रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२०७)
दिनमें सोना भी त्याग देवे । इस औषधिका सेवन करनेवाला मनुष्य
बार बार दूधको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे संग्रहणी, क्षय,
कोढ़, बवासीर, अर्श, शोथ और अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं, इसको चक्र-
पाणिदत्तने कहा है । इसको रसपर्पटिका कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥
विजयपर्पटी ।
हाटकं रजतं ताम्रं यद्यत्र पारदीयते ।
विजयाख्या तु सा ज्ञेया सर्वरोगनिषूदनी ॥ ६१ ॥
उपरोक्त रसपर्पटीमें यदि पारेकी बराबर सोना भस्म, रूपा भस्म
और तांबा भस्म मिलाकर पूर्वोक्त विधिसे पर्पटी तैयार की जाय तो
इसको विजयपर्पटी कहते हैं । यह विजयपर्पटी सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट
करती है ॥ ६१ ॥
स्वर्णपर्पटी ।
रसोत्तमं पलं शुद्धं हेम तोलकसंयुक्तम् ।
शिलायां मर्दयेत्तावद्यावदेकत्वमागतम् ॥ ६२ ॥
गन्धकस्य पलञ्चैकमयःपात्रे ततो दृढे ।
मर्दयेद्दृढपाणिभ्यां यावत्कज्जलतां व्रजेत् ॥ ६३ ॥
ततः पाकविधानज्ञः पर्पटीं कारयेत्सुधीः ।
रक्तिकादिक्रमेणैव योजयेदनुपानतः ॥
ग्रहणीं विविधां हन्ति वृष्या सर्वज्वरापहा ॥ ६४ ॥
सिंगरफसे निकाला हुआ पारा ४ तोले, सुवर्णभस्म ( कोई वैद्य सुव-
र्णके वक डालते हैं ) १ तोला इन दोनोंको एकत्र खरल करे । पश्चात्
इसमें चार तोले शुद्ध गंधक डालकर लोहेके पात्रमें खूब अच्छे प्रका-
रसे खरल करे । जब कज्जलके समान होजावे तब रसपर्पटीके नियमा-
नुसार पर्पटी तैयार करावे । प्रतिदिन एक एक रत्तीके नियमसे सेवन
करे और यथादोषानुसार अनुपानकी कल्पना करे । यह औषधि स ।