रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधारण्यव्यावर्तनेन सम्भोगचिह्नोद्घाटनायाधर इति विशिष्य ग्रहणम्।
उत्तरोष्ठे सरागेऽधरोष्ठमात्रस्य निर्मृष्टरागता चुम्बनकृतैव' इत्यादिना
'इदमपि ध्वनेरुदाहरणम्' इत्यन्तेन संदर्भेण । 'तटादिघटिता वाक्यार्थाः
स्नानव्यावृत्तिद्वारा संभोगाङ्गानामाश्लेषचुम्बनादीनां प्रतिपादनेन प्रधान-
व्यङ्ग्यव्यञ्जने साहायकमाचरन्ति' इति ।
तदेतदलङ्कारशास्त्रतत्त्वानवबोधनिबन्धनम्, प्राचीनसकलग्रन्थविरुद्धत्वा-
दुपपत्तिविरोधाच्च । तथा हि पञ्चमोल्लासशेषे 'निःशेषेत्यादौ गमकतया
यानि चन्दनच्यवनादीन्युपात्तानि तानि कारणान्तरतोऽपि भवन्ति ।
मीमांसायां 'दूरम्', 'पुलकिता' 'मिथ्यावादिनि' इत्येतेषामपि व्यङ्ग्यानुगुणत्वमुक्त्वो-
पसंहृतं निर्दिशति—इदमपीत्यादि । दीक्षिताशयमुपसंहरति — तटादिघटिता
इत्यारभ्य आचरन्ति इत्यन्तेन ।
दीक्षितमतं निरस्यति—तदेतदित्यादि सन्दर्भेण । निराकरणे हेतुद्वयमुक्तम्—
प्राचीनसकलग्रन्थविरुद्धत्वमुपपत्तिविरुद्धत्वं च । तत्राद्यमुपपादयति— तथाहीत्या-
से नहीं । किन्तु वापी में देर तक शरीर-मर्दनपूर्वक स्नान करने से भी ओष्ठों की
लालिमा मिट सकती है, केवल सम्भोग से नहीं । अतः यह सम्भोगमात्र से मिटी
है—इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए केवल अधरोष्ठ की लालिमा का पूरी तरह
मिटना बताया गया है । यदि यह वापी-स्नान से मिटी होती तो दोनों ओष्ठों की,
केवल अधरोष्ठ की नहीं। उत्तरोष्ठ (ऊपर की ओठ) की लालिमा ज्यों की त्यों बनी
रहे पर अधरोष्ठ की मिट जाय—यह तो केवल सम्भोगकालिक गाढ़ चुम्बन या
अधर-पान से हीं सम्भव है, वापी-स्नान से नहीं ।......अतः यह भी ध्वनिकाव्य का
एक उदाहरण है ।'' इसी प्रसंग में उन्होंने यह भी कहा है—''तट आदि से विशिष्ट
विशेषण-वाक्यों के अर्थ, उक्त रीति से, इन सारे लक्षणों की वापी-स्नान से उत्पन्न
होने की सम्भावना का निराकरण करते हुए और गाढ़ आलिङ्गन, चुम्बन तथा
अधर-पान आदि सम्भोगचिह्नों को प्रकट करते हुए 'रमण करने के लिए उसके पास
हीं गई थी' इस मुख्य व्यङ्ग्यार्थ की व्यञ्जना में सहायता करते ।''
किन्तु अप्पय्य दीक्षित का उक्त मत अलङ्कारशास्त्रीय तत्त्व के अज्ञान से उत्पन्न
होने से अनुचित है, क्योंकि यहतो सभी प्राचीन काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों से भी विरुद्ध है
और युक्ति से भी। काव्यप्रकाशकार ने पञ्चम उल्लास के अन्त में कहा है—''निश्शेष-
च्युतचन्दनम्......''आदि पद्य में जिन चन्दनच्युति आदि लक्षणों को व्यञ्जना का
अनुमान में अन्तर्भाव करने वाले महिम भट्ट व्यङ्ग्यार्थ के अनुमापक हेतु मानते वे
चिह्न तो अन्य कारणों से भी हो सकते, क्योंकि इसी पद्य में इन्हें वापी-स्नान से