रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २०३ )
भावयेत्सर्वमेकत्र केशराजरसैः पुनः ।
चणकाभा वटी कार्या छागीदुग्धेन पेषिता ॥ ४१ ॥
अनुपानं प्रदातव्यं दग्धबिल्वं समं गुडैः ।
हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं चिरजामपि ॥ ४२ ॥
आमसम्पाचनो सम्यग् वह्निवृद्धिकरस्तथा ।
पीयूषवल्लीनामायं ग्रहणीरोगनाशनः ॥ ४३ ॥
पारा, अभ्रकभस्म, शुद्ध गंधक, रूपाभस्म, लोहाभस्म, सुहागा,
रसौत और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे;
लौंग, चन्दन, नागरमोथा, पाठ, जीरा, धनिया, वराहक्रान्ता, अतीस,
लोध, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, दालचीनी, जायफल, सोंठ, बेलगिरी,
नागकेशर, अनारके पत्ते, मंजीठ, धायके फूल और कूठ यह प्रत्येक
औषधि पारेकी बराबर अर्थात् चार चार मासे लेवे; ( कितने एक वैद्य
यहां आठ आठ मासे औषधि लेनी चाहिये ऐसा कहते हैं ) इन सबको
एकत्रकर कुकुरभांगरेके रसमें भावना दे; पश्चात् बकरीके दूधमें पीसकर
चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिका भुने हुए बेल और
गुड़के साथ सेवन करे। यह औषधि सब प्रकारके अतीसार और बहुत
दिनोंकी पुरानी संग्रहणी रोगको दूर करती है । यह ग्रहणीरोगको हरने-
वाला, आमको पचानेवाला और अच्छे प्रकारसे अग्निको दीपन करने-
वाला पीयूषवल्ली रस है ॥ ३८-४३ ॥
ग्रहणीशार्दूल रस ।
रस-गन्धकयोश्चापि कर्षमेकं सुशोधितम् ।
द्वयोः कज्जलिकां कृत्वा हाटकं षोडशांशतः ॥ ४४ ॥
लवङ्गं निम्बपत्रञ्च जातीकोषफले तथा ।
एतेषां कर्षचूर्णेन सूक्ष्मैलां सह मेलयेत् ॥ ४५ ॥