रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग २२७
सवैया
डोरि लियौ मन मोरि लियो चित जोहि लियौ हित तोरि कै कानन ।
कुंजनि ते निकस्यौ सजनी मुसकाइ कह्यौ वह सुन्दर आनन ॥
हो रसखानि भई रसमत्त सखी सुनि के कल बाँसुरी कानन ।
मत्त भई बन वीथिन डोलति मानति काहू की नेकु न आनन ॥ १११ ॥
शब्दार्थ—डोरि लियौ=बाँध लिया। हित=प्रेम । कान=मर्यादा ।
आनन=मुख । कानन=बन । आनन=बाधाएँ ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की शोभा का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! कृष्ण ने मेरे मन को बाँध लिया है, चित्त को चुरा लिया
है, मर्यादा तोडकर मुझसे प्रेम जोड लिया है। हे सजनी ! वह अपने सुन्दर
मुख पर मुस्कराहट लिए कुंजो मे से निकला । रसखान कहते है कि हे सखि
बन मे उसकी मधुर बाँसुरी को सुनकर मैं रसमत्त हो गई । तभी से मै उन्मत्त
होकर वन-वन और गली-गली घूमती फिर रही हूँ और किसी भी प्रकार की
बाधाओ को नही मानती ! अर्थात् अब मुझे किसी भी प्रकार की बाधा का
डर नही रहा है ।
सवैया
मेरो सुभाव चितैवे को माइ री लाल निहारि कै बसी बजाई ।
वा दिन ते मोहि लागी ठगौरी सी लोग कहै कोई बावरी आई ॥
यौ रसखानि घिरयो सिगरो ब्रज जानत वे कि मेरो जियराई ।
जौ कोउ चाहै भलौ अपनो तौ सनेह न काहू सो कीजियौ माई ॥ ११२ ॥
शब्दार्थ—चित्तैवे को=देखने के लिए । निहारि के=देखकर । ठगौरी
=जादू । जियराई=हृदय ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! मेरा स्वभाव
देखने के लिए, मुझे देखकर,कृष्ण ने अपनी वंशी बजाई । उसी दिन से मुझ पर
जादू-सा चल गया है । लोग मुझे देखकर कहते है कि कोई पगली आ गई है,
अर्थात् लोग मुझे पगली समझते है । रसखान कहते हैं कि इस प्रकार सारे
ब्रज के निवासी मुझे घेर लेते है । मेरे मन की या तो कृष्ण जानते है या मैं
स्वय जानती हूँ । यदि इस जगत् मे कोई अपना भला चाहता है तो उसे कभी -
भी किसी से प्रेम नही करना चाहिए ।