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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 584 में से

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पृष्ठ 65

भाषाटीकासहित । ( ३९ ) ।
अगस्त्यपुष्पतोयेन पिष्टं शूरणकन्दगम् ।
गोष्ठभूमिगतं मासं जायते रससन्निभम् ॥ १६१ ॥
अन्य विधि-अभ्रकको अगस्त्यपुष्पों ( बकपुष्पों ) के रसमें रगड़कर
जिमीकंदके बीचमें भरकर जिमीकंदके टुकड़ेसे बंदकर गौओंके
रहनेके स्थानमें पृथ्वीमें गाड़देवे, एक महीनेके अनंतर निकाले तो यह
अभ्रक शुद्ध और रसके समान गुणकारी होजायगा । इसको
मारणादि कर्ममें लेवे ॥ १६१ ॥
इति अभ्रक शोधन समाप्त ।
अभ्रकमारणविधि ।
वज्राभ्रकं समादाय निक्षिप्य स्थालिकोदरे ।
रम्भादिक्षारतोयेन पचेद्गोमयवह्निना ॥१६२॥
यावत्सिन्दूरसंकाशं न भवेत्स्थालिकाबहिः ।
सेचनीयं ततः क्षीरैस्ततः सूक्ष्मं विचूर्णयेत् ॥१६३॥
शुद्ध वज्राभ्रकको आगे कहे हुए केले आदिके खार ( खारके पानी )
में खूब घोटकर एक मिट्टीके पात्रमें डाले इस पात्रको गोवरी ( उपलों )
की आगमें रख तबतक तीक्ष्ण आंच देता रहे जबतक अभ्रकवाले
पात्रका वर्ण अग्निके तापसे सिंदूरके समान लाल न होजाय फिर
अग्निसे निकाल दूधसे बुझांकर चूर्ण करे ( निश्चंद्र होने पर्यन्त ऐसा ही
करे ) तो अभ्रककी भस्म होजाती है ॥ १६२ ॥ १६३ ॥
धान्याभ्रकं समादाय मुस्तक्वाथैः पुटत्रयम् ।
तद्वत्पुनर्नवानीरैः कासमर्दरसैस्तथा ॥ १६४ ॥