रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १६५
विशेष—दृष्टांत और रूपक अलंकार ।
सवैया
सुधि होत विदा नर नारिन की दुति दीहि परे बहियाँ पर की ।
रसखान विलोकत गु ज छरानि तजै कुल कानि दुहूँ घर की ।
सहरात हियौ फहरात हवाँ चितवै कहरानि पितंबर की ।
यह कौन खरौ इतरात गहै बलि की बहियाँ छहियाँ बर की । ५७।।
शब्दार्थ—बहियाँ पर की=भुजा की । गु ज छरानि=गु ज की माला को ।
दुहूँ घर की=दोनो घरो की—पिता तथा श्वसुर के घर की । सहराता
हियो=हृदय शीतल होता है, अपार आनन्द मिलता है। फहरात हवाँ=शरीर
रोमाचित होता है। बलि की=बलराम की । छहियाँ बट की=बट वृक्ष की,
छाया ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण के रूप का वर्णन करती हुई कहती
है कि जिसकी भुजाओ की शोभा पर दृष्टि पडते ही नर-नारियो की सुधि
नष्ट हो जाती है । जिनके गले मे पडी हुई गुँजो की माला को देखते ही नारियाँ
अपने पिता और श्वसुर के घरो की मर्यादा को भूलकर उन्हे प्रेम करने लगती
है । उनके पीले वस्त्र की फहरान को देखकर हृदय को अपार आनन्द मिलता
है और सारा शरीर रोमाचित हो जाता है । हे सखि ! बताओ तो, बट-वृक्ष
की छाया मे बलराम की बाँह पकडकर इतराता हुआ वह कौन खडा है ?
विशेष—१. इस सवैया मे अनुभावो की योजना है ।
२. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली'-
मे यह सवैया नही है ।
सवैया
ए सजनी मनमोहन नागर आगर दौर करी मन माही ।
सास के त्रास उसास न आवत कैसे सखी ब्रजवास वसाही ।
माखी भई मधु की तरुनी बरुनीन के बान बिधी कित जाही ।
वीथिन डोलति है रसखानि रहै निज मन्दिर मे पल नाही ॥ ५८ ॥
शब्दार्थ—आगर=निधि । त्रास=भय । तरुनी=युवती । बरुनीन=पलके
यहाँ वक्र-दृष्टि से तात्पर्य है । वीथिन=गलियो । मदिर=घर ।
अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की प्रेम-लीला का वर्णन करती हुई
कहती है कि हे सजनी ! कृष्ण अत्यन्त चतुर है । उन्होने मेरे मन मे दौड़ कर