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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 584 में से

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पृष्ठ 263

भाषाटीकासहित । ( २३७ )
जवाखार १ कर्ष, सज्जी १ कर्ष और सुहागा १ कर्ष इन सब औषधि-
योंको एकत्र खरल करके सम्हालूके रसमें एक दिन भावना देकर
यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि दूर होती है । इसको वड-
वानल रस कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥
हुताशन रस ।
गन्धेशटंकणैकैकं विषमत्र त्रिभागिकम् ।
अष्टभागन्तु मरिचं जम्भाम्भोमर्दितं दिनम् ॥ ७ ॥
तद्वटीं मुद्गमानेन कृत्वाऽद्रेण प्रयोजयेत् ।
शूलारोचकगुल्मेषु विषूच्यां वह्निमान्द्यके ॥
अजीर्णे सन्निपातादौ शैत्ये जाड्ये शिरोगदे ॥ ८ ॥
गन्धक, पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग,
विष ३ भाग, काली मिरच ८ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र
जम्बीरी नींबूके रसमें एक दिन अच्छे प्रकारसे खरल करके मूंगकी
बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरकके रसके साथ सेवन
करे । इसके सेवन करनेसे शूल, अरुचि, गुल्म, विषूचिका, अग्निमान्द्य,
अजीर्ण, सन्निपात, शैत्य, जडता और शिरोरोग नष्ट होता है । इसको
हुताशन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥
बृहत् हुताशन रस ।
एकद्विकद्वादशभागयुक्तं योज्यं विषं टंकणमूष-
णञ्च । हुताशनो नाम हुताशनस्य करोति वृद्धिं
कफजिन्नराणाम् ॥ ९ ॥
विष एक भाग, सुहागा दो भाग और कालीमिरच १२ भाग लेवे;
इन सबको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे अग्निकी
वृद्धि होकर कफ नष्ट होता है ॥ ९ ॥
९