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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

( ४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
नागवल्लीरसैः सूर्य्यक्षीरैर्देयं पृथक् पृथक् ।
दिनं दिनं मर्दयित्वा काथैर्वटजटोद्भवैः ॥ १५५ ॥
दत्त्वा पुटत्रयं पश्चात्रिः पुटेन्मुसलीजलैः ।
त्रिर्गोक्षुरकषायेण त्रिः पुटेद्धानरीरसैः ॥ १५६ ॥
मोचाकन्दरसैः पाच्यं त्रिरात्रं कोकिलाक्षजैः ।
रसैः पुटेल्लोध्रकैस्तु क्षीरादेकपुटं पुनः ॥ १५७ ॥
दध्ना घृतेन मधुना स्वच्छया सितया तथा ।
एकमेकं पुटं दद्यादभ्रस्यैव मृतिर्भवेत् ॥१५८॥
सर्वरोगहरं व्योम जायते योगवाहिकम् ।
कामिनीमददर्पघ्नं शस्तं पुंस्त्वोपघातिनाम् ।
वृष्यमायुष्करं शुक्रवृद्धिसंतानकारकम् ॥१५९॥
दूसरी विधि—धान्याभ्रकको लेकर नागरमोथेके काथमें खरल कर
टिकिया बनावे फिर संपुटकर गजपुटमें फूंकदे स्वांगशीतल होनेपर फिर
नागरमोथेके काथमें खरल करके गजपुट दे । ऐसे तीन पुटें देवे ।
फिर इसी प्रकार पुनर्नवाका रस, कसौंदीका रस,पानका रस, आकका
दूध, वटकी जटाका काथ, काली मुसलीका काथ, गोखरूका काथ,
कौंचका रस, मोचाकंदका रस, तालमखानेका रस और पठानीलोधका
काथ इनमेंसे प्रत्येककी अलग २ तीन २ पुटें देवे । फिर गायके दूधकी
एक पुट देवे ( कहीं “क्षीरादष्टपुटेन्मुहुः” ऐसा पाठ है, जिसमें गोदू-
धकी आठ पुटें दे ) फिर दही, घी, शहद और मिश्री इनकी अलग २
एक एक पुट देवे तो अभ्रककी उत्तम भस्म होजायगी । यह भस्म
संपूर्ण रोगोंको हरनेवाली और योगवाही होजाती है । तथा स्त्रियोंके
मदको हरण करे, नपुसंकताको दूर करे, शरीरको पुष्ट करे और
आयुको बढावे एवं वीर्यवर्द्धक और संतानकारक है ॥ १५४-१५९ ॥