रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १६३
अर्थ—कोई व्याकुल गोपी यमुना के किनारो से, कदम्ब तथा करील के वृक्षों
से पूछती है कि तुम्हारे साथ रहने वाला वह कृष्ण कहाँ चला गया जिसका मुख
मलीन है ग्रीवा अत्यन्त भरी हुई है, अर्थात् पुष्ट है । वह प्रेम रूपी खेल मे हारा
हुआ हमारा चोर है जो लज्जित-सा होकर हमारे बघन (फदे) से निकल कर
भाग गया है । अत्यन्त सुन्दर रूप और केश को हमे दिखाने वाला, जिसे देखते
उसका सौन्दर्य आँखो मे गड गया, वह कृष्ण कहाँ है ? उसका मुकुट झुका
हुआ है, उसके हृदय पर सुन्दर हार पडा हुआ है, वह अपनी कमर मे पीला
वस्त्र बाँधे हुए है और श्याम रग का है ।
विशेष—परोक्ष रीति से कृष्ण के सौन्दर्य का भावपूर्ण वर्णन है ।
सवैया
भौह भरी सुथरी बरुनी अति ही अधरानि रच्यौ रग रातो ।
कुंडल लोल कपोल महाछबि कुंजन तै निकस्यौ मुसकातो ॥
छूटि गयौ रसखानि लखै उर भूलि गई तन की सुधि सातो ।
फूटि गयौ सिर तै दधि भाजन टूटिगौ नैन न लाज को नातो ॥ ५४ ॥
शब्दार्थ—सुथरी = सुन्दर । बरुनी = पलके । रग रातो = लाल रंग ।
लोल = चंचल । सातो = सातो इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि)
अर्थ—कृष्ण से भेट हो जाने पर गोपी की क्या दशा हुई, उसी का वह
वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण के भौहे भरी हुई थी,
पलके सुन्दर थी और अधर लाल रंग से रगे हुए-से जान पड़ते थे, अर्थात् वे
लालिमा से भरे हुए थे । उसके कानो मे कुडल थे जिनकी चंचलता
(हिलने-डुलने) के कारण कपोलो पर भारी शोभा व्याप्त थी । ऐसा सौन्दर्य
धारी कृष्ण कुजो मे से मुसकराता हुआ निकला । उस आनन्द-सागर कृष्ण
को देखते ही मेरा हृदय जोर-जोर से धडकने लगा, मेरी सातो इन्द्रियाँ (पाँच
ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) अपनी सुधि-बुधि भूल गई । मै इतनी बेसुध-सी
हो गई कि मुझे अपने सिर पर रखे हुए दही के मटके का भी ध्यान नही रहा
और वह सिर से पृथ्वी पर गिर कर फूट गया तथा आँखो से लाज का सम्बन्ध
समाप्त हो गया , अर्थात् मै नारी-सुलभ लज्जा को त्यागकर बहुत देर
तक उसे निर्निमेप दृष्टि से देखती रही ।