रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित। (२२९)
तीक्ष्णमुख रस।
मृतसूतार्कहेमाभ्रं तीक्ष्णं मुण्डञ्च गन्धकम् ।
मण्डूरञ्च समं ताप्यं मर्द्यं कन्याद्रवैर्दिनम् ॥३॥
अन्धमूषागतं सर्वं ततः पाच्यं दृढाग्निना ।
चूर्णितं सितया माषं खादेत्तच्चार्शसां हितम् ॥
रसस्तीक्ष्णमुखो नाम चासाध्यमपि साधयेत् ॥४॥
पारेकी भस्म, तांबेकी भस्म, सोनेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, तीक्ष्ण-
लोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, गंधक, मण्डूरभस्म और सोनामाखीकी भस्म
इन सबको घीकारके रसमें एक दिनतक खरल करे। पश्चात् इसको
अन्धमूषामें रखकर तीक्ष्ण अग्निसे पकावे। जब शीतल होजाय तब मूषा-
मेंसे औषधिको बाहर निकालकर चूर्ण कर ले। इसको एकमासे परि-
माण मिश्रीके साथ सेवन करनेसे असाध्य अर्श रोग भी नष्ट होजाता है।
इसको तीक्ष्णमुख रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
अर्शःकुठार रस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं मृतलौहञ्च ताम्रकम् ।
प्रत्येकं द्विपलं दन्ती त्र्यूषणं शूरणन्तथा ॥ ५ ॥
शुभा टंकयवक्षारसैन्धवं पलपञ्चकम् ।
पलाष्टकं स्नुहीक्षीरं द्वात्रिंशच्च गवां जलैः ॥ ६ ॥
आपिण्डितं पचेदग्नौ खादेन्माषद्वयं ततः ।
रसश्चार्शःकुठारोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ ७ ॥
शुद्ध पारा एक पल, शुद्ध गंधक दो पल, लोहेकी भस्म और
तांबेकी भस्म आठ आठ तोले, दंती, सोंठ, मिरच, पीपल, जमींकंद,
वंशरोचन, सुहागा, जवाखार और सेंधानमक यह सब बीस बीस