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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

भाषाटीकासहित । (४१)
मारक गण (१३ मारण) ।
तण्डुलीयक-बृहती-नागवल्ली पिण्डतगरपुनर्नवा-
हिलमोचिकामण्डूकपर्णी । तिक्ताखुपर्णिकामद्-
नार्कावपिलक्षसुतमातृकाभिः ॥ १६० ॥
चौलाई, कटेली, नागरवेल (पान), सिलहक, तगर, पुनर्नवा,
हुलहुल, मण्डूकपर्णी (ब्राह्मी), कुटकी, मूषकपर्णी (दंती), मैनफल,
आक और शतावर यह १३ द्रव्य अभ्रकको मारनेवाले हैं (शुद्ध
अभ्रकको अलग २ इनके रसमें रगड़कर गजपुटमें फूंक देनेसे भस्म
होजाता है) ॥ १६० ॥
चौथी विधि ।
रम्भादिनाभ्रं लवणेन पिष्ट्वा चक्रीकृतं तद्दलमध्य-
वर्ति । दग्धेन्धनेषु व्यजनानिलेन स्नुह्यर्कमूला-
म्बुपुटेन सिद्धम् ॥ १६१ ॥
रंभादिगणके रसमें अथवा केलाखार, सज्जीखार, चनाखार और
नमक इनके जलोंमें शुद्ध अभ्रकको खूब घोटकर टिकिया बनाले इन
टिकियोंको केलेके पत्रोंमें रख पंखेकी पवनसे चैतन्यकी हुई कोयलोंकी
अग्निमें फूंके । फिर निकालकर थोहरके दूधमें घोटकर टिकिया बना
संपुट करे और गजपुटमें फूंकदे । ऐसेही आकके दूधमें घोटकर टिकिया
बना संपुट कर गजपुटमें फूंके तो अभ्रककी भस्म होजाती है ॥१६१॥
पांचवीं विधि ।
धान्याभ्रकस्य भागैकं भागौ द्वौ टङ्कणस्य च ।
पिष्ट्वा तदन्धमूषायां रुद्ध्वा तीव्राग्निना पचेत्॥१६२॥
स्वभावशीतलं चूर्णं सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥
धान्याभ्रक एक भाग, सुहागा दो भाग इन दोनोंको इकट्ठेही घोट-
कर अंधमूषामें बंदकर कोयलेकी तीव्र अग्निमें फूंक दे (अथवा गज-