रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३५५ )
हृदयशूल, पार्श्वशूल, आमवात, ऊरुस्तम्भ और कटिशूल नष्ट होते
हैं, जठराग्नि दीपन होती है और मेदरोग शमन होता है। इसको कुब्ज-
विनोद रस कहते हैं ॥ ५३-५५ ॥
अथ शीतवातलक्षण ।
हिमवन्ति हि गात्राणि रोमाणि स्फुरितानि च ।
शिरोक्षिवेदनालस्य शीतवातस्य लक्षणम् ॥ ५६ ॥
जिस रोगमें रोगीका सर्वांग शीतल होजाय, समस्त अंग फड़के,
शिर और नेत्रोंमें पीड़ा होय और आलस्य होय उसको शीतवायु
रोग कहते हैं ॥ ५६ ॥
शीतारि रस ।
रसेन गन्धं द्विगुणं प्रगृह्य पुनर्नवाग्निस्वरसै-
र्विभाव्य । पक्कार्कपत्रस्य रसेन पश्चाद्विपाचयेदष्ट-
गुणेन यत्नात् ॥५७॥ रसार्द्धभागञ्च विषञ्च दत्त्वा
विपाचयेदग्निजले क्षणं तत् । शीतारिसंज्ञस्य
रसायनस्य बलञ्च सार्द्धं मरिचार्द्धकेन ॥ ५८ ॥
मरीचचूर्णेन घृताप्लुतेन सेवेत मांसञ्च घृतञ्च
पथ्यम् ॥ ५९ ॥
पारा १ भाग और गन्धक २ भाग दोनोंको एकत्र खरल करके
पुनर्नवे और चित्रकके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर पारे
और गन्धकसे अठगुने पक्क आकके पत्तोंके रसके द्वारा मूषा अथवा
वालुका यन्त्रमें पकावे । फिर पारेसे आधा भाग विष मिलाकर थोड़ेसे
चीतेके रसमें दुबारा पकावे । इस औषधिको दो रत्ती लेकर काली-
मिरचोंके चूर्ण और अदरखके रसके द्वारा या कालीमिरचोंके चूर्ण
और घृतके द्वारा सेवन करे । इस घृतके सेवन करनेपर मांस और
घृत पथ्य देवे । इसको शीतारि रस कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥