रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 732, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७०७
इच्छाभेदी रसोऽयं तु नामतः परिकीर्तितः ॥३२३॥
शीततोयेन वटिकां सार्द्धगुञ्जैकसंमिताम् ।
मृदुकोष्ठे नागरिके सितया विनियोजयेत् ॥३२४॥
क्रूरकोष्ठेषु शूरेषु ग्रामीणेषु तु कोविदः ।
प्रयुञ्जीत सितोपेतां वटीं गुञ्जाद्वयोन्मिताम् ॥३२५॥
वटीं भुक्त्वा जलं शीतं यावद्वारं तु पीयते ।
तावद्वारं विरिच्यन्ते मनुजा नात्र संशयः ॥३२६॥
विरेचननिवृत्यर्थं काममुष्णोदकं पिबेत् ।
विरेकान्ते प्रयोक्तव्यं पथ्यं तक्रोदनं खलु ॥३२७॥
प्रशान्तरेचनः पुमान् प्रयत्नतस्तु यामकम् ।
पिबेन्न शीतलं जलं विरिच्यते पुनर्यतः ॥३२८॥
इच्छाभेदी रसः—विश्वभेषजं शुण्ठी । नागरिके नगरनिवासिनि । यावद्-
वारन्तु शीतं जलं पीयते तावद्वारं विरेकः प्रभावात् । कामं यथेष्टम्
॥ ३२१–३२८ ॥
भा.टी.—शुद्ध सुहागा, कालीमिर्चचूर्ण, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सोंठ
चूर्ण, प्रत्येक एक-एक तोला लेवें और शुद्ध जयपालबीजमज्जा तीन तोला
लेवें । पहिले पारद गन्धक को कज्जली बनाकर उसमें शेष द्रव्यों को डाल-
कर जल के साथ घोटकर इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । इसको
इच्छाभेदी रस नाम से कहा जाता है । मृदु कोष्ठवाले नागरिक मनुष्य को
इस रस की डेढ़ रत्ती मात्रा खांड और शीतल जल के साथ देवें । क्रूर कोष्ठी
( सख्त मेदावाला ) और बलवान ग्रामीण मनुष्य को इसकी दो रत्ती मात्रा
खांड मिलाकर देनी चाहिए । इस रस की गोली खाकर ठंडा पानी जितनी
बार पिलाया जायगा उतनी ही बार मनुष्य को दस्त आते हैं। यदि दस्त
रोकने हों तो रोगी को पर्याप्त गरम जल पिला देना चाहिए । इसके द्वारा
विरेचन पर पथ्य में तक्र के साथ भात खिलाना चाहिए । विरेचन आने और
बन्द होने के बाद तीन घण्टे तक शीतल जल पीने में पूर्ण परहेज करना
चाहिए; अन्यथा फिर दस्त होने का भय रहता है ॥३२१–३२८॥
जलोदरारिरसः
सुमृतं रविलोहञ्च पिप्पली रसगन्धकम् ।
मरिचं रजनी चूर्णं पृथक् तोलकसंमितम् ॥३२६॥