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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

३४ | रसतरङ्गिणी

हो । बीच का यह आधा गज रिक्तस्थान गोल न होकर चतुष्कोण होना
चाहिए। अर्थात् भीतरी चारों कोने एक हाथ गहरे और चौड़े हों। अब इस
भट्ठी की भीतरी और बाहर की दीवारों को चिकनी मिट्टी से अच्छी तरह लीप
दिया जाय जिससे अग्नि बाहर न जाने पाये। फिर इस भट्ठी की एक दीवार
में तलप्रदेश पर एक चार अंगुल गोल छिद्र बनायें। इस छिद्र में एक
लोहे या बाँस की समकोण गोल नली लगा दें, नली में बाहर की तरफ
से चमड़े की धौंकनी का मुख जोड़ दें और भट्ठी में कोयले डालकर उन पर
द्रव्ययुक्त मूषा रखकर अग्नि जलाकर धौंकें। इस प्रकार से बनी हुई कोष्ठी
को अंगारकोष्ठी कहते हैं। यह कोष्ठी द्रव्यों के ढालनार्थ प्रयुक्त होती है और
सत्त्वपातन कार्य में विशेष रूप से काम आती है ॥ २५-२८ ॥
वक्तव्य-नृपहस्त से सवा हाथ का भी ग्रहण किया जाता है। अतः सवा
हाथ ऊँची और १५ अंगुल चौड़ी गड़रवाली कोष्ठी बनायी जा सकती है।
रसरत्नसमुच्चय में निम्न प्रकार से अंगारकोष्ठी का वर्णन है जो इससे कुछ
भिन्न है-"राजहस्तसमुत्सेधा तदर्द्धायमविस्तरा। चतुरस्रा च कुब्जेन वेष्टिता
मृन्मयेन च ॥ एकभित्तौ न्वरेद् द्वारं वितस्त्याभोगसंयुतम्। द्वारं सार्द्धवितस्त्या
च सम्मितं सुदृढं शुभम् ॥ देहल्यधो विधातव्यं धमनाय यथोचितम्। प्रादेशप्र-
मिता भित्तिरुत्तरङ्गस्य चोर्ध्वतः॥ द्वारं चोपरि कर्तव्यं प्रादेशप्रमितं खलु।
ततश्चैष्टकया रुद्ध्वा द्वारसन्धि विलिप्य च ॥ शिखित्रैस्तान् समापूर्य घमेदस्रा-
द्वयेन च। शिखित्रान् धमनद्रव्यमूर्ध्वद्वारेण निक्षिपेत् ॥ सत्वपातनगोलांश्च पञ्च
पञ्च पुनः पुनः। भवेदंगारकोष्ठियं खराणां सत्त्वपातिनी ॥"
पातालकोष्ठिका
वितस्तिविस्तृतं गर्तं भूमौ कुर्याद्विधानतः ।
तन्मध्ये वर्तुलं छिद्रं निम्नवेशे प्रकल्पयेत् ॥२६॥
गर्तमध्यगते छिद्रे तिर्यङ् नालं निवेशयेत् ।
नालवक्त्रे च भस्त्राया मुखं सम्यङ् निरोधयेत् ॥३०॥
द्रव्यमूषां कोष्ठिकायां निधाय भस्त्रया धमेत् ।
पातालकोष्ठिका ह्येषा मृदुद्रव्यप्रसाधिका ॥ ३१ ॥
वितस्तिविस्तृतं = द्वादशाङ्गुलमानम् । तदुक्तम्—"पातालकोष्ठिका ह्येषा
मृदूनां सत्वपातनी। ध्मानसाध्यपदार्थानां नन्दिना परिकीर्तिता" ॥ २६-३१ ॥
आ.टी.-जमीन पर एक ऐसा गढ़ा बनायें जो एक बालिश्त ( बारह