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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 733

७०८ रसतरङ्गिणी
नवं विशुद्धं जैपालं युगतोलकसंमितम् ।
आदाय वारत्रितयं त्रिवृत्क्वाथेन भावयेत् ॥३३०॥
निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटिका रक्तिकोन्मिताः ।
जलोदरारिर्नाम्नायं रसः ख्यातो भिषग्वरैः ॥३३१॥
रसोऽयं रेचनकरो जलोदरहरस्तथा ।
विरेकस्तम्भनार्थञ्च हितं दध्योदनं मतम् ॥३३२॥
अथ जलोदरारिः—रविलोहं ताम्रम् । जयपालं युगतोलकसम्मितमिति
द्वितोलकम् ॥ ३२६-३३२ ॥
भा.टी.—पञ्चामृतीकरण क्रिया युक्त ताम्रभस्म, पिप्पलीचूर्ण, शुद्ध पारद,
शुद्ध गन्धक, कालीमिर्चचूर्ण, हरिद्राचूर्ण, प्रत्येक एक-एक तोला लेवें । नूतन
और शुद्ध जयपालमज्जा दो तोला लेकर पहिले पारद गन्ध की कज्जली
बना लें । फिर इसमें अन्य द्रव्य मिलाकर त्रिवृत्क्वाथ की तीन भावना देवें ।
अन्त में गोली बनाने योग्य होने पर एक-एक रत्ती की गोली बना लें । इसको
वैद्य लोग जलोदरारि रस कहते हैं । इस रस के सेवन करने से विरेचन होकर
जलोदर रोग नष्ट होता है । यदि इसके सेवन से अधिक दस्त आ रहे हों और
उनको रोकना हो तो रोगी को दही और भात पथ्य में देना चाहिए ॥३२६-३३२॥
ज्वरारिरसः
हिंगुलं पिप्पली शुण्ठी मरिचं विश्वभेषजम् ।
सौभाग्यममृतं धात्री पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ३३३ ॥
जयपालं पलमितं नवं सुविमलीकृतम् ।
सम्पेण्यार्द्रकयोगेन वटीं गुञ्जैकसंमिताम् ॥ ३३४ ॥
निर्मापयेत्प्रयत्नेन ज्वरारिर्नामतो मतः ।
समाख्यातो विशेषेण नवज्वरनिबर्हणः ॥ ३३५ ॥
ज्वरारिरसः—सौभाग्यं टङ्कणम् , अमृतं वत्सनाभः, धात्री आमलकी । नव
जयपालमिति पुरातनं हि न तथा गुणकरम् ॥ ३३३-३३५ ॥
भा.टी.—शुद्ध हिंगुल, पिप्पलीचूर्ण, शुण्ठीचूर्ण, मरिचचूर्ण, सोंठचूर्ण,
सुहागा, शुद्ध वत्सनाभ, आँवलाचूर्ण प्रत्येक एक-एक तोला लें । शुद्ध जयपाल-
बीजचूर्ण एक पल मात्रा में लेवें । इन सबको एकत्र खरल में अदरक के साथ
पीसकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । इसको ज्वरारिरस कहा जाता है ।
यह रस नवज्वर को नष्ट करता है ॥ ३३३-३३५ ॥