रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
पिण्डी रस ।
सूतात्पञ्चार्कत्तश्चैकं कृत्वा पिण्डं सुगन्धकम् ।
सूतांशं नागवल्ल्याश्च द्रवैः पिष्ट्वा प्रलेपयेत् ॥५१॥
ताम्रपत्रीं प्रलिप्तां तां रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ।
द्विगुञ्जं त्र्यूषणेनार्द्धवपुर्वातं सकम्पकम् ॥
निहन्ति दाहसन्तापमूर्च्छापित्तसमन्वितम् ॥ ५२ ॥
पारा ५ भाग, तांबाभस्म १ भाग, गंधक पारेसे चौथाई भाग इन
सब औषधियोंको एकत्र खरल करके पानोंके रसमें घोटकर तांबेके
पत्रोंपर लेप करके मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती
परिमाण औषधि लेकर त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे अर्द्ध-
शरीरगत कंपवात, दाह, सन्ताप, मूर्च्छा और पित्तसंयुक्त वातरोग
नष्ट होते हैं । इसको पिण्डी रस कहते हैं ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
कुब्जविनोद रस ।
रसगन्धौ समौ शुद्धौ चाभया तालकं तथा ।
विषं कटुकिव्योषण्च बोलजैपालकौ समौ ॥५३॥
भृङ्गराजरसैर्मर्द्यं स्नुह्यर्कस्वरसैस्तथा ।
गुञ्जाद्वयं भक्षयेच्च हृच्छूलं पार्श्वशूलकम् ॥ ५४ ॥
आमवाताढ्यवातादीन्कटीशूलञ्च नाशयेत् ।
अग्निञ्च कुरुते दीप्तं स्थौल्यञ्चाप्यपकर्षति ॥
रसः कुब्जविनोदोऽयं गहनानन्दभाषितः ॥५५ ॥
पारा, गंधक, हरड़, हरिताल, विष, कुटकी, त्रिकुटा, गंधबोल और
जमालगोटे इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर भांगरेके रसके
द्वारा खरल करके पश्चात् थूहर और आकके दूधमें अलग अलग खरल
करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे