रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७०९
अञ्जनभैरवरसः
सूतगन्धकणाटङ्कं पृथगेकैकभागिकम् ।
जयपालं सुविमलं सर्वषामर्द्धभागिकम् ॥ ३३६ ॥
आद्राय निम्बुकद्रावैः पेषयेदतियत्नतः ।
छायायामथ संशोष्य काचकूप्यान्तु विन्यसेत् ॥ ३३७ ॥
रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना ह्यञ्जनभैरवः ।
अञ्जनाद्विनिहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ३३८ ॥
भा.टी.—शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, पिप्पलीचूर्ण, सुहागा; प्रत्येक एक-एक
भाग लें । शुद्ध जयपालबीजचूर्ण सबका आधा भाग लेवें । पहिले पारे
और गन्धक की अच्छी तरह कज्जली बनायें, फिर इसमें अन्यद्रव्यों को मिला-
कर निम्बूस्वरस के साथ खूब अच्छी तरह से मर्दन करके छाया में सुखाकर इस
चूर्ण को एक कांच की शीशी में भरकर रख लें । इसका नाम अञ्जनभैरव
रस कहा जाता है । इस रस को सन्निपात रोगी के नेत्रों में अञ्जन करने से
सन्निपात में आराम आता है ॥ ३३६-३३८ ॥
वृश्चिकविषहरः प्रलेपः
जलपिष्टस्तु जैपालो यत्नतः परिलेपितः ।
विषं वृश्चिकदंशोत्थं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ३३६ ॥
वृश्चिकविषहरः प्रलेपः—यत्नतः परिलेपित इति यावत् दंशस्थानं तावदेव
प्रदेशमभिव्याप्येत्यर्थः ॥ ३३६ ॥
भा.टी.—जयपालबीज को पत्थर में जल के साथ घिसकर इसका वृश्चिक
( बिच्छू ) दंश पर लेप करने से दंश की पीड़ा मिट जाती है ॥ ३३६ ॥
जयपालयुक्तयोगानां निषेधः
बाले वृद्धे कृशे क्षीणे गर्भिण्याञ्च गुदामये ।
प्रवाहिकायां शोथे च त्वामपक्वाशयाश्रिते ॥ ३४० ॥
गुदभ्रंशे चान्त्रशोथयुते बद्धगुदोदरे ।
तथान्त्रच्छ्रदशोथे च जयपालं न योजयेत् ॥ ३४१ ॥
जयपालयुक्तयोगानां विशेषतो निषेधः प्रचीनानुक्तोऽपि अज्ञमतिमलमोषाय
मान्यैराम्नातः, मा भूद् बालादिषु जयपालयोगात् व्यापद्भयमिति ॥३४०, ३४१॥
भा.टी.—जयपाल अथवा जयपाल के योगों को छोटे-छोटे बच्चे, बूढ़े,
कृश तथा क्षीण मनुष्यों को, गर्भिणी स्त्री, बवासीर, प्रवाहिका पीड़ितों को तथा