रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
द्वादशरक्तिकां यावत्प्रयोगः प्रहरार्द्धतः ।
तदूर्ध्वं बहुपूगस्य भक्षणं दिवसे पुनः ॥ ५८ ॥
अम्लपित्तरोगमें क्षुधावती गुटिकामें जो पारे और गंधकके शुद्ध
करनेकी विधि कही है उसी विधिसे शुद्ध किये हुए समान भाग
पारे और गंधकको लेकर दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना
लेवे; फिर एक लोहेके पात्रमें बेरीके जलते हुए अंगारोंपर उस कज्ज-
लीको स्थापित करे । पात्रमें थोड़ा घृत अवश्य लगाना चाहिये, नहीं
तो यह कज्जली आगसे उड़ जायेगी और तैलके समान पतली कभी
न होगी यह अनुभवकी बात है । पर्पटी बनाते समय आंच बहुत मन्दी
होनी चाहिये; जब यह गल जाय तब गोबरके ऊपर एक केलेका
पत्ता बिछाकर उसके ऊपर इसको डाल देवे और ऊपरसे एक केलेके
पत्तेमें बँधी हुई गोबरकी पोटलीसे दबाकर पापड़ जैसी बना लेवे । इस
प्रकारसे यह रसपर्पटिका सिद्ध होती है । इसे पहिले दिन दो रत्ती
सेवन करे । फिर क्रमसे एक एक रत्ती बढ़ाता जाय, जब बढ़ते बढ़ते
बारह दिन पूरे हो जावें तब फिर क्रमसे एक एक रत्ती घटाता जावे ।
आधे प्रहरके अनन्तर ऊपरसे बहुतसी सुपारी चर्वण करे ॥ ५६-५८॥
तृतीय एव मांसाज्यदुग्धाद्यत्र विधीयते ।
वर्ज्यं विदाहिस्त्रीरम्भामूलं तैलञ्च सार्षपम् ॥ ५९ ॥
कृष्णमत्स्याम्बुजखगांस्त्यक्त्वोन्निद्रः पयः पिबेत् ।
ग्रहणीक्षयकुष्ठार्शः-शोथाऽजीर्णविनाशिनी ॥
रसपर्पटिका ख्याता निबद्धा चक्रपाणिना ॥६०॥
तीसरे दिनसे मांस, रस, घृत और दूधका पथ्य दे । इस औषधिके
सेवन करने पर दाहकारक पदार्थ, स्त्रीप्रसंग, केलेका कन्द, सरसोंका
तेल, छोटी मछली, कच्छपादि और पक्षीका मांस त्याग देवे ।