रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
विष १ भाग, पारा १ भाग, जायफल २ भाग, सुहागा २ भाग,
पीपल ३ भाग, सोंठ ६ भाग, गंधक २ भाग, कौड़ीकी भस्म २ भाग
और लौंग ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें
खरल करके यथोचित मात्रानुसार वटी बनाके सेवन करनेसे नष्ट अग्नि
फिरसे दीप्त हो जाती है । इसको महोदधि वटी कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
अग्नितुण्डी रस ।
शुद्धसूतं विषं गन्धमजमोदा फलत्रिकम् ।
स्वर्जिक्षारं यवक्षारं वह्निसैन्धवजीरकम् ॥ ३ ॥
सौवर्चलं विडङ्गानि सामुद्रं त्र्यूषणन्तथा ।
विषमुष्टिसमं सर्वं जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥
मरिचाभां वटीं खादेद्वह्निमान्द्यप्रशान्तये ॥ ४ ॥
शुद्ध पारा, विष, गंधक, अजवायन, हरड़, बहेड़ा, आमला, सज्जी,
जवाखार, चीतेकी जड़, सेंधानमक, जीरा, कालानमक ( बिरिया संचर
नमक ) वायविडंग, सामुद्रलवण, सोंठ, मरिच, पीपल और कुचला
इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल
करके मरिचकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके यथोक्त
मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि नष्ट होती है ॥ ३ ॥ ४ ॥
वडवानल रस ।
शुद्धसूतस्य कर्षैकं गन्धकं तत्समं मतम् ।
पिप्पली पञ्चलवणं मरिचञ्च फलत्रयम् ॥ ५ ॥
क्षारत्रयं समं सर्वं, चूर्णं कृत्वा प्रयत्नतः ।
निर्गुण्डयाश्च द्रवेणैव भावयेद्दिनमेकतः ॥
वडवानलनामाऽयं मन्दाग्निश्च विनाशयेत् ॥ ६ ॥
शुद्ध पारा १ कर्ष, शुद्ध गंधक १ कर्ष, पीपल १ कर्ष, पांचों
लवण प्रत्येक एक एक कर्ष, काली मिरच १ कर्ष, त्रिफला ३ कर्ष,