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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 286 में से

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पृष्ठ 169

१७२ रसिकप्रिया
केसव ढूँढ़ति यौं डर में मतिमूढ़ भयो गुन गूढ़ पढ़यो सो ।
को करै साज बजावै को बीनहि याको कछू चित चाकचढ़यो सो।२६।
शब्दार्थ—सुहाइ न = अच्छा नहीं लगता । नीकियौ बात = भली बात
भी, सीधी सरल बात भी । सुनैं = सुनने पर । मनौ ० = मानो मन किसी के
प्रेम में मढ़ गया है । ढूँढ़ति = अपने हृदय के भीतर वह वैसे ही कुछ ढूँढ़ती सी
रहती है जैसे कोई गूढ़ गुण पढ़ने के अनंतर मतिविभ्रम हो जाने पर हृदय के
भीतर कुछ खोजा करता है । को = कौन । साज = वाद्य को बजाने के निमित्त
व्यवस्थित करना । बीनहि = वीणा को । चाक = चक्र । चाकचढ़यो = भ्रमित ।
श्रीराधिकाजू की प्रकाश स्मृति, यथा— ( सवैया )
(३०८) मेरे मिलाएहीं मिलिहौ मनमोहन सों मन मोहि न दीजै ।
मौनहि मौन बनै न कछू अब क्यों मन मानद के रस भीजै ।
ऐसेहीं केसव कैसें जियै अहो पान न खाहु तौ पान्यौ न पीजै ।
जानिहैं कोऊ कहा करिहौ तब सोच न एतौ सकोच तौ कीजै ।२७।
शब्दार्थ—मिलाएहीं पै = मिलाने पर ही । मोहि = मोहित होकर ।
मौनहि ० = चुप्पी साधे रहने से तो काम नहीं बन सकता । क्यों = किस प्रकार ।
मानद = प्रिय । रस = प्रेम । रस भीजै ० = प्रेम में डूबे । पान्यौ = पानी भी ।
जानिहैं कोऊ = कोई जान जायगा । सोच = भय । संकोच = लज्जा ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) मेरे मिलाने पर ही उन (नायक)
से मिलना होगा । मनमोहन पर मोहित होकर इस प्रकार मन देना ठीक नहीं
इस प्रकार चुप्पी साधे रहने से भी काम न चलेगा । मौन रहने से भला प्रिय के
प्रेमरस में मन कैसे भींग सकता है ? तुम (जो खाना-पीना छोड़ बैठी हो सो)
इस प्रकार जी कैसे सकोगी ? यदि पान नहीं खाती हो तो क्या पानी भी नहीं
पीना चाहिए ? यदि कोई जान जाएगा तो क्या करोगी ? लोगों के जानने का
यदि भय नहीं है तो (कम से कम) लोगों का संकोच तो करना ही चाहिए ।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न स्मृति, यथा— ( सवैया )
(३०६) घोरि घनो घनसार घस्यो घनस्याम सु चंदन छुवै तन तूल्यो ।
केसव कुंज को कूल चितै प्रतिकूल भयो सुभ फूलनि फूल्यो ।
भूले से डोलत बोलतहूँ उत जात कितै मन संभ्रम भूल्यो ।
जानति हौं यह काहू के आजु मनोहर हार हिँडोरनि मूल्यो ।२८।
शब्दार्थ—घनसार = कपूर । घस्यो = लगाया । तन तूल्यो = शरीर के
२६—मोह-मोद । मति-मन । याको-बाको । चाक-चक्र । २७—मिला-
एहीं०-मिलाए हिये । मोहि-मारि । एतौ-जौ तो, तौ हो । २८-छुवै-दै ।
भयो-भए । सुभ-सब । मनोहर ०-मनो हरि ।