपनी सखी को बताती हुई कह रही है कि हे सखि ! चन्द्रमा के समान सुन्दर
२२६ रसखान-ग्रन्थावली
मुख वाले, कामदेव के समान सुन्दर कृष्ण के मधुर वचनो ने मेरा मन मोह
लिया है। उसकी बाँकी चितवन को देखकर मैं सज्ञा शून्य हो गई। आनन्द-
सागर कृष्ण का मेरे हृदय मे बसा हुआ प्रेम मेरे शरीर को जलाता है। मैंने
तभी से कुल की मर्यादा की सीमा छोड दी है और अब कृष्ण को प्राप्त करने
के लिए वन-वन डोल रही हूँ, क्योकि व्रज के मन को मोहने वाला ब्रजराज
कृष्ण बाँसुरी बजाता हुआ प्रतिदिन मेरी गली आता है।
विशेष—'चद सो आनन' मे उपमा और 'मैन मनोहर' मे रूपक अलकार
है।
सवैया
बाँकी विलोकनि रंगभरी रसखानि खरी मुसकानि सुहाई ।
बोलत बोल अमीनिधि चैन महारस-ऐन सुनै सुखदाई ॥
सजनी पुर-बीथिन मै पिय-गोहन लागी फिरै जित ही तित धाई ।
बाँसुरी टेरि सुनाइ अली अपनाइ लई ब्रजराज कन्हाई ॥११०॥
शब्दार्थ—विलोकनि = दृष्टि । रगभरी = प्रेमपूर्ण । रसखानि = आनन्द-
सागर कृष्ण की । खरी = सुन्दर । बोल = वचन । अमीनिधि = अमृत का
भंडार । चैन = आनन्द । महारस-ऐन = अत्यन्त आनन्द का भंडार ।
पुर-वीथिन मैं = नगर की गलियो मे । पिय-गोहन = कृष्ण के साथ ।
अर्थ—एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! उस कृष्ण की दृष्टि प्रेमपूर्ण है, वह आनद
का सागर है, उसकी सुन्दर मुस्कान मन को मोहने वाली है। वह अमृत-भडार
से युक्त वचनो को कहता है ; अर्थात् उसकी वाणी का माधुर्य अमृत के समान
परमानन्द प्रदान करने वाला है। उसकी मधुर वाणी अत्यन्त आनन्द का भंडार
है, जिसे सुनने से सुख प्राप्त होता है। हे सजनी ! नगर की गलियो मे समस्त
ब्रज बालाएँ कृष्ण के साथ-साथ लगी हुई है। वह जिधर भी जाता है, सभी
गोपियाँ उधर ही दौडने लगती है। हे सखी ! उस ब्रजराज कृष्ण ने बांसुरी
की ध्वनि सुनाकर समस्त व्रज-बालाओ को अपने प्रेम के वशीभूत कर लिया
है।
विशेष—अनुप्रास, यमक अलकार ।
व्याख्या भाग २२७
सवैया
डोरि लियौ मन मोरि लियो चित जोहि लियौ हित तोरि कै कानन ।
कुंजनि ते निकस्यौ सजनी मुसकाइ कह्यौ वह सुन्दर आनन ॥
हो रसखानि भई रसमत्त सखी सुनि के कल बाँसुरी कानन ।
मत्त भई बन वीथिन डोलति मानति काहू की नेकु न आनन ॥ १११ ॥
शब्दार्थ—डोरि लियौ=बाँध लिया। हित=प्रेम । कान=मर्यादा ।
आनन=मुख । कानन=बन । आनन=बाधाएँ ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने मेरे मन को बाँध लिया है, चित्त को चुरा लिया
है, मर्यादा तोडकर मुझसे प्रेम जोड लिया है। हे सजनी ! वह अपने सुन्दर
मुख पर मुस्कराहट लिए कुंजो मे से निकला । रसखान कहते है कि हे सखि
बन मे उसकी मधुर बाँसुरी को सुनकर मैं रसमत्त हो गई । तभी से मै उन्मत्त
होकर वन-वन और गली-गली घूमती फिर रही हूँ और किसी भी प्रकार की
बाधाओ को नही मानती ! अर्थात् अब मुझे किसी भी प्रकार की बाधा का
डर नही रहा है ।
सवैया
मेरो सुभाव चितैवे को माइ री लाल निहारि कै बसी बजाई ।
वा दिन ते मोहि लागी ठगौरी सी लोग कहै कोई बावरी आई ॥
यौ रसखानि घिरयो सिगरो ब्रज जानत वे कि मेरो जियराई ।
जौ कोउ चाहै भलौ अपनो तौ सनेह न काहू सो कीजियौ माई ॥ ११२ ॥
शब्दार्थ—चित्तैवे को=देखने के लिए । निहारि के=देखकर । ठगौरी
=जादू । जियराई=हृदय ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मेरा स्वभाव
देखने के लिए, मुझे देखकर,कृष्ण ने अपनी वंशी बजाई । उसी दिन से मुझ पर
जादू-सा चल गया है । लोग मुझे देखकर कहते है कि कोई पगली आ गई है,
अर्थात् लोग मुझे पगली समझते है । रसखान कहते हैं कि इस प्रकार सारे
ब्रज के निवासी मुझे घेर लेते है । मेरे मन की या तो कृष्ण जानते है या मैं
स्वय जानती हूँ । यदि इस जगत् मे कोई अपना भला चाहता है तो उसे कभी -
भी किसी से प्रेम नही करना चाहिए ।
२२८ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
मोहन की मुरली सुनिकै वह वौरि ह्वै आनि अटा चढि झांकी।
गोप बडेन की डीठि बचाइ कै डीठि सो डीठि मिली दुहुँ झांकी॥
देखत मोल भयौ अँखियान को को करै लाज कुटुम्ब पिता की।
कैसे छुटाई छुटै अटकी रसखानि दुहुँ की विलोकनि वांकी ॥११३॥
शब्दार्थ—बौरी ह्वै = पागल होकर। विलोकनि वांकी = वक्र चितवन।
अर्थ—गोपी प्रेम का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कह रह
है कि कृष्ण की मुरली की तान को सुन कर वह पागल होकर अटारी पर चढ़
कर नीचे की ओर झाँकी। अन्य लोगो की निगाह बचाकर उसने कृष्ण से
निगाह मिलाई। दोनो की आँखे मिली। आँखे मिलते ही दोनो मे प्रेम हो गया
और उन्होने कुल की तथा पिता की लाज को तिलाजलि दे दी। रसखान
कवि कहते है कि उन दोनो की परस्पर मिली हुई बाँकी चितवन किस प्रकार
हटाने से हट सकती है अर्थात् उन दोनो का प्रेम नही टूट सकता।
सवैया
बसी बजावत आनि कढो सो गली मैं अली ! कछु टोना सो डारे।
हेरि चिते, तिरछी करि दृष्टि चलौ गयो मोहन मूठि सी मारे॥
ताही घरी सो परी घरी सेज पै प्यारी न बोलति प्रानहुँ वारे।
राधिका जी है तो जी है सबै न तो पीहै हलाहल नन्द के द्वारे ॥११४॥
शब्दार्थ—टोना = जादू। हेरि = देखकर। मूठि सी मारे = मूठ सी मार-
कर। हलाहल = विष।
अर्थ—प्रेम व्यथिता राधिका जी का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी
सखी से कहती है कि हे सखि ! बाँसुरी को बजाता हुआ वह कृष्ण अचानक
गली मे आ निकला और राधा पर कुछ जादू सा डाल गया। वह उसकी ओर
देखकर ध्यान देकर और तिरछी निगाह करके मन को मोहने वाली मूठ सी
मार कर चला गया; अर्थात् राधा पर अपना प्रेम जगा कर और राधा के
हृदय मे प्रेम की भावना जगाकर चला गया। वह प्यारी राधा उसी समय से
सेज पर निश्चेष्ट होकर पडी हुई है। वह कुछ बोलती भी नही है तथा अपने
प्राणो को न्योछावर करने पर उतारू है। हे सखि ! यदि राधा जी जीवित बच
गई तो हम सबका जीवन है, यदि वह मर गई तो हम सभी नन्द के द्वारे
व्याख्या भाग २२६
पर जाकर विष पी लेगी; अर्थात् उसके द्वारे पर जाकर आत्म-हत्या कर
लेगी।
विशेष—१. जी है तो जी हैं, मे यमक अलकार है।
२ 'न तो पी है हलाहल नन्द के द्वारे' में मन का सारल्य एवं
दृढता निहित है।
झुलना—'चेतै न जो वृषभान सुता दुख ह्वै ह्वै बडो इहि की सजनीन को।
जाय के खाय परेगी सबै या अहीर के द्वार पे हीर-कनीन को ॥
—अज्ञात
सवैया
कल- काननि कुण्डल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजति है।
मुरली कर मै अधरा मुसकानि-तरग महा छबि छाजति है ॥
रसखानि लखे तन पीत पटा सत दामिनि सी दुति लाजति है।
वहि बासुरी की धुनि कान परे कुलकानि हियो तजि भाजति है ॥११५॥
शब्दार्थ—कल = सुन्दर । काननि = कानो मे । अधरा = होठो पर ।
मुसकानि-तरग = हसी की लहरे। छाजति है = शोभायमान है। सत दामिनि
की = सैकड़ो बिजलियो की। दुति = द्युति, शोभा। लाजति है = लज्जित होता
है। कुलकानि = वश की मर्यादा। भाजति है = भागती है।
अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा तथा उनकी बांसुरी के
प्रभाव का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! कृष्ण के कानो मे सुन्दर
कुण्डल, सिर पर मोर-पखो का मुकट और हृदय पर वैजयन्तीमाला सुशोभित
है। उनके हाथ मे वशी और होठो पर मुसकराहट की लहरें अत्यन्त शोभा
प्राप्त करती है। रसखान कवि कहते है कि उनके तन पर सुशोभित पीले वस्त्र
को देखकर सैकडो बिजलियो की शोभा लज्जित होती है। उसी बाँसुरी की
ध्वनि कानो मे पडने पर व्रज-बनिताएँ अपने हृदय से वंश की मर्यादा छोड़ कर
उसी ओर भागती है।
विशेष—अनुप्रास, रूपक और प्रतीप अलकार ।
सवैया
काल्हि भटू मुरली-धुनि मे रसखानि लियौ कहूँ नाम हमारौ।
ता छिन ते भई बैरिनि सास कितौ कियौ झाँकन देति न द्वारौ ॥
२३० रसखान-ग्रन्थावली
होत चवाव बलाई सो आली री जो भरि आँखिन भेंटिये प्यारो ।
वाट परी अव री ठठक्यौ हियरे अटक्यौ पियरे पटवारौ ॥ ११६ ॥
शब्दार्थ—पटू = सखी । चवाव = बदनामी की चर्चा । जो भरि आँखिन =
आँखें खोलकर । वाट परी = रास्ता रुक गया । ठिठक्यौ = रुक गया ।
अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती है
कि हे सखि ! आनन्द-सागर कृष्ण ने अपनी मुरली मे मेरा नाम बजा दिया
था । तभी से मेरी सासू मेरी वैरिण हो गई है, तथा प्रयत्न करने पर भी द्वार
झाँकने नही देती, अर्थात् मैं अपने घर से बाहर निकलने का बहुत प्रयत्न
करती हूँ, किन्तु मेरी सासू मुझे तनिक भी बाहर नही आने देती है । हे सखि !
यदि मैं कृष्ण को तनिक भी आँखे भर कर देख लेती हूँ तो इससे मेरी भारी
बदनामी होती है । जब से कृष्ण मेरे मन मे बसा है, अर्थात् कृष्ण से मुझे प्रेम
हुआ है, तब से मेरा रास्ता और हृदय दोनो रुक गये है, अर्थात् न तो मैं कहीं
बाहर जा सकती हूँ और न अपने हृदय से कृष्ण को ही निकाल सकती हूँ ।
विशेष—अन्तिम पंक्ति मे यमक अलकार है ।
पाठान्तर--इस सवैया की प्रथम पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—
'एक समै मुरली धुनि मे रसखान लियो उन नाम हमारो ।'
सवैया
आजु भटू इक गोपवधू भई बावरी नेकु न अग सम्हारै ।
माई सु धाइ कै टौना सो ढूँढति सास सयानी-सयानी पुकारै ॥
यौ रसखानि घिरौ सिगरौ ब्रज आन को आन उपाय विचारै ।
कोऊ न कान्हर के कर ते वहि वैरिणि वासरिया गहि जारै ॥११७॥
शब्दार्थ—भटू = सखी । टोना = जादू । सयानी = टोना करने वाली ।
आन को आन = अन्य-अन्य प्रकार के । कान्हर के = कृष्ण के । गहि जारै =
लेकर जलाता है ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बाँसुरी के प्रभाव का वर्णन
करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज कृष्ण की बासुरी की ध्वनि सुन कर
एक गोप वधू पागल हो गई, उसे अपने अगो की सम्हालने का तनिक भी
ध्यान नही रहा । उसकी सखियाँ दौड़-दौड कर जादू करने वाली को ढूँढ़ने
लगी, उसकी सासु टोना करने वाली को पुकारने लगी । रसखान कहते हैं कि
व्याख्या भाग २३१
इस प्रकार सारा ब्रज वहाँ आ गया और उस गोपवधू को चारो ओर से घेर
लिया। सब नर-नारी अन्य-अन्य प्रकार के उपकार बताने लगे, लेकिन किसी
की भी समझ मे नही आया कि कृष्ण के हाथ से उस वैरिन बांसुरी को छीन
कर जला दे, क्योकि वह उसी का तो प्रभाव था, जिसके कारण वह गोप वधू
पागल हो गई थी ।
विशेष—बासुरी के प्रभाव का प्रभावोत्पादक वर्णन है ।
पाठान्तर—इस सवैया की द्वितीय पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—
'मात अघात न देवन पूजत सास सयानो सयानो पुकारै ।'
सवैया
कान्ह भए बस बाँसुरी के अब कौन सखि ! हमको चहिहै ।
निसद्यौस रहे सग साथ लगी यह सौतिन तापन क्यौ सहिहै ॥
जिन मोहि लियौ मन मोहन को रसखानि सदा हमको दहिहै ।
मिलि आओ सबै सखि ! भागि चलै अब तौ ब्रज मे बसुरी रहिहै ॥११८॥
शब्दार्थ—कान्ह=कृष्ण । चहिहै=चाहेगा, प्रेम करेगा । निसद्यौस=
रात-दिन । तापन=दुखो को । दहिहै=जलती है, दुख देती है ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की बासुरी के प्रति सौतिया-डाह
प्रकट करती है कि हे सखि ! कृष्ण तो अब बासुरी के वश मे हो गये है, अतः
अब हमे कौन प्यार करेगा ? अर्थात् कृष्ण तो केवल अपनी बाँसुरी को ही प्रेम
करते है, वे हमसे प्रेम नही करेगे । यह बासुरी रात-दिन उनके साथ लगी
रहती है, अतः यह सौतिया दुख हमसे नही सहे जाते । इस बाँसुरी ने दूसरो
का मन मोहने वाले कृष्ण का भी मन मोह लिया है, इसीलिए यह हमे सदैव
दुख देती रहती है। इस दुख से छूटने का तो केवल यही उपाय है कि सारी
सखियाँ इकट्ठी होकर ब्रज से भाग चले, क्योकि अब तो ब्रज मे यह बासुरी ही
रहेगी ।
विशेष—१. नारी के सपत्नी-भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति है ।
२ 'मोहि लियौ मन मोहन को' वाक्यांश विशेष महत्वपूर्ण है ।
तुलना—१. हम ब्रज बसिहैं तो बाँसुरी बसै न यह,
बासुरी बसाइ कान्ह हमे विदा दीजिए ।
—शेख आलम
२. 'धुनि सुनाय चेटक भरी, सुधि नसाय चित चैन ।
बंसी गिरधर घर बसी, हम घर बसी रहै न ॥'
—अज्ञात
२३२ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
ब्रज की वनिता सब घेरि कहैं, तेरो ढारो विगारो कहा कस री ।
अरी तू हमको जम काल भई नैक कान्ह गही तौ कहा रस री ॥
रसखानि भली विधि आनि बनी बसिवो नही देत दिसा दस री ।
हम तो ब्रज को बसिवोई तजौ बस री ब्रज वैरिन तू वसरी ॥ ११९ ॥
शब्दार्थ—ढारो = ढंग । जमकाल = मृत्यु ।
अर्थ—कृष्ण अपनी बाँसुरी को बहुत प्रेम करते है। उसके प्रेम को देख-
कर गोपियो के मन मे उसके प्रति ईर्ष्या और जलन की भावनायें उत्पन्न हो
गई है। अतः ब्रज की सारी नारिया वासुरी को घेर कर उससे पूछती हैं कि
हे बांसुरी ! हममे से किसने तेरा क्या बिगाडा है जो तू हमारे लिए मृत्यु-
काल के समान बन गई है ? अगर कृष्ण ने तुझे जरा सा छू लिया तो तुझे
कौन सा भारी आनन्द प्राप्त हो गया । रसखान कवि कहते है कि गोपियाँ
बांसुरी से कहने लगी कि अब तो हम इस परिणाम पर पहुँच गई हैं कि तू
हमे यहाँ पर थोडे दिन भी नही बसने देगी। हमने तो ब्रज मे रहना ही
छोड़ दिया है, इसलिए हे वैरिन बाँसुरी, तू ही अब ब्रज मे आनन्द से रह ।
विशेष—१. इस कवित्त मे सौतभाव की सुन्दर अभिव्यक्ति है ।
२ अन्तिम पंक्ति मे अनुप्रास का भावपूर्ण प्रयोग है ।
तुलना---‘मैने छाड्यो वृज को री बसिबौ, तू ही या वृज मे वंसी री ।'
—सूरदास
सवैया
बजी है वजी रसखानि वजी सुनिकै अब गोपकुमारी न जी है।
न जी है कोऊ जो कदाचित कामिनी कान मैं वाकी जु तान कुपी है ॥
कुपी है विदेस सदेस न पावति मेरी डव देह को मैन सजी है।
सजी है तौ मेरो कहा बस है सुतौ वैरिनि वासुरी फेरि वजी है ॥ १२० ।
शब्दार्थ—मैन = कामदेव ।
अर्थ—कृष्ण की बासुरी का प्रभाव-वर्णन करते हुए कवि रसखान कहते
है कि कृष्ण की वासुरी बजने पर गोप-कुमारियो का जीवित रहना मुश्किल हो
जाता है । जिस भी कामिनी के कानो मे उस बंशी की धुनि पडती है वह कदा-
चित् जीवित ही नही रह जाती; अर्थात् वशी के माधुर्य मे इतनी तन्मय हो
व्याख्या भाग २३३
जाती है कि वह स्वयं को ही भूल जाती है। किसी-किसी गोपी के मन में
विरह की इतनी प्रबल वेदना जागृत हो जाती है कि वह अपने मन मे कुपित
होकर कहने लगती है कि प्रियतम कितना बुरा है जो विदेश मे रह रहा है,
'पर उसने अभी तक अपना कोई भी संदेश नही भेजा, मेरे सारे शरीर मे तो
अब कामदेव का संचार हो गया है, अर्थात् मन मे मिलन की उत्कंठा बहुत
अधिक बढ़ गई है। इस पर यह बैरिन बाँसुरी बजकर उस विरह वेदना को
और भी अधिक उत्तेजित कर देती है। इसमे मेरा कोई वश नही है।
विशेष—१. सिंहावलोकन अलंकार का भावपूर्ण प्रयोग है।
२. 'तान कुँपी है' मे भावोत्कर्षक शक्ति है।
तुलना—'कीजै कहा राम अब जैए केहि ठाम ऐ री,
फेरि वह बैंरिन बजी है वन बासुरी।'
—द्विजदेव
सवैया
मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माला गरे पहिरौगी।
ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी वन गोधन ग्वारनि संग फिरौगी॥
भाव तो वोहि मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौगी ॥१२८॥
शब्दार्थ—मोर पखा = मोर-मुकुट । पितम्बर = पीला वस्त्र । भावतो =
प्रिय । अधरान = ओठ । अधरा = नीचे ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मै मोर-मुकुट
को अपने गिर के ऊपर पहनूँगी, गुंजो की माला मै पहनूँगी। पीला वस्त्र
ओढ कर और हाथ मे लाठी लेकर तथा ग्वालिन बनकर बन बन मे गायो के
पीछे फिरूँगी। कृष्ण मेरा प्रिय है और उसे प्राप्त करने के लिए तेरे कहने
से सारा स्वाँग भर लूँगी, किन्तु कृष्ण की मुरली को, जो वे ओठो पर रक्खे
रहते है, नीचे नही धरूँगी।
विशेष—अंतिम पक्ति मे यमक अलंकार है।
कालिय दमन
कवित्त
आपनो सो ढोटा हम सब ही को जानत है,
दोऊ प्रानी सब ही के काज नित धावही।
२३४ रसखान-ग्रन्थावली
ते तो रसखानि अब दूर ते तमासो देखैं,
तरनितनूजा के निकट नहिं आवही ।
आन दिन बात अनहितुन सो कहौ कहा,
हितू जेऊ आए ते ये लोचन दुरावही ।
कहा कहौ आली खाली देत सब ठाली, पर
मेरे वनमाली को न काली तें छुरावही ॥१२२॥
शब्दार्थ — छोटा = पुत्र । तरनितनूजा = यमुना । अनहितुन = बुरी ।
हितू = मित्र । वनमाली = कृष्ण ।
अर्थ — यशोदा अपनी सखी से कालिय-दमन का वर्णन करती हुई कहती
है कि हे सखि ! हम (नंद और यशोदा) दोनो सभी गोपो को अपना-सा ही
पुत्र समझते है और दोनो प्रतिदिन दूसरो के काम को दौड आते है; अर्थात्
सदैव दूसरो की सहायता मे तत्पर रहते है । रसखान कहते हैं कि वे ही लोग
जिनकी हमने सदा सहायता की, अब दूर से ही तमाशा देख रहे हैं। कोई भी
यमुना के निकट नही आता । न जाने किसी दिन हमने किससे क्या बुरी बात
कह दी कि जो मित्र थे, वे भी अब आंखे चुरा रहे है; अर्थात् कोई भी कृष्ण
की सहायता के लिए आगे नही बढ़ रहा है । हे सखि ! मै तुमसे क्या कहूँ ।
वैसे तो सब लोग कार्य-निवृत्त है, पर मेरे कृष्ण को कोई भी कालिय नाग से
नही छुडा रहा है ।
विशेष—यशोदा की भययुक्त आतुरता का स्वाभाविक वर्णन है ।
पाठान्तर — इस कवित्त की पाँचवी और छठी पक्ति इस प्रकार भी
मिलती है—
‘अदिन परे ते अनहितू सब भये लोग,
यहै तो अजोग देखि लोचन दुरावही ।’
सवैया
लोग कहैं ब्रज के रसखानि अनंदित नंद जसोमति जू पर ।
छोहरा आजु नयो जनम्यौ तुम सो कोऊ भाग भयौ नहि भू पर ॥
वारि कै दाम सँवार करौ अपने अपवाल कुचाल ललू पर ।
नाचत रावरो लाल गुजाल सो काल सो व्याल-कपाल के ऊपर ।१२३॥
शब्दार्थ — छोहरा = पुत्र, कृष्ण । दाम = धन । अपचाल कुचाल = दुर्दिन ।
व्याख्या भाग २३५.
ललू पर = कृष्ण पर । ब्याल-कपाल = नाग का सिर ।
अर्थ—कृष्ण को कालिय नाग के सिर पर नृत्य करते हुए देखकर ब्रज
के लोग आनन्दित नन्द और यशोदा से कहते है कि तुम्हारे पुत्र ने आज नया
जन्म लिया है, अत इस भूमडल पर तुम जैसा कोई भाग्यशाली नही है । तुम
धन का दास देकर तथा उसे कृष्ण पर न्यौछावर करके अपने दुर्दिनो को नष्ट
कर लो । अव चिन्ता की कोई बात नही है, क्योकि तुम्हारा पुत्र कालिय नाग
के सिर के ऊपर नाच रहा है; अर्थात् इसने नाग को पूर्णतया अपने वश मे
कर लिया है ।
विशेष—तत्कालीन सामाजिक परम्पराओ की ओर सकेत इस सवैया मे
दृष्टिगोचर होते है ।
तुलना— 'जनम को चाली ऐरी अद्भुत है ख्याली आजु,
काली की कनाली पै नचत बनमाली है ।'
—पद्माकर
चीर हरण
सवैया
• एक समै जमुना-जल मैं सब मज्जन हेत धसी ब्रज-गोरी ।
त्यौ रसखानि गयौ मनमोहन लै कर चीर कदम्ब की छोरी ॥
न्हाइ जबै निकसी बनिता चहु ओर चितै चित रोष करो री ।
हार हिये भरि भावन सो पट दीने लला वचनामृत बोरी ॥१२८॥
शब्दार्थ—मज्जन हेत=न्हाने के लिए । छोटी=चोटी । रोष=क्रोध ।
वचनामृत=अमृत जैसे सुखद वचन । बोरी=डूब गईं ।
अर्थ—चीरहरण लीला का वर्णन करते हुए रसखान कवि कहते है कि
एक समय की बात है कि सब ब्रज की स्त्रियाँ नहाने के लिए यमुना के जल मे
उतरी । तभी उनके वस्त्रो को लेकर श्रीकृष्ण कदम्ब वृक्ष की चोटी पर चढ
गये । स्नान करके जब वे स्त्रियाँ बाहर निकली और चारो ओर देखने पर भी
अपने वस्त्रो को न पा सकी तो क्रुद्ध हो गई । जब उन्होने अपनी हार स्वीकार
कर ली तो अनेक प्रकार के प्रेमपूर्ण भावो से भरकर कृष्ण ने उनके वस्त्र
लौटा दिये और उनसे जो प्रेमपूर्ण बाते की, उनके अमृत जैसे सुखद वचनो को
सुनकर सारी स्त्रियाँ आनन्द मे डूब गई ।
२३६ रसखान-ग्रन्थाव०..
प्रेमासक्ति
सवैया
प्रान वही जु रहै रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ ।
सीस वही जिन वे परसे पद अक वही जिन वा परसायौ ॥
दूध वही जु दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ ।
और कहाँ लौ कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौ ॥१२५॥
शब्दार्थ - सरल है ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि वे ही प्राण हैं जो कृष्ण
पर रीझ जाये, वही रूप है जो कृष्ण को रिझाले । वही सिर है जो कृष्ण के
चरणो का स्पर्श करे, हृदय वही है जिससे कृष्ण का स्पर्श किया गया हो । वही
दूध है जो कृष्ण ने दुहा है, वही दही है जो उसने बिखेरी है । रसखान कवि
कहते हैं कि और कहाँ तक कहूँ, भाव भी वही है जो कृष्ण को अच्छा
लगता है ।
कहने का अभिप्राय यह है कि इन्द्रियो की और भावो की सार्थकता तभी
है जब वे कृष्ण को या तो अपनी ओर आकृष्ट कर सके, अथवा उसकी ओर
आकृष्ट हो जाये ।
सवैया
देखन कौ सखी नैन भए न सबै तन आवत गाइन पाछै ।
कान भए प्रति रोम नही सुनिबे कीँ अमीनिधि बोलनि आछै ॥
ए सजनी न सम्भारि भरै वह वाँकी विलोकनि कोर कटाछै ।
भूमि भयौ न हियो मेरी अली जहाँ हरि खेलत काछनी काछै ॥१२६॥
शब्दार्थ - अमीनिधि = अमृत-सागर । कटाछै = कटाक्ष । आली = सखी ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई
कहती है कि कृष्ण गायो के पीछे आ रहे है। अच्छा होता कि मेरे सारे शरीर
मे नैन होते, ताकि मैं उसकी शोभा को पूरी तरह देख पाती । अमृत-सागर
से भरे हुए वह जो मीठे वचन बोलता है, उन्हे सुनने के लिए मेरे रोम-रोम
मे कान क्यो नही हो गये । हे सखि ! उसकी कटाक्ष भरी हुई सुन्दर चितवन
संभालने से संभाली नही जाती, अर्थात् उसका प्रभाव बिना पड़े नही रह
पाता। हे सखि ! मेरा हृदय वह पृथ्वी क्यो नही बन गया, जहाँ काछनी
व्याख्या भाग २३७
पहनकर कृष्ण खेलते है ।
तुलना-१. 'देखिबे को स्याम सोम देतो दृग रोम-रोम,
कीनो सो न बिधि औ अविधि कीनी पलके ।'
—सोमनाथ
२. 'चाहित जुगल किसोर लखि ,लोचन जुगल अनेक ।'
—बिहारी
३. 'कीजै कहा राम, स्याम आनन बिलोकिबे को,
विरचि बिरचि न अनन्त अँखिया दई ।'
—पद्माकर
सवैया
मोरपखा मुरली बनमाल लखे हिय को हियरा उमह्यौ री,
ता दिन ते इन बैरिनि को कहि कौन न बोल कुबोल सह्यौ री ॥
तौ रसखानि सनेह लग्यौ कोउ एक कह्यौ कोउ लाख कह्यौ री ॥
और तो रग रह्यौ न रह्यौ इक रग रंगी सोह रग रह्यौरी ॥१२१॥
शब्दार्थ—मोरपखा=मोर-पखो का मुकुट । उमह्यौ=उमड़ रहा है ।
बोल-कुबोल=अच्छी-बुरी । रसखनि=आनन्द-सागर कृष्ण । रग=आदत ।
रंग=प्रेम ।
अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन अपनी सखी से
करती हुई कहती है कि जिस दिन से मैंने मोर-पखो का मुकुट, मुरली और
बनमाल को धारण करने वाले कृष्ण को देखा है और मेरे हृदय का भी
हृदय उमड़ रहा है, उस दिन से इन बैरिन बदनामी करने वाली स्त्रियो की
कौन-सी ऐसी अच्छी और बुरी बात है, जो मैने नही सही । जब आनन्द-
सागर कृष्ण से प्रेम हो ही गया है तो चाहे कोई एक कहे या लाख कहे, यह
प्रेम नही छूट सकता । मुझे और तो आदत रही चाहे न रही, पर कृष्ण के
प्रेम मे इस प्रकार र ग गई हूँ कि अब यही रग शेष रह गया है ।
विशेष—१. यमक, छेकानुप्रास अलंकारो का भाव पूर्ण प्रयोग है ।
२ प्रेम की मान्यता वर्णित है ।
पाठांतर—इस सवैये की अतिम दो पक्तियाँ इस प्रकार भी मिलती है—
'अब तो रसखान सो नेह लग्यौ कोउ एक कह्यो किन लाख कह्यौ री ।
और सो रंग रह्यौ न रह्यौ इक रग रंगीले सो रंग रह्यौ री ।'
२३८ रसखान-ग्रन्थावली
झुलना-१. 'तुम गाँवरे नांवरे कोऊ घरो हम साँवरे रंग रंगी सो रंगी।'
२. 'अब कोऊ कितैऊ कहै किनरी जु ही स्याम के रंग रंगी सो रंगी।'
—द्विजदेव
३. 'रंग दूसरो और चढ़ैगो नही अलि साँवरो रंग रग्यो सो रग्यो।'
—हरिश्चन्द्र
सवैया
वन बाग तडागनि कु जगली अखियाँ सुख पाइहै देखि दई।
अब गोकुल माँझ विलोकियैगी वह गोप सभाग सुभाय रई॥
मिलिहै हँसि गाइ कवै रसखानि कवै ब्रजवालनि प्रेम भई।
वह नील निचोल के घूँघट की छवि देखबी देखन लाज लई ॥१२८॥
शब्दार्थ—सभाग = भाग्यशाली। रई = युक्त। निचोल = वस्त्र। लाज-
लई = लज्जा युक्त।
अर्थ-कोई गोपी अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि हे
सखि ! कृष्ण को वन मे, बाग मे, तड़ागो मे और कुंज-गलियो मे देखकर तो
मेरी आँखो ने सुख प्राप्त कर लिया है, अब मेरी इच्छा यह है कि उस भाग्य-
शाली सुन्दरता से युक्त कृष्ण को गोकुल के बीच कब देखू गी। वह कृष्ण
प्रेममयी, ब्रज-बालाओ के मध्य मे कब हंसकर तथा मिलकर रासलीला
करेगा ? और मैं कब अपने पीले वस्त्र के घूघट के बीच से लज्जायुक्त होकर
उसकी शोभा देखूंगी।
पाठान्तर—वन बाग तडागन कुंज गली अखियां सुख पाइ है देखि दई ।
कब गोकुल माँझ विलोकैहिगी छवि सो वह गोप सभा गरई ।
मिलि हैं हँसि गारी दै के रसखान कवै ब्रज वालनि प्रेम मई।
वह नील निचोल के घूँघट की कब देखवी देखन लाज लई ॥
सवैया
काल्हि पऱ्यी मुरली-धुनि मैं रसखानि जू कानन नाम हमारो।
ता दिन ते नहिं धीर रखो जग जानि लयो अति कीनौ पँवारो ॥
गाँवन गाँवन मैं अब तौ बदनाम भई सब सो कै किनारो।
तौ सजनी फिरि फेरि कहौं पिय मेरो वही जग ठोकि नगारो ॥१२६॥
शब्दार्थ—काल्हि = कल। कानन = कानो मे। पँवारो = झंझट। सब सों
व्याख्या भाग २३६
कै किनारो = सब से ही किनारा कर लिया, सबसे अलग हो गई । ठोकि
नगारो = नगारा बजाकर ।
अर्थ —मुरली के प्रभाव का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से
कह रही है कि हे सखि ! कल आनन्द-सागर कृष्ण के द्वारा मुरली मे लिया
हुआ मेरा नाम जब मेरे कानो मे पडा तो उसी दिन से (उसी समय से) मेरे
मन का धैर्य जाता रहा । सारे संसार को यह मालूम हो गया है कि मैने
अपनी जान को झंझट पाल लिया है । कृष्ण से प्रेम करने के कारण अब तो
मैं प्रत्येक गाँव मे बदनाम हो गई हूँ, इसीलिए सबसे अलग भी हो गई हूँ ।
इसीलिए हे सजनी ! मैं तुझ से फिर उसी बात को दोहराती हूँ कि कृष्ण ही
मेरा प्रियतम है । इस बात को मै संसार मे नगारा पीटकर कह रही हूँ ।
विशेष—इस सवैये मे 'सब सो कै किनारो,' और 'ठोकि नगारो' मुहावरों
का भावपूर्ण प्रयोग है ।
सवैया
देखि हौ आँखिन सो पिय को अरु कानन सो उन बैन को प्यारी ।
बाके अनगनि रंगनि की सुरभीनि सुगन्धनि नाक मैं डारो ॥
त्यौ रसखानि हिये मैं धरौ वहि सांवरी मूरति मैन उजारी ।
गाँव भरौ कोउ नाँव धरौ पुनि साँवरी हो बनिहो सुकुमारी ॥१३०॥
शब्दार्थ—कानन सो = कानो से । सुरभीनि सुगन्धनि = नाना प्रकार को
सुगन्धियो की गन्ध । मैन-उजारी = कामदेव से सुन्दर । नाव धरौ = नाम करो,
निन्दा करो ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती
हुई कहती है कि मैं अब इन अपनी आँखो से केवल प्रियतम कृष्ण का ही
दर्शन करूँगी और इन कानो से केवल उनकी प्रिय बासुरी को ही सुनूँगी ।
उसके बाँके कामदेव जैसी छवि की नाना प्रकार की सुगन्धियो की गन्ध को
अपनी नाक मे डालूगी । इस प्रकार मै उस आनन्द सागर की कामदेव से
भी सुन्दर मूर्ति को अपने हृदय मे धारण करूँगी । अब चाहे गाँव के सारे
निवासी मेरी कितनी ही निन्दा करे मैं कृष्ण के प्रति अपने अचल अनुराग को
नही छोड़ूँगी ।
२४०
रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
तुम चाहो सो कहौ हम तौ नन्दवारे के संग ठईं सो ठईं ।
तुम ही कुलवौने प्रवीने सबै हम ही कुछ छाडि गईं सो गईं ।
रसखान यो प्रीत की रीत नई सु कलंक की मोटैं लई सो लईं ।
यह गाव के वासी हँसै सो हँसै हम स्याम की दासी भई सो भईं ॥१३१॥
शब्दार्थ—नन्दवारे के संग=कृष्ण के साथ । ठईं सो ठईं =दृढ़ सकल्प
करके मिल चुकी है । कुलवीने=कुलवान । मोटैं=गठरियाँ ।
अर्थ—गोपिया किसी अन्य गोपी से जो उन्हे कृष्ण प्रेम से विरत करना
चाहती है, कहती है कि तुम जो चाहो हम को कह लो , लेकिन हम तो दृढ़
संकल्प करके कृष्ण के साथ मिल चुकी है, अर्थात् उससे प्रेम-सम्बन्ध स्थापित
कर चुकी हैं । तुम ही सब प्रकार से कुलवती और प्रवीण सही, पर हमने तो
कुल की मर्यादा को तिलाजलि दे दी है । हमारे प्रेम की यह रीति नही है,
हमे जो भी बदनामी की गठरिया मिली हैं, उन्हे हमने सहर्ष स्वीकार कर
लिया है । अब चाहे हमारे ग्राम के निवासी हम पर कितना ही हँसें, पर हम
तो कृष्ण की दासी बन ही चुकी हैं ।
विशेष—१. गोपियो के अनन्य प्रेम की सुन्दर व्यंजना है ।
२. वीप्सा अलकार का प्रयोग प्रभावोत्पादक है ।
३. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रंथावली' मे नही है ।
सवैया
मोर पखा धरे चारिक चारु विराजत कोटि अमेठनि फैंटो ।
गुंज छरा रसखान विसाल अनग लजावत अंग करैंटो ।
ऊँचे अटा चढि एड़ी ऊँचाइ हितौ हुलसाय कैं हौंस लपेटो ।
हौ कब के लखि हौं भरि आँखिन आवत गोधन धूरि घुरैंटो ।१३२।
शब्दार्थ—चारिक=चार-एक अर्थात् थोडे-से । कोटि अमेठनि फैंटो =
करोड़ो पेचो से युक्त पगड़ी । गुंजछरा=गुंज की माला, एक आभूषण विशेष ।
अनग=कामदेव । अंग करैंटो=स्याम शरीर । हौंस=अभिलाषा । भरि
आँखिन=आँखो मे भरकर । गोधन धूर धुरैंटो=गोओ की धूल से भूसरित ।
अर्थ—शाम को घर लौटते हुए कृष्ण की शोभा का वर्णन कोई गोपी-
व्याख्या भाग २४१
अपनी सखी से करती हुई कह रही है कि हे सखि ! वह सिर पर थोडे-से
मोर-पंखो का मुकुट धारण किए हुए है। उनकी करोडो पेचो से युक्त
पगडी अत्यन्त शोभायमान हो रही है। उनके हृदय पर पडी हुई विशाल
गुंजमाला तथा श्याम शरीर कामदेव को भी लज्जित करता है। मैने उन्हे
ऊँची अटारी पर चढ कर तथा उचक कर हृदय मे हुलस कर अनेक अभि-
लाषाओ से युक्त होकर देखा है। मै गौओ की धूल से धूसरित होकर आते
हुए कृष्ण को बहुत देर से आँखे भरकर देख रही हूँ।
विशेष—१ तृतीय पंक्ति मे औत्सुक्य भावो की सुन्दर योजना है।
२. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र सम्पादित 'रसखान
ग्रंथावली' मे नही है।
सवैया
कुंजनि कुंजनि गुंज के पुंजनि मजु लतानि सौ माल बनैबो।
मालती मल्लिका कुंद सौ गूंदि हरा हरि के हियरा पहिरैबो॥
आली कबै इन भावने भाइन आपुन रीझि कै प्यारे रिझैवो।
माइ भकै हरि हाँकरिबो रसखानि तकै फिरि कै मुसकैबो॥१३३॥
शब्दार्थ—पुंजनि=समूह । हरा=हार । आली=सखी । भावते
भाइन=प्रिय भाव। हाकरिबौ=पुकारना।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई
कहती है कि कुंज-कुंज के गुंजो के समूहो को इकट्ठा करके उनकी सुन्दर
लताओ से माला बनाऊँगी। मालती मल्लिका और कुंदो से हार गूँथकर
कृष्ण के हृदय पर पहनाऊँगी. हे सखि ! न जाने कब इन प्रिय भावो से स्वय
ही रीझकर अपने प्रिय कृष्ण को स्थिर पाऊँगी। मै यथाशक्ति उन्हे पुका-
रूंगी. वे पीछे की ओर देखेगे और तब मै उनकी ओर मुडकर पुरस्कार
दूँगी।
पाठान्तर—इस सवैया की चौथी पंक्ति इस प्रकार भी मिलती है—
'पाइ लुकै दुरि हाँ करिबो रसखान तकै फिरि कै मुसकैवो।'
सवैया
सब धीरज क्यो न धरौ सजनी पिय तो तुम सो अनुरागेइगौ।
जब जोग संजोग को आन बनै तब जोग विजोग को मानेइगौ।
२४२ रसखान-ग्रन्थावली
निसचै निरधार धरौ जिय मे रसखान सर्व रस पावेडगी ।
जिनके मन सो मन लागि रहे तिनके तन माँ तन लागेइगो ॥१३४॥
शब्दार्थ — अनुरागेइगी = अवश्य प्रेम करेगा । निसचै = निश्चय । रस =
आनन्द ।
अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि !
तू सब प्रकार से अपने मन मे धैर्य धारण कर, क्योंकि एक न एक दिन प्रियतम
कृष्ण तुमसे अवश्य प्रेम करेगा । जब मिलने का समय आयेगा तो वियोग की
घडियाँ नष्ट हो जाएँगी । तुम निश्चय ही अपने हृदय मे धैर्य धारण करो,
क्योकि तुम आनन्द-सागर कृष्ण से अवश्य आनंद प्राप्त करोगी । जिसके मन मे
तेरा मन लगा हुआ है, उसके शरीर मे भी तेरे शरीर का मिलन होगा ।
विशेष — यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रन्थावली' मे नही है ।
सवैया
उनही के सनेहन सानी रहें उनही के जु नेह दिवानी रहें ।
उनही की सुनै न औ बैन त्यौं सैन सो चैन अनेकन ठानी रहें ॥
उनही सँग डोलन मैं रसखान सबै सुखसिन्धु अघानी रहें ।
उनही बिन ज्यों जलहीन ह्वै मीन सी आँखि मेरी असुवानी रहें ॥१३५॥
शब्दार्थ — सनेहन = प्रेम । सानी रहें = परिपूर्ण रहती है । अघानी =
तृप्त ।
अर्थ — अपनी प्रेमावस्था का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से
कह रही है कि हे सखि ! मेरा मन उसी कृष्ण के प्रेम से परिपूर्ण रहता है, मैं
उन्ही के प्रेम मे पागल बनी हुई हूँ । मेरे कान केवल उन्ही की बातो को सुनते
हैं, और किसी प्रकार की वाणी को नही सुनते । उनकी चितवन ही मुझे
अनेक प्रकार से आनंद प्रदान करती है । मैं उन्ही के साथ रहने मे इतना
सुख-सागर प्राप्त कर लेती हू कि पूर्णतया तृप्त हो जाती हूँ । उनके बिना मेरी
आँखे आँसुओ मे डूबकर इस प्रकार तडपती रहती है जिस प्रकार पानी के
बिना मछली ।
विशेष — १. आनन्द-भाव के प्रेम का वर्णन है ।
२. उपमा अलकार ।
व्याख्या भाग २४३
प्रेम-बन्धन
सवैया
चंदन खोर पै बिन्दु लगाय कै कु जन ते निकस्यौ मुसकातो ।
राजत है बनमाल गरे अरु मोरपखा सिर पै फहरातो ।
मै जब ते रसखान बिलोकति ही कछु और न मोहि सुहातो ।
प्रीति की रीति मे लाज कहा सखि है सब सो बडनेह को नातो ॥१३६॥
शब्दार्थ—खोर=तिलक । नेह=प्रेम । बड=बडा, महत्वपूर्ण ।
अर्थ—कोई गोपी कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हुई अपनी
सखी से कह रही है कि हे सखि ! चन्दन के तिलक पर बिन्दी लगाकर कृष्ण
मुस्कराता हुआ कुंजो से निकला । उसके गले मे बनमाला सुशोभित थी और
सिर पर मोर-पखो का मुकुट फहरा रहा था । मैने जब से आनन्द-सागर
कृष्ण की इस शोभा को देखा है तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता । हे
सखि ! प्रेम की रीति मे लज्जा त्याज्य है, क्योकि प्रेम का सम्बन्ध सबसे
बड़ा सम्बन्ध है ।
विशेष—यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रथावली' मे नही है ।
सवैया
कौन को लाल सलोनी सखी वह जाकी बडी अँखियाँ अनियारी ।
जोहन बक बिसाल के बाननि बेधत है घट तीछन भारी ॥
रसखानि सम्हारि परै नहि चोट सु कोटि उपाय करे सुखकारी ।
भाल लिख्यौ विधि हेत को बंधन खोलि सकै ऐसो को हितकारी ॥१३७॥
शब्दार्थ—लाल=पुत्र । सलोनो=सुन्दर । अनियारी=विलक्षण ।
जोहन=दृष्टि । विधि=ब्रह्मा । हेत=प्रेम ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के विषय मे पूछती है कि हे
सखि ! यह सुन्दर पुत्र किसका है जिसकी बडी बडी विलक्षण आँखे है । यह
विशाल वंक दृष्टि रूपी भारी तीक्ष्ण बाणो से हृदय को बेधता है । रसखान
कहते हैं कि चाहे कोई करोडो सुखकारी उपाय करे, पर इन बाणो की चोट
को नही संभाल सकता । यदि भाग्य मे ब्रह्मा ने प्रेम का बंधन लिख दिया
हो तो ऐसा कोई भी हितकारी नही है जो इस बंधन को खोल सके ।
४. दान-लीला (राधा-कृष्ण दान प्रसंग व कवित्त)
२४४ रसखान-ग्रन्थावली
विशेष—अंतिम पंक्ति मे विवशता के माध्यम से प्रेम की दृढ़ता का
वर्णन है।
नेत्रोपालम्भ
सवैया
अली पगे रँगे जे रंग सावरे मो पै न आवत लालची नैना ।
धावत है उतही जित मोहन रोके एकै नहि घूँघट ऐना ॥
काननि कौ कल नाहि परै सखी प्रेम सो भीजे सुने बिन बैना ।
रसखानि भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यौ हूँ छूटै ना ॥१३८॥
शब्दार्थ—आली = सखी । रंग = प्रेम । ऐना = घर । काननि कौ =
कानो को । कल = चैन ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपने प्रेम का वर्णन करती हुई कहती
है कि हे सखि ! मेरे ये लालची नेत्र कृष्ण के प्रेम मे इस प्रकार बन्दी हो
गये है कि अब ये मेरे वश मे नही रहे । ये जिस ओर भी कृष्ण को देखते हैं,
उसी ओर दौड़ने लगते हैं और घूँघट के घर मे भी नही रुकते, अर्थात् चाहे
जितना आवरण इनके ऊपर डाला जाये, ये उस आवरण को भेद कर भी
कृष्ण की ओर दौड़ते हैं। हे सखि ! प्रेम से भीगे हुए वचनों को सुने बिना
इन कानो को चैन नही मिलता, अर्थात् ये कान प्रिय की मधुर बातो को सुनने
के लिए सदैव आकुल रहते हैं। रसखान कहते हैं कि मेरी ये आँखें शहद की
मक्खियाँ बन गई हैं, अत अब प्रेम का वन्धन किस प्रकार छूट सकता है ?
कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार शहद की मक्खियाँ अपने ही बनाये हुए
शहद मे बंदी हो जाती हैं, उसी प्रकार मेरे नेत्र अपने द्वारा ही उत्पन्न किये
गये प्रेम मे बन्दी बन गये हैं ।
विशेष—१. अंतिम पंक्ति मे रूपक अलंकार है ।
२ आँखों को मधु मक्खी बताना बहुत ही भावपूर्ण है ।
सवैया
श्री वृषभान की छान धुजा अटकी लरकान ते आन लई री ।
वा रसखान के पानि की जानि छुडावति राधिका प्रेममई री ।
जीवन मूरि सी नेज लिये इनहूँ चितयौ उनहूँ चितई री ।
लाल लली दृग जोरत ही सुरझानि गुडी उरझाय दई री ॥१३६॥