रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ रसखान-ग्रन्थावली
सवैया
जात हुती जमुना जल कों मनमोहन घेरि लयौ मग आइ कै।
मोद भयौ लपटाइ लयौ पट घूँघट ढारि दयौ चित चाइ कै॥
और कहा रसखानि कहौं मुख चूमत घातन बात बनाइ कै।
कैसे निभै कुल-कानि रही हिये साँवरी मूरति की छवि छाइ कै॥५५॥
शब्दार्थ-जात हुती = जा रही थी ।
अर्थ-काई गोपी अपनी सखी से पनघट-लीला का वर्णन करती हुई कह
रही है कि हे सखि ! मैं यमुना मे पानी भरने के लिए जा रही थी कि कृष्ण
ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया । प्रसन्न होकर उसने मुझे अपने शरीर से
लिपटा लिया और जान-बूझकर उसने मेरे मुख पर पड़ा हुआ घूँघट हटा
दिया । हे सखि ! मैं और तो क्या कहूँ, वह बाते बनाकर और अवसर निकाल
कर मेरा मुख चूमने लगा । अब वंश की मर्यादा का पालन किस प्रकार हो
सकता है, क्योकि मेरे हृदय मे कृष्ण की साँवरी मूर्ति की शोभा बस गई है ।
सवैया
जा दिन ते निरख्यौ नदनंदन कानि तजी कर बंधन टूट्यौ ।
चारु विलोकिन कीनी सुमार सम्हार गई मन मोर ने लूट्यौ ॥
सागर को सलिला जिमि धावै न रोकी रुकै कुल को पुल टूट्यौ ।
मत्त भयौ मन सग फिरे रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ॥ ५६॥
शब्दार्थ-निरख्यौ = देखा । कानि = मर्यादा । चारु - सुन्दर । विलो-
कनि = दृष्टि । सुमार = गहरी चोट । सम्हार = सुधि । मार = स्मर, कामदेव ।
सलिला = नदी । सरूप = सौन्दर्य ।
अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सखि ! जिस दिन से मैंने कृष्ण को देखा है, उसी दिन से
मर्यादा त्याग दी है, घर का बंधन छूट गया है । उसकी सुन्दर दृष्टि ने मेरे
हृदय पर गहरी चोट की है जिसके कारण मैं अपनी सुधि खो बैठी हूँ और
कामदेव ने मेरे मन को लूट लिया है । जिस प्रकार नदी अपना पुल तोड़कर
सागर की ओर दौड़ती है और रोके से नही रुकती, उसी प्रकार मेरे कुल की
मर्यादा का पुल टूट गया है और मेरा मन प्रवाघ गति से कृष्ण की ओर दौड़
रहा है। मेरा मन पागल हो गया है और यह आनन्द-सागर कृष्ण के साथ-साथ
फिरता है क्योकि इसने उनके सौन्दर्य की अमृत के आनन्द को पी लिया है।