रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ रसखान-ग्रन्थावली
झुलना-१. 'तुम गाँवरे नांवरे कोऊ घरो हम साँवरे रंग रंगी सो रंगी।'
२. 'अब कोऊ कितैऊ कहै किनरी जु ही स्याम के रंग रंगी सो रंगी।'
—द्विजदेव
३. 'रंग दूसरो और चढ़ैगो नही अलि साँवरो रंग रग्यो सो रग्यो।'
—हरिश्चन्द्र
सवैया
वन बाग तडागनि कु जगली अखियाँ सुख पाइहै देखि दई।
अब गोकुल माँझ विलोकियैगी वह गोप सभाग सुभाय रई॥
मिलिहै हँसि गाइ कवै रसखानि कवै ब्रजवालनि प्रेम भई।
वह नील निचोल के घूँघट की छवि देखबी देखन लाज लई ॥१२८॥
शब्दार्थ—सभाग = भाग्यशाली। रई = युक्त। निचोल = वस्त्र। लाज-
लई = लज्जा युक्त।
अर्थ-कोई गोपी अपनी अभिलाषा प्रकट करती हुई कहती है कि हे
सखि ! कृष्ण को वन मे, बाग मे, तड़ागो मे और कुंज-गलियो मे देखकर तो
मेरी आँखो ने सुख प्राप्त कर लिया है, अब मेरी इच्छा यह है कि उस भाग्य-
शाली सुन्दरता से युक्त कृष्ण को गोकुल के बीच कब देखू गी। वह कृष्ण
प्रेममयी, ब्रज-बालाओ के मध्य मे कब हंसकर तथा मिलकर रासलीला
करेगा ? और मैं कब अपने पीले वस्त्र के घूघट के बीच से लज्जायुक्त होकर
उसकी शोभा देखूंगी।
पाठान्तर—वन बाग तडागन कुंज गली अखियां सुख पाइ है देखि दई ।
कब गोकुल माँझ विलोकैहिगी छवि सो वह गोप सभा गरई ।
मिलि हैं हँसि गारी दै के रसखान कवै ब्रज वालनि प्रेम मई।
वह नील निचोल के घूँघट की कब देखवी देखन लाज लई ॥
सवैया
काल्हि पऱ्यी मुरली-धुनि मैं रसखानि जू कानन नाम हमारो।
ता दिन ते नहिं धीर रखो जग जानि लयो अति कीनौ पँवारो ॥
गाँवन गाँवन मैं अब तौ बदनाम भई सब सो कै किनारो।
तौ सजनी फिरि फेरि कहौं पिय मेरो वही जग ठोकि नगारो ॥१२६॥
शब्दार्थ—काल्हि = कल। कानन = कानो मे। पँवारो = झंझट। सब सों