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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

( २०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
प्रकारकी संग्रहणीको दूर करती है । ( इसके प्रयोगमें दूधके सिवाय
और खाना पीना कुछ भी न करे, यह १२ रत्ती तक क्रमशः बढ़ानी
और फिर एक एक रत्तीके ही हिसाबसे घटानी चाहिये । तृषा लगे
तो मौसम्मी, अनार आदिका रस लेवे; यह बिल्वपत्रके स्वरसके साथ
बहुत अच्छा काम करती है ) तथा वृष्य है और सर्व प्रकारके ज्वरके
दूर करती है ॥ ६२-६४ ॥
पञ्चामृतपर्पटी ।
अष्टौ गन्धकमाषकारसदलं लौहं तदर्द्धं शुभं,
लौहार्द्धञ्च वराभ्रकं सुविमलं ताम्रं तथाभ्राद्धिकम् ।
पात्रे लौहमये च मर्दनविधौ चूर्णीकृतञ्चैकतो,
दाव्यों बादरवह्निनातिमृदुना पाकं विदित्वा दले ६५
रम्भाया लघु ढालयेत्पट्टारियं पञ्चामृतापर्पटी,
ख्याता क्षौद्रघृतान्विता प्रतिदिनं गुञ्जाद्वयं वृद्धितः ।
लौहे मर्दनयोगतः सुविमलं भक्षक्रिया लौहवद्,
गुञ्जाष्टावथवा त्रिकं त्रिगुणितं सप्ताहमेवं भजेत्॥६६॥
नानावर्णग्रहण्यामरुचिसमुदये दुष्टदुर्नामकादौ,
छर्द्यां दीर्घातिसारे ज्वरभवकलिते रक्तपित्ते क्षयेऽपि ।
वृष्याणां वृष्यराज्ञी वलिपलितहरा नेत्ररोगैकहन्त्री,
स्वस्थं दीप्तस्थिराग्निपुनरपिनवकं रोगिदेहं करोति ६७
गन्धक ८ मासे, शुद्ध पारा ४ मासे, लोहभस्म २ मासे और
अभ्रकभस्म १ मासा और तांवाभस्म ४ रत्ती लेवे । फिर इन सबको
एकत्र लोहेके पात्रमें खरल करके पीछे एक लोहेकी करछीमें इसको
रखकर उस करछीको बेरीके अंगारों पर रखकर मन्द मन्द अग्निसे
पकावे । जब यह अच्छे प्रकारसे गल जावे तब गोबरके ऊपर एक
केलेका पत्ता रखकर उसके ऊपर इसको ढाल देवे और ऊपरसे एक