रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 259, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ रसखान-ग्रन्थावली
निसचै निरधार धरौ जिय मे रसखान सर्व रस पावेडगी ।
जिनके मन सो मन लागि रहे तिनके तन माँ तन लागेइगो ॥१३४॥
शब्दार्थ — अनुरागेइगी = अवश्य प्रेम करेगा । निसचै = निश्चय । रस =
आनन्द ।
अर्थ — कोई गोपी अपनी सखी को समझाती हुई कहती है कि हे सखि !
तू सब प्रकार से अपने मन मे धैर्य धारण कर, क्योंकि एक न एक दिन प्रियतम
कृष्ण तुमसे अवश्य प्रेम करेगा । जब मिलने का समय आयेगा तो वियोग की
घडियाँ नष्ट हो जाएँगी । तुम निश्चय ही अपने हृदय मे धैर्य धारण करो,
क्योकि तुम आनन्द-सागर कृष्ण से अवश्य आनंद प्राप्त करोगी । जिसके मन मे
तेरा मन लगा हुआ है, उसके शरीर मे भी तेरे शरीर का मिलन होगा ।
विशेष — यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
ग्रन्थावली' मे नही है ।
सवैया
उनही के सनेहन सानी रहें उनही के जु नेह दिवानी रहें ।
उनही की सुनै न औ बैन त्यौं सैन सो चैन अनेकन ठानी रहें ॥
उनही सँग डोलन मैं रसखान सबै सुखसिन्धु अघानी रहें ।
उनही बिन ज्यों जलहीन ह्वै मीन सी आँखि मेरी असुवानी रहें ॥१३५॥
शब्दार्थ — सनेहन = प्रेम । सानी रहें = परिपूर्ण रहती है । अघानी =
तृप्त ।
अर्थ — अपनी प्रेमावस्था का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से
कह रही है कि हे सखि ! मेरा मन उसी कृष्ण के प्रेम से परिपूर्ण रहता है, मैं
उन्ही के प्रेम मे पागल बनी हुई हूँ । मेरे कान केवल उन्ही की बातो को सुनते
हैं, और किसी प्रकार की वाणी को नही सुनते । उनकी चितवन ही मुझे
अनेक प्रकार से आनंद प्रदान करती है । मैं उन्ही के साथ रहने मे इतना
सुख-सागर प्राप्त कर लेती हू कि पूर्णतया तृप्त हो जाती हूँ । उनके बिना मेरी
आँखे आँसुओ मे डूबकर इस प्रकार तडपती रहती है जिस प्रकार पानी के
बिना मछली ।
विशेष — १. आनन्द-भाव के प्रेम का वर्णन है ।
२. उपमा अलकार ।