रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ रसखान-ग्रन्थावली
ये मेरे नेत्र मेरे वश में नहीं रहे हैं । ये कृष्ण-छवि पर से बड़ी कठिनता से धनुष
की भाँति खिंचते हैं, पर बाण की तरह तेजी से फिर वहीं पहुँच जाते हैं ।
विशेष—उपमा अलंकार ।
तुलना—'हरि रहीम ऐसी करी, ज्यो कमान सर पूर ।
खैंचि अपनी ओर को, डारि दियो पुनि दूर ॥
—रहीम
दोहा
या छवि पै रसखानि अब वारौं कोटि मनोज ।
जाकी उपमा कविन नहिँ पाई रहे सु खोज ॥५२॥
शब्दार्थ—वारौं = न्यौछावर करता हूँ । कोटि = करोड़ो । मनोज = कामदेव
सु = भली प्रकार से, तन्मय होकर ।
अर्थ—रसखानि कृष्ण की छवि का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मैं कृष्ण
की इस शोभा पर करोड़ो कामदेव न्यौछावर करता हूँ । कृष्ण की छवि की
उपमा अभी तक कवियो को नहीं मिली है और वे अब भी पूर्ण तन्मय होकर
उसके लिए उचित उपमा की खोज कर रहे हैं ।
विशेष—अतिशयोक्ति अलंकार ।
प्रेमलीला
कवित्त
कदम करीर तरि पूछनि अधीर गोपी
आनन रुखोर गरो खरोई भरोहो सो ।
चोर हो हमारो प्रेम-चौतरा मैं हार्यो
गरावनि ते निकसि भाज्यो है करि लजैरी सो ।
ऐसे रूप ऐसो भेष हमें हूँ दिखैयौ, देखि
देखत ही रसखानि नैननि चुभैरौँ सो ।
मुकुट झुकोहो हास हियरा हरौहो कटि,
फेटा पिपरोहो अगरग साँवरौहो सो ॥५३॥
शब्दार्थ—तीर = किनारा गरावनि = बंधन । पिपरोहौँ = पीला ।