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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 584 में से

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पृष्ठ 261

भाषाटीकासहित । ( २३५ )
बर भिलावे लेवे, सबको एकत्र पीसकर वनजमीकंदके चार पल
रसमें एक दिनतक खरल करे । इसमेंसे प्रतिदिन एक मासे औषधि
लेकर घृतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे असाध्य अर्शरोग,
कुष्ठरोग और मृत्युजनक घोर रोग भी शीघ्र ही नष्ट हो जात हैं; इसको
महादेवने कहा है ॥ २८-३० ॥
अष्टांग रस ।
गन्धं रसेन्द्रं मृतलौहकिट्टं फलत्रयं व्यूषणवह्नि-
भृङ्गम् । कृत्वा समं शाल्मलिका गुडूचीरसेन
यामत्रितयं विमर्द्य । निष्कप्रमाणं गदितानुपानैः
सर्वाणि चार्शांसि हरेद्रसस्य ॥ ३१ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्शोऽधिकारः ।
गन्धक, पारा, लोहेका मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मरिच;
पीपल, चीतेकी जड़ और भांगरा इन सब औषधियोंको समान भाग
लेकर सेमल और गिलोयके रसमें तीन प्रहर खरल करके चार मासे
औषधि यथोचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारकी बवा-
सीर दूर होती है । इसको अष्टांगरस कहते हैं ॥ ३१ ॥
इति अर्शोऽधिकार समाप्त ।
अथ अजीर्णाधिकार ।
महोदधि वटी ।
ऐकैकं विषसूतञ्च जातीटंकं द्विकं द्विकम् ।
कृष्णात्रिकं विश्वषट्कं गन्धं कापर्दकं द्विकम् ॥ १॥
देवपुष्पं बाणमितं सर्वं संमर्द्य यत्नतः ।
महोदधिवटी नाम्ना नष्टमग्निं प्रदीपयेत् ॥ २ ॥