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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 755

७३० रसतरङ्गिणी

इनको बाह्य और आभ्यन्तर रूप में प्रयोग करने से आराम आता है । इनको
उचित मात्रा में शुद्ध करके सेवन करने से शारीरिक बलवृद्धि होती है । गुञ्जा
के पत्र शोथनाशक होते हैं । आमवात की शोथ में इनका लेप करने से
शीघ्र ही शोथ और शूल में आराम आता है । आमवात के अतिरिक्त वातिक
शूलों में इनका लेप करने से शूल शान्त हो जाता है । गुञ्जापत्र-स्वरस में
मीठा तथा कुछ चरपरा होता है इसको थोड़ा-थोड़ा मुख में रखने से स्वरभेद,
गलशोथ तथा कण्ठ ( गले ) की वेदना दूर होती है । गुञ्जा की जड़ स्वाद में
अत्यन्त मीठी होती है । इसको मुख में रखकर चूसने से कफ पतला होकर
निकलने लगता है और स्वरभेद शान्त होता है । तृष्णा तथा गलशोथ मिट
जाता है । यदि मूत्र करने में कठिनाई हो तो इसके सेवन से आराम आ
जाता है, साथ ही शरीर में बल तथा वर्ण की वृद्धि होती है । गुञ्जामूल,
कासनाशक, शुक्रोत्पादक, रुचिकारक और विषनाशक है । इसके प्रयोग में
उत्पादक अंगों को बल मिलता है, विशेषतः व्रणविकार शान्त होते हैं । गुञ्जा-
मूल में मुलेठी के गुण-धर्म विशेष रूप से पाये जाते हैं, अतः आजकल मुलेठी
के अभाव में गुञ्जामूल का प्रयोग किया जाने लगा है ॥४४६-४५२॥
शुद्धगुञ्जाबीजस्य मात्रा
गुञ्जार्द्धतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जैकसंमितम् ।
गुञ्जाबीजं सुविमलं प्रयुञ्जीत विधानवित् ॥४५३॥
भा.टो.—गुञ्जाबीज चूर्ण की मात्रा आधी रत्ती से लेकर डेढ़ रत्ती तक
शुद्धावस्था में प्रयोग करनी चाहिए ॥४५३॥
गुञ्जाया आमयिकः प्रयोगः
गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं वारिणा परिलेपितम् ।
निहन्त्युत्पिष्टसन्धिस्थां दारुणां शोथवेदनाम् ॥४५४॥
इन्द्रलुप्तं पक्षवधं तत्तदङ्गसमाश्रितम् ।
गृध्रसीं दारुणां चैव सुघोरमवबाहुकम् ॥४५५॥
गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं वारिणा चित्रकान्वितम् ।
प्रलिप्तं शमयत्येव श्वित्रकुष्ठं विशेषतः ॥४५६॥
गुञ्जाया रोगयोग्यः प्रयोगः—प्रसारणाकुञ्चनविवर्तनाक्षेपणाशक्त्युग्ररुजत्व-
स्पर्शासहत्वादिसन्धिमुक्तलक्षणैः सह समन्तात् श्वयथुगदान्, विशेषतो रात्रिरुजा-
करश्चोत्पिष्टसन्धिर्भवति । इन्द्रलुप्तं केशभूमिजः क्षुद्ररोगविशेषः, “रोमकूपानुगं