रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
मुक्तागृहे च संस्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् ।
पञ्चगुञ्जाप्रमाणेन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ४६ ॥
सूतिकां ग्रहणीरोगं हरत्येष सुनिश्चितः ।
अर्शोघ्नो दीपनश्चैव बलपुष्टिप्रदायकः ॥ ४७ ॥
कासश्वासातिसारघ्नो बलवीर्यकरः परः ।
दुर्वारं ग्रहणीरोगमामशूलञ्च नाशयेत् ॥
संसारलोकरक्षार्थं पुरा रुद्रेण भाषितः ॥ ४८ ॥
पारा और गंधक यह दोनों शोधित एक एक तोला लेवे, फिर
इन दोनोंकी एकत्र कज्जली बनावे और इसमें सोलहवां भाग सोनेके-
भस्म मिलावे तथा लौंग, नींबके पत्ते, जायफल, जावित्री और
छोटी इलायची इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला परिमाण लेवे ।
सबको एकत्र पीसकर एक सीपमें भर देवे और उसको अच्छेप्रका-
रसे बंद करके पुटपाककी विधिसे पकावे । फिर इसमेंसे निकाल प्रति-
दिन पांच रत्तीके हिसाबसे सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सूतिका-
रोग, संग्रहणीरोग, बवासीर, खाँसी, श्वास, अतिसार, दुस्तर ग्रहणी
रोग और आमशूल नष्ट होते हैं तथा अग्नि अत्यंत दीपन होती है,
बल, वीर्य और सत्त्वकी वृद्धि होती है । संसारकी रक्षाके लिये पूर्व
कालमें श्रीमहादेवने यह रस कहा है ॥ ४४-४८ ॥
वैद्यनाथ वटी ।
रसस्य शाणं संगृह्य काञ्जिकेन तु शोधयेत् ।
चित्रकस्य रसेनापि त्रिफलायाश्च बुद्धिमान् ॥४९॥
रसाद्धं गन्धकं शुद्धं भृङ्गराजरसेन वा ।
द्वाभ्यां संमूर्च्छनं कृत्वा स्वरसैः शाणसम्मितैः॥५०॥
खल्लयेत्तु शिलाखण्डे क्रमशो वक्ष्यमाणजैः ।
निर्गुण्डीमधुकश्वेताकुठेरग्रीष्मसुन्दरैः ॥ ५१ ॥