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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

( २०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
बलवर्णाग्निजननी सेविता च चिरायुषी ।
कंडूं कुष्ठं विसर्पञ्च गुदभ्रंशं क्रिमिं जयेत् ॥ ३६ ॥
माषद्वयां वटीं खादेच्छागीदुग्धानुपानतः ।
वयोऽग्निबलमावीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्धनम्॥३७॥
पारा, गंधक, लोहभस्म, शंखभस्म, सुहागा, हींग, कचूर, तालीश-
पत्र, नागरमोथा, धनिया, जीरा, सेंधानमक, धायके फूल, अतीस,
सोंठ, घरका धुँआसा, हरड़, भिलावे, तेजपात, जायफल, लौंग, दार-
चीनी, इलायची, सुगंधवाला, बेलगिरी, मेथी और भांग इन
सबको समान भाग लेकर बकरीके दूधमें पीसकर गोली बना लेवे ।
श्रीमद्गहनानन्दने रसायन अधिकारमें यह ग्रहणी गजेन्द्रवाटिका
लोककी रक्षाके लिये कही है । यह अनेक प्रकारकी ग्रहणी, ज्वर,
अतिसार, शूल, गुल्म, अम्लपित्त, कामला, हलीमक, कण्डू, कुष्ठ,
वीसर्प, गुदभ्रंश और क्रिमिरोगको दूर करती है । यह गोली तोलमें
दो दो मासेकी बनानी चाहिये और प्रतिदिन एक गोली बकरीके
दूधके साथ सेवन करनी चाहिये । अथवा रोगीकी अवस्था, बल और
अग्निको देखकर उपरोक्त दो मासेके अतिरिक्त कम अथवा ज्यादा
मात्राका निरूपण करे । यह गोली बल और वर्णको बढ़ाती है तथा
अवस्थाको स्थापित करती है ॥ ३०-३७ ॥
पीयूषवल्लीरस ।
सूतमभ्रं गन्धकञ्च तारं लौहं सटङ्कणम् ।
रसाञ्जनं माक्षिकञ्च शाणमेकं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥
लवंगं चन्दनं मुस्तं पाठा जीरक-धान्यकम् ।
समङ्गाऽतिविषा लोध्रं कुटजेन्द्रयवं त्वचम् ॥३९॥
जातीफलं विश्वबिल्वं कनकं दाडिमीच्छदम् ।
समङ्गा धातकी कुष्ठं प्रत्येकं रससम्मितम् ॥४०॥