रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
२ द्वितीयस्तरङ्गः १७
लोग कजली कहते हैं। इस कजली को कजल और कजलिका भी कहा जाता
है पारद गन्धक की कज्जली विशेष रूप से अनेक प्रकार के रसों के बनाने
तथा धातुओंके मारण में काम आती है ॥ २७-२८ ॥
पारद को गन्धक आदि उपरस अथवा धातु के साथ किसी द्रव के सहारे
अच्छी तरह मर्दन करके चिकना चमकीला लेसदार कीचड़ के समान कल्क
जैसा बना लेना रसपंक कहा जाता है ॥ २९ ॥
पारद में गन्धक मिलाकर दूध आदि किसी पतली चीज के साथ अच्छा
तरह मर्दन करके पीठी-सी बना लेना रसपिष्टिका या पारदपिष्टी कहा जाता
है ॥ ३० ॥
सिंगरफ को नींबू के रस आदि में घोट सुखाकर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में बंद
करके ऊपर उड़ा लेने से निकाला हुआ पारा, हिंगुलोत्थ पारद या हिंगुलाकृष्ट
पारद कहा जाता है। इसकी विधि आगे लिखी जायगी ॥ ३१ ॥
धातुसत्त्वलक्षणम्
कोष्ठ्यां ध्मातस्य वज्रादेर्द्वावकोषधिभिः समम् ।
सारो यो निर्गतः सोऽत्र सत्त्वमित्यभिधीयते ॥३२॥
वनौषधिसत्त्वलक्षणम्
वाष्पस्वेदनयन्त्रेण वनौषधिसमुद्भवः ।
सारः सत्त्वमिति प्रोक्तं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥३३॥
द्रावकौषधिभिर्वर्द्ध्यमाणैर्गुडगुग्गुल्वादिभिः ॥ ३२-३३ ॥
भा.टी.—हीरा अभ्रक आदि द्रव्यों को आगे लिखी हुई द्रावक गण की
औषधियों के साथ घोटकर भट्ठी में रख तपाने से जो उनका सार भाग पदार्थ
प्राप्त होता है उसे उस वस्तु का सार या सत्त्व कहा जाता है ॥ ३२ ॥
बाष्पस्वेदन यन्त्र द्वारा वनौषधियों का जो सार भाग प्राप्त होता है उसे
रस-शास्त्रज्ञ, विद्वान् सत्त्व कहते हैं ॥ ३३ ॥
सिक्थतैलस्य लक्षणम्
सिक्थकं तिलतैलञ्च युक्तमानविमिश्रितम् ।
विपक्वं नबनोताभं सिक्थतैलं प्रकीर्तितम् ॥ ३४ ॥
सिक्थकं मधूच्छिष्टम् , युक्तमानविमिश्रितमिति मूर्च्छनाविज्ञानीयांकप्रमाणेन
विमिश्रितम् ॥ ३४ ॥
भा.टी.—मोम और तिलों के तैल को आवश्यकतानुसार योग्य मान में
१८ रसतरङ्गिणी
मिलाकर अग्नि पर रखकर पका लेने पर जब वह मक्खन के सदृश कोमल
और गाढ़ा हो जाय तो उसे सिक्थतैल कहते हैं ॥ ३४ ॥
वक्तव्य—उक्त दोनों तैलों को अग्नि पर रखकर पकावें, जब मोम
पिघलकर तैल में मिल जाय तो उसे उतार लें । ठंडा होने पर यह तैल
मक्खन के समान गाढ़ा और कोमल होता है ।
द्रावको गणः
गुञ्जा मधु गुडः सर्पिः सौभाग्यं गुग्गुलुस्तथा ।
पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं धातूनां द्रावको गणः ॥३५॥
भा.टी.—रत्ती, शहद, गुड़, घृत, सुहागा और गूगल को प्राचीन
आचार्यों ने धातुद्रावकगण माना है ॥ ३५ ॥
ढालनम्
संद्रावितस्य द्रव्यस्य द्रवे निक्षेपणन्तु यत् ।
ढालनं तत्समुद्दिष्टं रसकर्मविशारदैः ॥३६॥
भा.टी.—किसी सोना चाँदी आदि द्रव्य को अग्नि में पिघलाकर किसी
क्वाथ स्वरस दूध आदि द्रव्य में डाल देने को रसशास्त्र में ढालन शब्द से
कहा जाता है ॥ ३६ ॥
मित्रपञ्चकम्
आज्यं गुञ्जाथ सौभाग्यं क्षौद्रं च पुरसंज्ञकम् ।
एतत्तु मिलितं विज्ञैर्मित्रपञ्चकमुच्यते ॥ ३७ ॥
विविधानां तु लोहानां द्रावणाय विशेषतः ।
रसतन्त्रविशेषज्ञैर्युज्यते मित्रपञ्चकम् ॥ ३८ ॥
पुरसंज्ञकं गुग्गुलुः ॥ ३७, ३८ ॥
भा.टी.—घी, रत्ती, सुहागा,शहद और गूगल को एकत्र मिलाकर ग्रहण
करने को मित्रपञ्चक शब्द से लिया जाता है । विभिन्न प्रकार के धातुओं को
पिघलाने के लिए रसशास्त्र में मित्रपञ्चक का प्रयोग होता है ॥३७-३८॥
वक्तव्य—मित्रपञ्चक द्वारा धातुओं का द्रावण भी किया जाता है ।
इसके द्वारा धातुओं की कच्ची बनी हुई भस्मों की भी परीक्षा हो जाती है ।
आवापलक्षणम्
द्रव्यान्तरविनिक्षेपो द्रुते वङ्गादिके तु यः ।
क्रियते स प्रतीवाप आवापश्च निगद्यते ॥ ३६ ॥
द्वितीयस्तरङ्गः १६
निर्वापलक्षणम्
धात्वादेर्वह्नितप्तस्य जलादौ यन्निषेचनम्।
स निर्वापः स्मृतश्चापि निषेकः स्नपनञ्च तत् ॥४०॥
द्रव्यानन्तरस्य अश्वत्थकल्कचूर्णादेः ॥ ३६, ४० ॥
भा.टी.—किसी पिघलनेवाली वंग आदि धातु को पिघलाकर उसमें
किसी अन्य द्रव्य डालने को प्रतीवाप अथवा आवाप कहा जाता है ॥३६॥
किसी लोहा, ताँबा, चाँदी आदि धातु को अग्नि में तपाकर जल अथवा
मट्ठा, दूध, क्वाथ आदि में डालने या बुझाने को निर्वाप, निषेक अथवा
स्नपन शब्द से कहा जाता है ॥ ४० ॥
वक्तव्य—यह आवाप, जब वंग या सीसे की भस्म करते हैं तो उसे
पिघलाकर पिघली हुई अवस्था में थोड़ा करके हल्दी, अपामार्गचूर्ण, इमली-
छालचूर्ण को डालते हैं जिससे वंगादि की भस्म हो जाती है ।
शुद्धावर्तलक्षणम्
यदा तु ज्वलनो ज्वालाकुलः शुक्लसमुत्थितः।
सत्त्वनिर्गमकालः स शुद्धावर्त इति स्मृतः ॥४१॥
ज्वलनोऽग्निः, शुक्लसमुत्थितः शुक्लवर्णज्वालायुक्तः । सत्त्वनिर्गमकालः
स इति तदानीं वह्नितीव्रतासद्भावात् ॥४१॥
भा.टी.—जब किसी अभ्रक आदि द्रव्य को सत्त्व निकालने के लिये
भट्ठी में रखते और अग्नि तेज करते हैं तब अग्नि एक बार बहुत तेज होकर
सफेद ज्वालावाली हो जाती है तो उसे शुद्धावर्त कहते हैं ॥ ४१ ॥
वक्तव्य—अग्नि के इसी अवस्था में आने पर धातु का सत्त्व-पतन होने
लगता है ।
पर्पटीस्वरूपम्
संद्राविता कज्जलिकाग्नियोगात् रम्भापलाशे चिपिटीकृता च ।
रसागमकैः खलु पर्पटी सा प्रकीर्तिता पर्पटिका च सैव ॥४२॥
रम्भापलाशे कदलीपत्रे ॥ ४२ ॥
भा.टी.—पारद गन्धक की कज्जली को किसी लोह आदि धातु के पात्र
में रख अग्नि में पिघला करके केले के पत्ते पर डालकर दूसरे केले के पत्ते से
दबाकर चपटी पपड़ी सी बना लेने को पर्पटी या पर्पटिका कहते हैं ॥४२॥
२० रसतरङ्गिणी
वक्तव्य—पर्पटी बनाने में पिघले हुए द्रव्य को गोबर के ऊपर रखे हुए
केले के पत्ते पर डालकर दूसरे पत्ते से दबाकर पपड़ी बनायी जाती है।
ताडनम्
यत् श्लिष्टलोहयोरेकतरस्य परिणाशनम्।
अपरस्य च लोहस्य भवेच्च परिसाधनम् ॥४३॥
आध्मानाद् वङ्कनालेन ताडनं तदिहोच्यते ।
सञ्जातताडनं लोहं ताडितं परिकीर्तितम् ॥४४॥
भा.टी.—आपस में मिले हुए दो धातुओं में से एक धातु को नष्ट करने
और दूसरे धातु को शुद्ध रूप में प्राप्त करने के लिए मिश्रित धातु को अग्नि
में रखकर आगे लिखे हुए वंकनाल द्वारा तीव्र रूप में तपाने को ताड़न
कहा जाता है। इस ताड़न क्रिया से प्राप्त लोह को ताड़ित लोह कहा जाता
है ॥ ४३–४४ ॥
घोषाकृष्टं ताम्रम्
ताडितं वङ्कनालेन सौषधं घोषकं यदा ।
स्यान्मुक्तवङ्गं तत्ताम्रं घोषाकृष्टमिहोच्यते ॥ ४५ ॥
घोषः कांस्यम्, मुक्तवङ्गं वङ्गविहीनम् ॥ ४५ ॥
भा.टी.—कांसे में होनेवाले राँगा को उससे पृथक् करनेवाली औष-
धियों के साथ मिला वंकनाल द्वारा तीव्र अग्नि से तपाने पर जो वंगरहित
ताँबा प्राप्त होता है उसे घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं ॥ ४५ ॥
वक्तव्य—इसी विधि से अन्य मिश्रित धातुओं में से एक धातु को प्राप्त
किया जाता है, जिस धातु से किसी धातु को पृथक् किया जाता है उसे उस
धातु से पृथक्कृत धातु कहा जाता है। जैसे तांबे से अलग किये स्वर्ण को
ताम्राकृष्ट स्वर्ण कहेंगे।
वङ्कनालम्
करप्रमाणं यन्नालं पित्तलादिविनिर्मितम् ।
वह्नौ फूत्कारदानाय वङ्कनालं तदुच्यते ॥ ४६ ॥
स्वाङ्गशीतस्य लक्षणम्
ज्वलनस्थितमेवेह शीतलत्वमुपैति यत् ।
स्वाङ्गशीतं तदुद्दिष्टं स्वतःशीतञ्च तन्मतम् ॥ ४७ ॥
द्वितीयस्तरङ्गः २१
बहिःशीतलक्षणम्
वह्नेर्बहिः समानीय यद् द्रव्यं याति शीतताम्।
बहिःशीतं तदुद्दिष्टं बाह्यशीतञ्च तन्मतम् ॥ ४८ ॥
भावनालक्षणम्
यच्चूर्णितस्य धात्वादेर्द्रवैः सम्पेष्य शोषणम्।
भावनं तन्मतं विज्ञैर्भावना च निगद्यते ॥ ४६ ॥
वङ्कनालं स्वर्णकाराद्युपयुज्यमानमेकतः सूक्ष्मेणापरतश्च विस्तृतेन मुखेनो-
पलक्षितं नलिकाकारं फूत्कारदानयन्त्रम् ॥ ४६–४६ ॥
भा. टी.—पीतल आदि धातु की बनी हुई एक हाथ लंबी नली को जिससे
अग्नि को तेज करने के लिए फूँक मारी जाती है, वङ्कनाल या वक्त्रनाल
कहा जाता है ॥ ४६ ॥
किसी धातु आदि को संपुट में बन्द करके पुट में फूँकने पर अग्नि के
बिलकुल शान्त होने पर निकालने को स्वांगशीत कहते हैं। इसी को स्वतः
शीत भी कहा जाता है ॥ ४७ ॥
किसी वस्तु को अग्नि में पकाकर उसी समय गरम अवस्था में अग्नि में
से बाहर निकालकर ठंडा करने को बहिःशीत या बाह्यशीत शब्द से कहा
जाता है ॥ ४८ ॥
किसी धातु आदि औषधि के चूर्ण को जल, क्वाथ, स्वरस आदि द्रव
पदार्थ से पीस कर सुखाने को भावन या भावना कहा जाता है ॥ ४६ ॥
वक्तव्य—स्वर्ण आदि धातु को अग्नि पर रखकर पिघलाने के लिए
सोनार लोग जिस नली से फूँक मारकर अग्नि तेज करते हैं उसे वङ्कनाल
समझना चाहिए। यह नली एक तरफ बहुत पतली और दूसरे मुख की तरफ
चौड़ी गोल होती है। इसके भी दो भेद होते हैं एक का मुख सीधा होता है
किन्तु दूसरे प्रकार की नली का मुख पतली तरफ से कुछ टेढ़ा होता है।
भावनायां द्रवपरिमाणम्
द्रवेण यावता द्रव्यं चूर्णितं त्वार्द्रतां व्रजेत्।
तावानेव द्रवो देयो भिषग्भिर्भावनाविधौ ॥ ५० ॥
भाव्यद्रव्यमितः क्वाथ्यो जलमष्टगुणं ततः।
वस्वंशशोषितः क्वाथो देयः क्वाथेन भावने ॥ ५१ ॥
२२ रसतरङ्गिणी
ऽस्वंशशोषितः अष्टमांशावशेषितः। प्रसङ्गात् सुभावितदुर्भावितयोः स्वरूपम्-
“पेष्यमाणञ्च यद् द्रव्यं चिपिटीभूय चूर्णताम्। याति मार्दवयुक्तन्तत् सुभावितमु-
दाहृतम्॥ यत् पिष्टं सहसा दीर्णं खरस्पर्शन्न कोमलम्। तद्दुर्भावितमित्युक्तं
भावनावेदिभिर्जनैः” इति॥ ५०, ५१॥
भा.टी.—किसी चूर्ण रूप औषधि को भावना देनी हो तो उसमें उतना
द्रव (पतला) पदार्थ डालना चाहिए जिससे वह चूर्ण गीला लुगदी की
तरह हो जाय, यदि किसी औषधि के क्वाथ की भावना देनी हो तो चूर्ण रूप
औषधि के बराबर भाग क्वाथ की औषधि लेकर उसको जौकुट करके उसमें
अठगुणा जल डालकर पकायें, जब जल आठवाँ भाग शेष रहे तो उसे छान
कर क्वाथ को चूर्ण रूप औषधि में डाल दें॥ ५०, ५१॥
शोधनम्
उद्दिष्टैरौषधैः सार्द्धं क्रियते पेषणादिकम् ।
मलविच्छित्तये यत्तु शोधनं तदिहोच्यते॥ ५२॥
आदिपदेन स्वेदनक्षालनादि ग्राह्यम्, मलविच्छित्तये मलनाशाय॥५२॥
भा.टी.—किसी धातु आदि द्रव्य के मल (खराबी, दोष, विष) को दूर
करने के लिए उसके शोधन के निमित्त लिखी हुई औषधि के साथ मिलाकर
मर्दन, क्षालन, या निर्वापण आदि कर्म करना शोधन कहा जाता है ॥५२॥
वारितरलक्षणम्
मृतं लोहं विनििक्षिप्तं यदा तरति वारिणि ।
रसन्त्रसुनिष्णातैस्तद् वारितरमीरितम्॥ ५३॥
वारितरमिति—अत्रेदवधेयम्—वारितरत्वमेव लोहमृतेर्न निश्चितं लक्षणं
व्यभिचारात्, तथा हि दरदयोगमृतस्य शतधा पुटितस्यापि लोहस्य न क्वचिद्
वारितरत्वमवलोकितचरम्, क्वचिच्च जम्बूफलादिरसपुटितस्याल्पपुटेब्वपि
वारितरत्वमायातीति तस्माद् वारितरत्वं लोहमृतेर्न व्यापकं लक्षणम्। अपरत्र
तु दरदादिपुटितस्यापि घृतादिनाऽमृतीकरणात् वारितरतागोधूमादिकणतार-
कत्वञ्चावलोक्यते॥ ५३॥
भा.टी.—यदि किसी धातु की भस्म निस्तरंग जल में डालने से ऊपर
तैरती है तो उसे वारितर लोहभस्म कहते हैं॥ ५३॥
मृतलोहम्
तर्जन्यङ्गुष्ठसंघृष्टं विशेद्रेखान्तरं तु यत्।
निविष्टञ्च बहिर्नैति मृतलोहं तदुच्यते ॥ ५४॥
द्वितीयस्तरङ्गः २३
मृतं लोहं पुटे ध्मातं ताराज्यमधुसंयुतम् ।
न त्यजेत्तारमानं वा मृत-लोहं तदुच्यते ॥५५॥
निविष्टश्च बहिर्नैति—अत्यन्तसूक्ष्मत्वादिति शेषः ॥ ५४ ॥
मृतलोहस्य स्थूलपरीक्षामुक्त्वा सूक्ष्मपरीक्षामप्याह-पुटे ध्मातं मूषायां निधाया-
ङ्गाराग्नौ स्थापितं, तारमानं न त्यजेत् न्यूनमधिकं वा न भवेत् यदा तदा
तन्मृतं लोहं ज्ञेयम् ॥ ५५ ॥
भा.टी.—यदि किसी धातु की भस्म को तर्जनी और अँगूठे से मला जाय
और अच्छी तरह पोंछ दिया जाय ऐसी अवस्था में भी यदि वह भस्म अँगूठे की
सूक्ष्म रेखाओं में घुसी हुई रह जाय तो उसे मृतलोह कहते हैं ॥५४, ५५॥
वक्तव्य—इसके अतिरिक्त बनी हुई धातु की भस्म को सम भाग चाँदी
और मधु में मिलाकर मूषा में रखकर खूब तपाएँ । यदि शीतल होने पर
चाँदी अपने ही मान में रहे तो उसे भी मृतलोह कहते हैं ।
अपुनर्भवलक्षणम्
समित्रपञ्चकं ध्मातं प्रकृतिं नैति यत् पुनः ।
अपुनर्भवमुक्तं तन्निरुत्थं च तदीरितम् ॥ ५६ ॥
मित्रपञ्चकं प्रागुक्तं गुञ्जाद्यम्, प्रकृतिं नैति पुनर्लोहरूपन्न भवति ॥५६॥
भा.टी.—किसी धातु की बनी हुई भस्म को पूर्वोक्त मित्रपञ्चक की
औषधियों में मिलाकर मूषा में रख अग्नि में तपाया जाय, यदि तपाने पर
भस्म में कोई परिवर्तन न हो तो उसे अपुनर्भव भस्म या निरुत्थलौह भस्म
कहते हैं ॥ ५६ ॥
निरुत्थलक्षणम्
अपुनर्भवसंज्ञं यल्लोहे तारसमन्वितम् ।
यदा तारे न लगति तन्निरुत्थमिहोच्यते ॥५७॥
यच्च लौहं तारसमन्वितं ईषत्तारं सम्मेल्याग्नौ ध्मातं सत् तारे रजते न
लगति रजतसम्पृक्तं न भवति तन्निरुत्थम् ॥ ५७ ॥
भा.टी.—यदि निरुत्थ लोहभस्म में थोड़ी चाँदी मिलाकर तीव्र अग्नि
में तपाया जाय और तपाने पर धातु की भस्म चाँदी के साथ न चिपटे तो
उसे निरुत्थ-भस्म कहते हैं ॥ ५७ ॥
वक्तव्य—ठीक रसभस्मों की परीक्षा के विषय में प्रधान रूप से चार
मत देखने में आते हैं—१ कुछ लोग औषधि (रस, धातु) का भस्म करने
२४ रसतरङ्गिणी
पर पूरे प्रमाण में रहना ही सिद्धि लक्षण मानते हैं । २ कुछ निरुत्थ होना ही
सिद्धि लक्षण मानते हैं । ३ और कोई अग्नि में रखने पर धुवाँ न देना ही
रससिद्धि लक्षण मानते हैं । ४ कोई पानी में तैरना सिद्धि का चिह्न समझते
हैं, परन्तु उक्त चतुर्विध सिद्धिलक्षणों में कोई एक भी सर्वथा माननीय नहीं
है । अतः मेरे विचार में रससिद्धि का लक्षण एक न होकर द्रव्यानुसार अनेक
प्रकार है ।
अर्थात् पारद की भस्म करने पर उसका पूर्णपरिणाम में उतरना पारद
भस्म सिद्ध का लक्षण समझना चाहिए । ताम्र रजत आदि धातुओं की निरुत्थ
भस्म होना सिद्धि-चिह्न विशेष रूप से समझना चाहिए । हरताल आदि द्रव्यों
की भस्म होने पर अग्नि में रखने पर धुआँ न देना सिद्धि-चिह्न और लोह का
भस्म होने पर जल पर तैरना सिद्धि-चिह्न समझना चाहिए ।
अमृतीकरणम्
लोहादीनां मृतानां वै शिष्टदोषापनुत्तये ।
क्रियते यस्तु संस्कार अमृतीकरणं मतम् ॥५८॥
अथामृतीकरणं सप्रयोजनमाह लोहादीनामिति-आदिना गगनादिग्रहणम्।
शिष्टदोषाः ताम्रादीनां वान्तिभ्रान्त्यादयः, तेषामपनुतिर्विनाशः ॥ ५८ ॥
भा.टी.—धातुओं की भस्म करने पर उसमें रहे हुए शेष दोष को दूर
करने के लिए जो संस्कार किया जाता है उसे अमृतीकरण कहते हैं । जैसे
ताम्रभस्म का अमृतीकरण संस्कार आगे लिखा हुआ है ॥ ५८ ॥
परिस्रुतसलिलम्
यन्त्रेण नाडिकाख्येन वह्निसन्तापयोगतः ।
बिन्दुशो यत्स्रुतं नीरं तत्परिस्रुतमुच्यते ॥ ५६ ॥
बिन्दुशः परिस्रुतं नीरं अर्कपदवाच्यं तत्परिस्रुतम् ॥ ५६ ॥
भा.टी.—नाड़िका यन्त्र अथवा भपके में केवल जल या जलयुक्त कोई
औषधि डालकर अग्नि में रखकर उसके जल बूँद रूप में एकत्र कर लेने
को परिस्रुत जल कहते हैं । इसी को डाक्टर लोग डिस्टिलवाटर कहते हैं ॥५६॥
मानपरिभाषा
मानमादौ परीक्षेत योगान्निर्मापयेत्ततः ।
योगनिमाणसिद्धयर्थं मानं निर्दिश्यतेऽधुना ॥६०॥
षड्भिस्तु सर्षपैर्गौरैर्यवस्त्वेकः प्रकीर्तितः ।
त्रिभिर्यवैश्च गुञ्जैका मता सैवेह रक्तिका ॥ ६१ ॥
द्वितीयस्तरङ्गः २५
वसुसंख्योन्मिताभिश्च रक्तिकाभिस्तु माषकः ।
माषकैः रविसंख्यातैस्तोलकं परिकीर्तितम् ॥६२॥
वटकः क्षुद्रकश्चैव द्रंक्षणश्च प्रकीर्तितः ।
तोलकद्वितयेनेह कर्षः स्यात्सैव तिन्दुकः ॥६३॥
अक्षः स एव कथितो विडालपदकं तथा ।
कवलग्रहसंज्ञश्च सुवर्णश्च निगद्यते ॥६४॥
कर्षद्वयं त्वर्द्धपलं स्याच्छुक्तिश्च निगद्यते ।
मता चाष्टमिका सैव पलार्द्धञ्च प्रकीर्तितम् ॥६५॥
शुक्तिभ्यान्तु पलं ज्ञेयं मुष्टिः षोडशिका च सा ।
चतुर्थिका च बिल्वञ्च प्रकुञ्चश्च निगद्यते ॥६६॥
पलाभ्यां प्रसृतं ज्ञेयं प्रसृतिश्च निगद्यते ।
प्रसृतिभ्यां समाख्यातः कुडवश्चाञ्जलिः स्मृतः ॥६७॥
कुडवाभ्यां शरावः स्यात् मानिका च निगद्यते ।
तदेवाष्टपलं ख्यातं रसतन्त्रे विचक्षणैः ॥६८॥
दशभिश्च पलैरत्र सेरस्त्वाधुनिकः स्मृतः ।
अशीतितोलकमितः स एव सेरकः स्मृतः ॥६९॥
अथ मानपरिभाषा—योगान् मृत्युञ्जयरसप्रभृतीन् । वसुसंख्या अष्टमिता,
“अष्टौ वसव” इति स्मरणात् । रविसंख्यातैः द्वादशभिः । सैव तिन्दुक इत्यत्र
सन्धिः “सैष दाशरथी रामः” इतिवत् । दशभिश्च पलैरिति पलस्याष्टतोलकमि-
तत्त्वात् । आधुनिकः वर्त्तमाने प्रचलितः ॥ ६०–६६ ॥
भा.टी.—वैद्य को किसी योग को बनाने के पूर्व मान (तौल) का ज्ञान
करना अत्यन्त आवश्यक है । अतएव योगनिर्माण में सफलता और सरलता
प्राप्त करने के लिए मानपरिभाषा लिखी जाती है । छः सफेद सरसों के बरा-
बर एक जौ का मान होता है । तीन यव की एक गुञ्जा या रत्ती होती है ।
आठ रत्तियों का एक मासा होता है । और बारह मासे का एक तोला होता
है । इसी तोले को संस्कृत में वटक, क्षुद्रक और द्रंक्षण भी कहते हैं । दो
तोले को एक कर्ष होता है । इसी कर्ष का तिन्दुक, अक्ष, विडालपदक, कव-
लग्रह तथा सुवर्ण भी कहते हैं । दो कर्ष अर्थात् चार तोले को अर्धपल, शुक्ति,
अष्टमिका और पलार्द्ध भी कहते हैं । दो शुक्ति अर्थात् आठ तोले को एक
पल, मुष्टि, षोंडिका, चतुर्थिका, बिल्व और प्रकुञ्च भी कहते हैं । दो पल
२६ रसतरङ्गिणी
( १६ तोला ) को प्रसृत अथवा प्रसूति कहते हैं । दो प्रसुतियों ( ३२ तोला )
का एक कुडव अथवा अञ्जलि होती है । दो कुड़वों का एक शराव ( ६४
तोला ) होता है । इसी को मानिका तथा अष्टपल भी कहते हैं । दश पल
( ८० तोला ) का आजकल का एक सेर होता है जिसमें अस्सी तोले होते
हैं । इसी को सेरक भी कहते हैं ॥ ६०-६६ ॥
वक्तव्य—मानपरिभाषा के विषय में बहुत मतभेद देखा जाता है ।
अतः इस विषय में विस्तृत रूप से देखना हो तो परिभाषाप्रदीप शाङ्गधर
आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए ॥ ६०-६६ ॥
धन्वन्तरिभागः
अर्द्धं सिद्धरसादीनां तथैव घृततैल्योः ।
पादस्तु मृतधात्वादेरवदेहस्य चाष्टमः ॥७०॥
भागस्तुरीयोऽरिष्टादेश्चूर्णादीनाञ्च सप्तमः ।
भिषग्वराय लोकेस्मिन् स्वास्थ्यमङ्गलकाम्यया ॥७१॥
धन्वन्तरिं विनिर्दिश्य रोगिभिर्दीयते तु यः ।
पूर्वाचार्यैः समाख्यातो भागो धन्वन्तरेस्तुः सः ॥ ७२ ॥
प्राचीनक्रमाद् धन्वन्तरिभागो निगद्व्याख्यातः ॥ ७०-७२ ॥
भा.टी.-रोगी के वैद्य के द्वारा रसादि औषधि बनवाने पर उस औषधि
में से जो भाग वैद्य को परिश्रम के रूप में या प्रसन्न करने के लिए तथा अपने
स्वास्थ्य को पूर्व रूप में प्राप्त करने के लिए धन्वन्तरि ( प्रधान आदि वैद्य )
के नाम पर वैद्य को दिया जाता है उसे "धन्वन्तरिभाग" कहते हैं। भिन्न-भिन्न
औषधि का निम्नलिखित रूप से धन्वन्तरिभाग दिया जाता है । बनवाये हुए
रसों में से आधा भाग वैद्य को देना धन्वन्तरि का माना जाता है । घी तथा
तेलों का भी आधा भाग धन्वन्तरि के नाम पर दिया जाता है । रस तथा
धातुओं की भस्म में से चतुर्थांश, च्यवनप्राश आदि अवलेहों का अष्टमांश,
आसव अरिष्टों का चतुर्थांश, चूर्ण वटी आदि का सातवाँ भाग धन्वन्तरिभाग
के नाम से कहा और दिया जाता है ॥ ७०-७२ ॥
विश्वासघातको वैद्यः
भागाद्धन्वन्तरेर्लोभादधिकं यो हरेद्भिषक् ।
दद्याच्च भेषजं दुष्टं स वै विश्वासघातकः ॥ ७३ ॥
भा.टी.-जो वैद्य लोभवश धन्वन्तरि भाग से अधिक भाग लेता है अथवा
लोभवश औषधि में असली औषध न डालकर मामूली औषधि डालता
है और बहुमूल्य औषधि की कीमत रोगी से लेता है वह विश्वासघातक वैद्य
कहा जाता है ॥ ७३ ॥
इयमिह रसत्तन्त्रागाधरत्नाकराध् ।
परिचितपरिभाषामूल्यरत्नानि चित्वा।
रुचिरतरनिवेशा गुम्फिता कण्ठमाला
भवतु विबुधकण्ठालम्बिनी सा नितान्तम् ॥ ७४ ॥
इति परिभाषाविज्ञानीयो नाम द्वितीयस्तरङ्गः ।
इयमिहेत्यादिनोपसंहारः—रसत्तन्त्रमेवागाधो रत्नाकरस्तस्मात् परिचिताः
व्यावहारिक्यः परिभाषा एव अमूल्यानि रत्नानि, चित्वा एकत्रीकृत्य, 'रत्नमाला'
इति युक्तः पाठ औचित्यात् , विबुधकंठावलम्बिनी विद्वत्कंठीकृता ॥ ७४ ॥
भा.टी.—यहाँ पर रसशास्त्र रूपी अगाध समुद्र में से विशेष रूप से व्यव-
हार में आनेवाली जो परिभाषा लिखी हैं, वे सदा वैद्यों को कण्ठस्थ होनी
चाहिए ताकि योगनिर्माण तथा औषधि-प्रयोग में गलती न हो ॥ ७४ ॥
इति परिभाषाविज्ञानीय नाम द्वितीय तरङ्ग समाप्त हुआ ।
**अथ मूषादिविज्ञानीयस्तृतीयस्तरङ्गः**
**मूषानामानि**
मूषा हि कुमुदी ख्याता प्रोक्ता कुमुदिका च सा ।
क्रौञ्चिका वह्निमित्रा च पाचनी च निगद्यते ॥१॥
मुष्णाति दोषान् यस्मात्सा तस्मान्मूषा प्रकीर्तिता।
कुमुदाकारसादृश्यात् कुमुदी च निगद्यते ॥२॥
वह्निर्मित्रं यतश्चास्या वह्निमित्रा ततः स्मृता ।
द्रव्यपाचनयोगाच्च पाचनी समुदीरिता ॥३॥
ज्ञानसौलभ्याय मूषापर्यायाः समानप्रवृत्तिनिमित्तत्वात्। नाम्नामर्थपरीक्षणा-
न्मौलिकताद्योतनार्थम् । मुष्णाति अपनयति दोषान् तन्मध्यपतितद्रव्याणामग्नि-
संयोगात् तस्मान्मूषा । कुमुदो रात्रिपुष्पश्चन्द्रदयितस्तस्याकारो वर्त्तुलह्रस्वविकस्व-
रास्यस्तत्साहश्याद् गौणं नाम “सिंहो माणवक” इतिवत् , क्रौञ्चिकातन्मुखा-
कारसामान्यात् , वह्निमित्रा साहचर्य्यात् , पाचनी द्रव्यपाचनात् ॥ १-३ ॥
२८ रसतरङ्गिणी
भा.टी.—मूषा को कुमुदी, कुमुदिका, क्रोञ्चिका, वह्निमित्रा तथा पाचनी
नाम से कहा जाता है अर्थात् मूषा के यह पर्यायवाचक नाम हैं। क्योंकि मूषा
उसमें रखकर तपाये या पकाये हुए द्रव्य के दोषों को हर लेती है अतः उसे
मूषा कहते हैं। रात्रि में खिलनेवाले कमल पुष्प के समान आकार होने से
मूषा को कुमुदी कहते हैं। क्योंकि मूषा को अग्नि मित्र होती है अर्थात् अग्नि
में मूषा नहीं जलती है अतः उसे वह्निमित्र कहते हैं। इसमें द्रव्य रखकर
पकाया जाता है अतः इसे पाचनी भी कहते हैं ॥ १-३ ॥
वक्तव्य—व्यवहार में मूषा को घरिया कहते हैं यह प्रायः सोनारों के पास
सोना चाँदी को गलाने के काम आती है।
पिधानम्
द्रव्यपूरितमूषादेः द्रव्यपातन्निवृत्तये ।
आच्छादकं भवेद् यत्तु पिधानं तदिहोच्यते ॥ ४ ॥
द्रव्यपूरितमूषादेरित्यपादाने पञ्चमी। द्रव्यस्य पातः बहिरुच्छलनं, तन्निवर्तकं
पिधानकम् ॥ ४ ॥
भा.टी.—मूषा, पुट या हाँडी आदि में द्रव्य भरकर उस द्रव्य को बाहर
गिरने से बचाने के लिये अथवा उठाने-रखने में सुविधा के लिए मूषा आदि
के मुख पर जो ढक्कन दिया जाता है उसे "पिधा" कहते हैं ॥ ४ ॥
सन्धिलेपनम्
मूषादीनां तु यत्सन्धौ किट्टाद्यैः स्याद्विलेपनम् ।
तत्सन्धिलेपनं ख्यातं तच्चोक्तं सन्धिबन्धनम् ॥ ५ ॥
सन्धिलेपनं व्याख्यासमम् ॥ ५ ॥
भा.टी—मूषा आदि यंत्र और उसके ढक्कन के जोड़ पर छिद्र को बन्द
करने के लिये जो लोह कीट्ट, मिट्टी आदि से लेप किया जाता है उसे सन्धि-
लेपन या सन्धिबन्धन कहा जाता है ॥ ५ ॥
मूषानिर्माणोचिता मृत्तिका.
सशर्करा पाण्डुरा च वह्नितापसहा चिरम् ।
स्थूला च मृत्तिका या स्यान् मूषार्थं सा मतोत्तमा ॥६॥
सशर्करा स्फुटनभयराहित्यात्, वह्नितापसहा वह्नौ स्फुटनावर्जिता ॥ ६ ॥
भा. टी.—मूषा बनाने के लिये कुछ रेतीली पाण्डुर वर्ण मोटे कणों
की देर तक अग्नि सहन करनेवाली मिट्टी अच्छी समझनी चाहिए ॥ ६ ॥
तृतीयस्तरङ्गः २६
सामान्यमूषा
शिखित्रकैर्दग्धतुषैः शणेन सलद्दिका दण्डसुकुट्टिता च।
या मृत्तिका तद्विहिता तु मूषा सामान्यमूषा कथिता रसज्ञैः ॥७॥
शिखित्रकैर्जलनिर्वापितैरङ्गारैः। लद्दिका घोटकपुरीषम्। दण्डेन मुसला-
दिना सामान्यमूषेत्यनुक्तविशेषमूषास्थाने ग्राह्या ॥ ७ ॥
भा.टी.-बुझे हुए कोयले, तुष की राख, सूक्ष्म शण के रेशे और घोड़े की
लीद; इन सबको एकत्र मिलाकर मूसली या हथौड़ी से अच्छी तरह कूटकर
बनाई हुई मिट्टी के द्वारा निर्माण की हुई मूषा को सामान्य मूषा कहते हैं ॥७॥
वक्तव्य—जहाँ पर किसी मूषा का नाम न दिया हो वहाँ उक्त प्रकार से
बनी हुई सामान्य मूषा को काम में लाना चाहिए।
वज्रमूषा
त्रयो भागा मृदो द्वौ तु शणलद्दिकयोस्तथा।
भागो दग्धतुषादेश्च किट्टस्य त्वर्ध एव च ॥८॥
एभिः कृता तु या मूषा वज्रमूषा तु सा मता।
प्रयुज्यते विशेषेण सत्त्वपातनकर्मणि ॥ ६ ॥
वज्रमूषा कठिनतायां वज्रतुल्या, यथाभागं मृत्तिकाशणादिक्षेपश्च सुश्ल-
क्षणताहेतुः व्यपगतस्फुटनभयो निर्माणसुखश्चेति ॥ ८, ६ ॥
भा.टी.—तीन भाग मिट्टी, एक भाग शण, एक भाग घोड़े की लीद,
एक भाग तुष आदि की राख, आधा भाग लोह कीट (मण्डूर); इन सब को
एकत्र मिलाकर खूब कूटकर बनाई मूषा को वज्रमूषा कहते हैं। यह मूषा
अभ्रक हीरा आदि कठिन द्रव्यों के सत्त्व पातन करने के निमित्त विशेष रूप से
व्यवहार में ली जाती है ॥ ८, ६ ॥
वक्तव्य—इस प्रकार से बनी हुई मूषा वज्र के समान दृढ़ होने से वज्र
मूषा शब्द से कही जाती है। इसके बनाने में कोई दो भाग शण तथा दो
भाग घोड़े की लीद लेते हैं।
योगमूषा
तुषाद्यैश्च बिडाद्यैश्च कृता चापि विलेपिता।
सूतसिद्धिकरी चैषा योगमूषा निगद्यते ॥ १० ॥
सूतसिद्धकरी पारदसाधनकरिका ॥ १० ॥
भा.टी.-तुषभस्म, कोयले, बाँबी की मिट्टी तथा क्षार, अम्ल गन्धक,
३० रसतरङ्गिणी
लवण आदि विड द्रव्यों से मूषा बनाकर फिर इस मूषा को उक्त द्रव्यों के ही
कल्क से अच्छी तरह तीन चार लेप करके सुखा लेवें । इस मूषा को योगमूषा
कहते हैं । इस मूषा द्वारा पारद मारण किया जाता है ॥ १० ॥
वज्रद्रावणिका मूषा
समैर्भूनागगाराद्यैस्तुषाद्यैश्चापि निर्मिता ।
क्षीरैश्च माहिषैर्मूषा वज्रद्रावणिका मता ॥ ११ ॥
वज्रद्रावणिका मूषा वज्रसत्त्वप्रसाधिका ।
यामद्वयमपि ध्माता नासौ द्रवति कर्हिचित् ॥ १२ ॥
भूनागः कञ्चुलिकस्ताम्रवर्णः कीटविशेषः सरीसृपो वर्षासु जायमानः ।
गारो जलप्लुता मृत्तिका । यामद्वयमपि ध्मातेति अत्यन्तदृढेत्यर्थः ॥११, १२॥
भा.टी.-सूखे केंचुए, गारा तथा तुष भस्म आदि को सम भाग में लेकर
भैंस के दूध के साथ मर्दन करके बनाई मूषा को वज्रद्रावणिका मूषा कहते हैं ।
यह मूषा वज्र (हीरा) के सत्त्वपातन करने में काम आती है । छः घण्टे निर-
न्तर अग्नि देने पर भी यह पिघलती या जलती नहीं है ॥११, १२॥
वक्तव्य-तन्त्रान्तर में इस मूषा को चार पहर की अग्नि सहन करनेवाली
लिखा है और इसका निर्माण निम्न प्रकार से लिखा है "गारभूनागधौताभ्यां
तुषमष्टशणेन च । समैः समा च मूषामृन्महिषोद्दुग्धमर्दिता ॥ तया विरचिता
मूषा लिप्ता मत्कुणशोणितैः । बालाऽब्दध्वनिमूलैश्च वज्रद्रावणक्रौञ्चिका । सह-
तेऽग्निं चतुर्यामं द्रवेण व्यथिता सती ॥"
गारमूषा
दग्धषड्गुणगारेण मृदा चासितया तु या ।
विधीयते च किट्टाद्यैर्गारमूषा तु सा मता ॥१३॥
यामयुग्ममपि ध्माता नासौ द्रवति निश्चितम् ।
ढालनादौ विशेषेण रसज्ञैः सा प्रयुज्यते ॥१४॥
असितया कृष्णया ॥१३, १४॥
भा.टी.-काली मिट्टी एक भाग, तुषभस्म या गारा छः भाग लेकर
उसमें आवश्यकतानुसार लोह कीट तथा शण आदि मिलाकर बनाई हुई
मूषा को गारमूषा कहते हैं । छः घण्टे निरन्तर अग्नि में रखकर तपाने से
भी यह नहीं पिघलती है । और यह मूषा विशेषा कर धातु को पिघलाकर
ढालने के काम में आती है ॥ १३, १४ ॥
तृतीयस्तरङ्गः ३१
वक्तव्य—रसरत्नसमुच्चय में इसका लक्षण निम्न प्रकार से बहुत स्पष्ट
मिलता है। और "दग्ध” स्थान पर "दुग्ध” पाठ मिलता है "दुग्धषड्गुणगा-
राष्ट्रकिट्टाङ्गारशणान्विता । कृष्णमृद्भिः कृता मूषा गरमूषेत्युदाहृता ॥”
गोस्तनीमूषा
सापिधाना शिखोपेता गोस्तनाकारसन्निभा ।
सत्त्वद्रावणशुद्ध्यर्था सा मूषा गोस्तनोमता* ॥१५॥
शिखोपेता शिखायुक्ता, ग्रहणसौकर्यार्थ ॥ १५ ॥
भा. टी.—गोस्तन के आकार की एक मूषा बनाकर उसके मुख पर रखने
के लिए एक ऐसा पिधान ( ढकन ) बनायें जो नीचे को चौड़ा और ऊपर की
तरफ पतला शिखाकार हो । इसे गोस्तनी मूषा कहते हैं। यह मूषा अभ्रक आदि
सत्त्वों के द्रावण तथा शुद्धि के काम आती है ॥ १५ ॥
मल्लमूषा
सम्पुटाकारतां नीता मल्लद्वितययोजनात् ।
मल्लमूषा समाख्याता पर्पट्यादिप्रसाधिका ॥ १६ ॥
मल्लद्वितयं = चषकयुगम् । पर्पट्यादिप्रसाधिकेति न स्वर्णपर्पट्यादिसाधन-
मत्राभिप्रेतम्, अपि तु विशिष्टो रसः कश्चित् । यथा रसरत्नसमुच्चये त्रैलोक्य-
सुन्दरः— “विमर्दिताभ्यां रसगन्धकाभ्यां नीरेण कुर्यादिह गोलकन्तु। भाण्डे नवीने
विनिवेश्य पश्चात्तद्गोलकस्योपरि ताम्रपात्रम् ॥ सार्धंमुहूर्त्तं विनिरुध्य धीमानुद्दी-
पयेद्दीप्तकृशानुनास्य । अधस्ततः सिद्ध्यति पर्पटीयं नवज्वरारण्यकृशानुमेषः ॥”
इति॥ १६ ॥
भा. टी.—दो गोल प्यालों को आपस में जोड़ कर संपुट के रूप में बना
लेने को मल्लमूषा कहा जाता है । इसके द्वारा पर्पटीरस आदि रसों को बनाया
जाता है ॥ १६ ॥
महामूषा
वर्तुला चिपिटा मूले स्थूला चायामविस्तरा ।
विस्तृतास्या च या मूषा महामूषा तु सा मता ॥१७॥
लोहाभ्रताप्यसत्त्वादेः पुटनार्थं भिषग्वरैः ।
प्रयुज्यते महामूषा स्थूलमूषा च सा स्मृता ॥१८॥
- इयमेव मूषा रसार्णवे अन्धमूषाख्यया प्रतिपादिता । तथा हि—
“अन्धमूषा तु कर्तव्या गोस्तनाकारसन्निभा ।
पिधानकसमायुक्ता किञ्चिदुन्नत मस्तका” ॥ १ ॥
३२ रसतरङ्गिणी
आयामविस्तरेति आयामे विस्तारे च समा, विस्तृतं आस्यं मुखं यस्याः
सा विस्तृतास्या ॥ १७, १८ ॥
भा.टी.-एक ऐसा पात्र जिसकी लम्बाई-चौड़ाई सम भाग हो और
मूल (नीचे की तरफ) में गोल और चपटा (जिससे जमीन में अच्छी तरह
स्थिर रह सके) हो औ मोटा हो ऊपर मुख की तरफ बहुत खुला हुआ हो तो
उसे महामूषा कहते हैं। इसी को स्थूलमूषा भी कहा जाता है। इस मूषा
को वैद्यलोग लोह, अभ्रक, स्वर्णमाक्षिक के सत्त्वादि को पुट देने के लिए काम
में लाते हैं ॥ १७, १८ ॥
वृन्ताकमूषा
धत्तूरपुष्पाकारेण सच्छिद्राष्टाङ्गुलेन च ।
नालेन तूर्ध्वतः श्लिष्टां सुदृढ़ं द्वादशाङ्गुला ॥१६॥
वृन्ताकसदृशाकारा मूषा वृन्ताकभूषिका ।
साधयेत्खर्परादीनां सत्त्वं वै मूषयाऽनया ॥२०॥
वृन्ताकमूषायां धत्तूरपुष्पाभनालनिर्देशः सत्वपातसुखार्थः नालस्थ विस्तृतं
मुखं मूषामुखे सन्धिवन्धनं विधेयम् ॥ १६, २० ॥
भा.टी.-बारह अंगुल लम्बी चौड़ी बैंगन के आकार की एक मूषा
बनायें इसके मुख में आने योग्य एक ऐसा ढक्कन बनायें जो धतूरे के फूल
के सदृश ऊपर को चौड़ा और नीचे को पतला आठ अंगुल लम्बी नलीवाला
हो जिससे मूषा में द्रव्य भरकर धतूर-आकार ढक्कन को उसमें जोड़कर
अग्नि में रखा जाता है। इस प्रकार से बनाई हुई मूषा को बैंगन के समान
आकार होने से वृन्ताकमूषा कहते हैं। इसके द्वारा खर्पर आदि द्रव्यों का
सत्त्वपातन आदि कार्य किया जाता है ॥ १६-२० ॥
मूषाप्यायनकम्
द्रव्ये द्रवोन्मुखे जाते मूषाया वह्नियोगतः ।
निष्कासनं क्षणं यत्तु तन्मूषाप्यायनं मतम् ॥२१॥
मूषाऽप्यायनं मूषारक्षार्थमौषधदाहनिवारणार्थञ्च । द्रवोन्मुखे जात इति
तदानीं मूषाऽऽप्यायनकालो नार्वाक् ॥ २१ ॥
भा.टी.--मूषा में द्रव्य रखकर अग्नि में रखने पर जब द्रव्य मिलने
लगता है थोड़ी देर के लिये उसे बाहर निकालने को मूषाप्यायन कहते हैं।
इससे मूषा में अग्निसहनशक्ति बढ़ जाती है ॥ २१ ॥
३ तृतीयस्तरङ्गः ३३
अङ्गारधानिका
अङ्गारधानिका ख्याता हसन्ती च हसन्तिका ।
अङ्गारशकटी चापि हसनी च निगद्यते ॥२२॥
अङ्गारधानिका ह्येषा मृदुद्रव्यप्रसाधिका ।
वङ्गादीनां ढालनादौ विशेषेण प्रयुज्यते ॥२३॥
अङ्गारधानिका यथार्थनाम्नी । उज्ज्वलनासादृश्याद् हसन्ती च ॥२२ २३॥
भा.टी.—कोयलों की अँगेठी को अङ्गारधानिका, हसन्ती, हसन्तिका,
अँगारशकटी और हसनी नाम से कहा जाता है । यह अँगेठी मृदु द्रव्यों के
लगाने और पकाने के काम आती है, विशेष रूप से राँगा तथा वंग को पिघला
कर शोधन या ढालन के काम आती है ॥ २२-२३ ॥
कोष्ठिका
सत्त्वादियातनार्थं द्रव्यढालनसाधिका ।
वह्निसन्धानिका या तु कोष्ठिका सा निगद्यते ॥२४॥
वह्निसन्धानिका सर्वतोऽवरुद्धवह्नितया सम्यग्द्रव्यतापक्री ॥ २४ ॥
भा.टी.—सत्त्वादि के पातनार्थ तथा पिघले हुए द्रव्यों के ढालनार्थ जो
कोयलों की भट्टी बनायी जाती है उसे कोष्ठिका कहते हैं । इसमें चारों तरफ
से रुकावट होने से अग्नि अधिक तीव्र होती है ॥ २४ ॥
अङ्गारकोष्ठिका
नृपहस्तमितोत्सेधे तदर्धाय्यामविस्तृता ।
मध्यतश्चतुरस्रा च मृदा च परिलेपिता ॥२५॥
चतुरङ्गुलमानेन रन्ध्रेण परिशोभिता ।
नालिकां समकोणाञ्च रन्ध्रे तिर्यङ् निवेशयेत् ॥२६॥
नालिकाया मुखे चैव भस्त्रावक्त्रं निवेशयेत् ।
आपूर्य कोकिलैः कोष्ठीं द्रव्यमूषान्वितां धमेत् ॥२७॥
अङ्गारकोष्ठिका ख्याता द्रव्यढालनसाधिका ।
सत्त्वानां पातने चेयं विशेषाद्विनियुज्यते ॥२८॥
उत्सेधे = उच्चतायां, नृपहस्तमिता = सपादहस्तपरिमाणा, चतुरस्रा =
चतुष्कोणा ॥ २५-२८ ॥
भा.टी.—समतल जमीन के ऊपर एक ऐसी भट्टी बनायें जो नृपहस्त
(एक गज) ऊँची और आधा गज चौड़ी (बीच में खाली जगहवाली)
३४ | रसतरङ्गिणी
हो । बीच का यह आधा गज रिक्तस्थान गोल न होकर चतुष्कोण होना
चाहिए। अर्थात् भीतरी चारों कोने एक हाथ गहरे और चौड़े हों। अब इस
भट्ठी की भीतरी और बाहर की दीवारों को चिकनी मिट्टी से अच्छी तरह लीप
दिया जाय जिससे अग्नि बाहर न जाने पाये। फिर इस भट्ठी की एक दीवार
में तलप्रदेश पर एक चार अंगुल गोल छिद्र बनायें। इस छिद्र में एक
लोहे या बाँस की समकोण गोल नली लगा दें, नली में बाहर की तरफ
से चमड़े की धौंकनी का मुख जोड़ दें और भट्ठी में कोयले डालकर उन पर
द्रव्ययुक्त मूषा रखकर अग्नि जलाकर धौंकें। इस प्रकार से बनी हुई कोष्ठी
को अंगारकोष्ठी कहते हैं। यह कोष्ठी द्रव्यों के ढालनार्थ प्रयुक्त होती है और
सत्त्वपातन कार्य में विशेष रूप से काम आती है ॥ २५-२८ ॥
वक्तव्य-नृपहस्त से सवा हाथ का भी ग्रहण किया जाता है। अतः सवा
हाथ ऊँची और १५ अंगुल चौड़ी गड़रवाली कोष्ठी बनायी जा सकती है।
रसरत्नसमुच्चय में निम्न प्रकार से अंगारकोष्ठी का वर्णन है जो इससे कुछ
भिन्न है-"राजहस्तसमुत्सेधा तदर्द्धायमविस्तरा। चतुरस्रा च कुब्जेन वेष्टिता
मृन्मयेन च ॥ एकभित्तौ न्वरेद् द्वारं वितस्त्याभोगसंयुतम्। द्वारं सार्द्धवितस्त्या
च सम्मितं सुदृढं शुभम् ॥ देहल्यधो विधातव्यं धमनाय यथोचितम्। प्रादेशप्र-
मिता भित्तिरुत्तरङ्गस्य चोर्ध्वतः॥ द्वारं चोपरि कर्तव्यं प्रादेशप्रमितं खलु।
ततश्चैष्टकया रुद्ध्वा द्वारसन्धि विलिप्य च ॥ शिखित्रैस्तान् समापूर्य घमेदस्रा-
द्वयेन च। शिखित्रान् धमनद्रव्यमूर्ध्वद्वारेण निक्षिपेत् ॥ सत्वपातनगोलांश्च पञ्च
पञ्च पुनः पुनः। भवेदंगारकोष्ठियं खराणां सत्त्वपातिनी ॥"
पातालकोष्ठिका
वितस्तिविस्तृतं गर्तं भूमौ कुर्याद्विधानतः ।
तन्मध्ये वर्तुलं छिद्रं निम्नवेशे प्रकल्पयेत् ॥२६॥
गर्तमध्यगते छिद्रे तिर्यङ् नालं निवेशयेत् ।
नालवक्त्रे च भस्त्राया मुखं सम्यङ् निरोधयेत् ॥३०॥
द्रव्यमूषां कोष्ठिकायां निधाय भस्त्रया धमेत् ।
पातालकोष्ठिका ह्येषा मृदुद्रव्यप्रसाधिका ॥ ३१ ॥
वितस्तिविस्तृतं = द्वादशाङ्गुलमानम् । तदुक्तम्—"पातालकोष्ठिका ह्येषा
मृदूनां सत्वपातनी। ध्मानसाध्यपदार्थानां नन्दिना परिकीर्तिता" ॥ २६-३१ ॥
आ.टी.-जमीन पर एक ऐसा गढ़ा बनायें जो एक बालिश्त ( बारह
तृतीयस्तरङ्गः ३५
अंगुल) लम्बा और उतना ही चौड़ा गोल हो। अब गढ़े के मध्यप्रदेश में चार
अंगुल चौड़ा गोल एक और छिद्र बनायें जिसका मुख बाहर की तरफ तिरछा
होना चाहिए। इस तिरछे मुखवाले निम्नगर्त के मुख पर निचले सिरे से ऊपर
पृथ्वी तक तिरछी नली लगाकर इन नली का मुख धौंकनी के मुख के साथ
अच्छी तरह जोड़ दें। अब कोष्ठ में कोयलों के ऊपर द्रव्ययुक्त मूषा रख के
धौंकनी से धौंकें। इसे पातालकोष्ठी कहते हैं। इसके द्वारा मृदुद्रव्यों का
सत्त्वपातन आदि कार्य किया जाता है॥ २६-३१॥
वक्तव्य-रसरत्नसमुच्चय में इस कोष्ठी के विषय में इतनी विशेषता
लिखी हुई है कि "बीच के छिद्र के ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला मिट्टी का
प्याला या फलक रख दिया जाता है।"
अथ पुटलक्षणम्
रसोपरसलोहादेः पाकमानप्रसापकम्।
उत्पलाद्यग्निसंयोगात् यत्तदत्र पुटं स्मृतम्॥३२॥
अथ क्रमप्राप्तं पुटलक्षणमाह-रसः पारदः, उपरसोऽभ्रादयः, लोहाः
सुवर्णादयः, तेषां पाको वह्निसंयोगेन गुणान्तरपरिणामः, तस्य मानज्ञापकम्,
उत्पलादित्यत्रादिना तुषादिग्रहः॥ ३२॥
आ.टी.-रस उपरस धातु उपधातुओं में से किसको कितनी बार कितनी
अग्नि से पकाया गया है इस बात को सूचित करने के लिए जो औषधि को
सम्पुट में बन्दकर न्यून या अधिक उपले-तुष आदि की अग्नि दी जाती है
उसे "पुट" कहा जाता है॥ ३२॥
वक्तव्य-प्रत्येक उपरस धातु आदि अपनी-अपनी अग्निताप-सहन
शक्ति रखता है। उसके अनुसार उसे उतनी ही अग्नि देने के लिए भिन्न-भिन्न
प्रकार के पुटों की आवश्यकता होती है जिससे कि वह न अधिक नन्यून रूप से
पकने पाये। इसी अभिनय को लेकर रसरत्नसमुच्चय में भी लिखा है-"रसादि-
द्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं पुटम्। नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः, सुपाकं हितमौषधम्॥"
पुटप्रयोजनम्
अवेद्यतः पुटादेव दोषहानिर्गुणोदयः।
रसोपरसलोहानां पुटपाकस्ततः स्मृतः॥ ३३॥
पुटपाकेन लोहादेर्निरुत्थत्वञ्च दीपनम्।
अभेद्यारितरत्वञ्च पुटपाकस्ततः स्मृतः॥ ३४॥
३६ रसतरङ्गिणी
मृतलोहादिकं यस्मादतिशेते मृतं रसम् ।
पुटपाकविधानेन पुटं तस्मात्प्रशस्यते ॥३५॥
अथ विशिष्टं प्रयोजनम्—दोषाणां रोगहेतूनाम् , गुणानां=रोगापनयन-
शक्तीनाम् । दीपनं = तीव्रगुणता । तदुक्तम्—“रसादिद्रव्यपाकानां प्रमाणज्ञापनं
पुटम् । नेष्टो न्यूनाधिकः पाकः सुपाकं हितमौषधम् ॥ लोहादेरपुनर्भावो गुणा-
धिक्यं ततोऽप्यता । नचाप्सु मज्जनं रेखापूर्णता पुटतो भवेत् ॥ पुटाद्रागो लघुत्वञ्च
शीघ्रं व्याप्तिश्च दीपनम् ॥ जारितादपि सूतेन्द्रालोहानाधिको गुणः”॥३३-३५॥
भा०टी०—क्योंकि पुट द्वारा पाक करने पर रस, उपरस, धातु आदि में
स्थित विभिन्न प्रकार के रोगोत्पादक दोषों का नाश होता है, और भिन्न-भिन्न
औषधियों के योग से उनमें (धात्वादि में) रोगनाशक शक्ति की उत्पत्ति होती
है । अतः पुटपाक करना आवश्यक होता है । इसके अतिरिक्त पुटपाक द्वारा
लोह आदि की भस्म निरुत्थ हो जाती है और उसमें दीपनता (गुणों में तीव्रता)
आ जाती है । इसके द्वारा बनी हुई भस्म वारितर हो सकती है । अतः पुट-
पाक की आवश्यकता होती है । इसके अतिरिक्त सम्यक् पुटपाक विधान से
भी बनी हुई धातु आदि की भस्म कई बार पारद की भस्म की अपेक्षा अधिक
गुणकारी सिद्ध होती है ॥३३-३५॥
वक्तव्य—योग्य अग्नि न मिलने पर भस्म कच्ची रह जाती है जो अन्तः-
प्रयोग करने पर शरीर की जीवनशक्ति या सेलों को नष्ट करती हैं, जिससे
उदर-सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः शीघ्रता तथा अल्प प्रयास
द्वारा एक साथ ही तीव्र अग्नि देकर बनाई हुयी औषधियाँ लाभदायक नहीं
होती हैं । वैज्ञानिकों का यह मत है कि प्रत्येक पदार्थ आकाश की तरफ ऊपर
को डालने पर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे पृथ्वी की ओर आता है । पुट
देने से पदार्थ की यह अधोगमन शक्ति कम हो जाने से उसकी भस्म आमा-
शयादि अंगों में देर तक रहेगी जिससे उसका परिपाक ठीक होकर सूक्ष्मरूप
से शरीर में अधिक-से-अधिक मात्रा में शोषित होकर रक्त में मिल सारे शरीर
के भिन्न-भिन्न अंगों में होनेवाली विकृति को दूर करने में समर्थ होती है ।
अतः पुटप्रयोग विधान आयुर्वेदीय रसशास्त्र का एक अद्भुत विज्ञान है ।
सामान्यपुटक्रमः
मूषागते तु लोहादौ पुटनीये विशेषतः ।
वह्निस्तु स्वानुकूल्येन तथा स्यात्तु पुटक्रमः ॥ ३६ ॥