रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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तोले, थूहरका दूध ३२ तोले और गोमूत्र १२८ तोले लेवे । इन सबको
एकत्र करके खूब खरल करके गोलासा बना लेवे । फिर इसको विधि-
पूर्वक मंद मंद अग्निसे पकावे । प्रतिदिन इसमेंसे दो मासे परिमाण
सेवन करे तो यह अर्शकुठार रस सब रोगोंको नष्ट करता है ॥५-७॥
चक्राख्य रस ।
मृतसूताभ्रवैक्रान्तं ताम्रं कांस्यं समं समम् ।
सर्वतुल्येन गन्धेन दिनं भल्लातकद्रवैः ॥ ८ ॥
मर्दयेद्यत्नतः पश्चाद्वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् ।
भक्षणाद्गदजान् हन्ति द्वन्द्वजान्सर्वजानपि ॥ ९ ॥
पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, वैक्रान्तकी भस्म, तांबेकी भस्म
और कांसेकी भस्म यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी
बराबर शुद्ध गंधक लेवे । इन सबको एकत्र भिलावेके रसमें एक दिन
तक खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके
सेवन करनेसे द्वन्द्वज और सर्वदोषजनित अर्शरोग दूर होता है ॥८॥९॥
नित्योदित रस ।
मृतसूताभ्रलौहार्कविषं गन्धं समं समम् ।
सर्वतुल्यन्तु भल्लातफलमेकत्र चूर्णयेत् ॥ १०॥
माषमात्रं लिहेदाज्यै रसश्चार्शांसि नाशयेत् ।
नित्योदितो रसो नाम गुदोद्भवकुलान्तकः ॥ ११ ॥
पारेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, लोहेकी भस्म, तांबेकी भस्म, शुद्ध
विष और शुद्ध गंधक यह सब समान भाग लेवे और सबकी बराबर
शुद्ध भिलावे लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर तीन दिन तक जमींकं-
दके रसमें भावना देवे और खरल करे । इसमेंसे प्रतिदिन एक मासे
परिमाण औषधि लेकर घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे अर्शरोग नष्ट
होता है। यह नित्योदित रस बवासीरको जड़से नष्ट करता है॥१०॥११॥