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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 756

पित्तं वातेन सह मूर्च्छितम् । प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः। रुणद्धि
रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसम्भवः । तदिन्द्रलुप्तं खालित्यं रुह्येति च विभाव्यते॥” इत्यु-
क्तलक्षणः । अवबाहुकः अंसदेशगतः सिराकुञ्चनजो वातव्याधिविशेषः॥४५४-४५६॥
भा.टी.—गुञ्जाबीजों को एक सिल या खरल में जल के साथ बारीक पीस
लेप करने से सन्धिस्थान में दबाव पड़ने या रगड़ पड़नेके कारण होनेवाली भयं-
कर शोथवेदना शान्त हो जाती है । इसी तरह इसको इन्द्रलुप्त (बालों का उड़ना)
तत्तत् अङ्गों में होनेवाले पक्षाघात, भयंकर गृध्रसीपीड़ा तथा तीव्र प्रकार का अव-
बाहुक वातव्याधि रोग में इसके प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । यदि गुञ्जा-
बीजों को समभाग चित्रकमूलत्वक् में मिलाकर जल से बारीक पीसकर श्वेत कुष्ठ
के दानों पर लेप किया जाय तो वे कुछ दिनों में नष्ट हो जाते हैं ॥४५४-४५६॥
प्रथमं गुञ्जाद्यतैलम्
गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं कल्कीकृतमनुत्तमम् ।
तिलतैलं भृङ्गराजपत्रनिर्यासकं तथा ॥४५७॥
चतुर्गुणोत्तरं चैव मानमेषां प्रकल्पयेत् ।
तैलपाकविधानेन तैलमेभिस्तु साधितम् ॥४५८॥
निहन्त्यभ्यङ्गयोगेन कण्डूकुष्ठादिकामयान् ।
तथा दारुणकं हन्ति विविधां वातवेदनाम् ॥४५६॥
गुञ्जाद्यं तैलमाद्यम् । गुञ्जाबीजानि शिलापिष्टानि पलैकमितानि, तिलतैलस्य
चत्वारि पलानि, भृङ्गपत्रस्य षोडशपलानि । यथाविधि पाचितं कण्डूकुष्ठादिहारि ।
दारुणकं केशभूमिरोगविशेषः “दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपाट्यते ।
कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम्” इत्युक्तलक्षणः ॥४५७-४५६॥
भा.टी.—एक भाग गुञ्जाबीज लेकर इनको सिल पर जल के साथ पीस
कर कल्क (लुगदी-सी) बना लें । तिलतैल चार भाग लें, भांगरे के पत्तों का
स्वरस सोलह भाग लें । अब इन तीनों को एक बड़े चौड़े मुख के पात्र में एकत्र
मिला चूल्हे के ऊपर रखकर स्नेह-साधन-विधान के अनुसार पकाकर तैल सिद्ध
कर लें । इसको गुञ्जादि तैल कहते हैं । यह तैल शरीर पर मलने से कण्डू
कुष्ठ आदि त्वग्रोगों तथा शिर के दारुणक (गंज) रोग और विविध प्रकार
की वातिक पीड़ाओं को शान्त करती है ॥४५७-४५६॥
द्वितीयं गुञ्जाद्यतैलम्
गुञ्जाबीजशिफाभिस्तु तैलं द्विगुणवारिणा ।