रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यङ्ग्यत्वम् । अमुमेव च प्रभेदं ध्वनिमामनन्ति ।
यत्तु चित्रमीमांसायामप्पय्यदीक्षितैः 'निःशेषच्युतचन्दनम्' इति पद्यं
ध्वन्युदाहरणप्रसङ्गे व्याख्यातम्—'उत्तरीयघर्षणेन चन्दनच्युतिरित्यन्यथा-
सिद्धिपरिहाराय निःशेषग्रहणम् । ततश्चन्दनच्युतेः स्नानसाधारण्यव्यावर्तनेन
संभोगचिह्नोद्घाटनाय तटग्रहणम् । स्नाने हि सर्वत्र चन्दनच्युतिः स्यात्,
तव स्तनयोस्तटउपरिभाग एव दृश्यते । इयमाश्लेषकृतैव । तथा निर्मृष्ट-
रागोऽधर इत्यत्र ताम्बूलग्रहणविलम्बात्प्राचीनरागस्य किंचिन्मृष्टतेत्यन्यथा-
सिद्धिपरिहाराय निर्मृष्टराग इति रागस्य निःशेषमृष्टतोक्ता । पुनः स्नान-
व्यञ्जकस्याऽसन्दिग्धत्वमव्यभिचरितत्वमप्पय्यदीक्षितोक्तं निराकर्तुं प्रथमं
तन्मतमाह-यत्त्वित्यादिना । यत्त्वित्यस्य तदेतदलङ्कारशास्त्रतत्त्वाऽनवबोधनिबन्धन-
मित्यनेनान्वयः । चन्दनच्युतिः स्नानेनाऽपि सम्भवति संभोगेन चेति तस्याः स्नान-
साधारण्यम् । तद्व्यावर्त्तनाय सम्भोगमात्रजन्यच्युतिप्रतिपादनाय च तटग्रहणमित्याह-
स्नाने हीत्यादि । तट इत्यस्यैव विवरणमुपरिभाग इति । आश्लेषः = करमर्दनम् ।
'चाऽऽमृष्टरागो' इत्यनुक्त्वा 'निर्मृष्टरागो' इत्युक्तौ निर्मृष्टपदप्रयोगस्य प्रयोजन-
माह—तथेत्यादिना । निःशेषेण मृष्टो रागस्ताम्बूलचर्वणे विलम्बेन न सम्भवतीति
निर्मृष्टकथनेन तज्जन्यत्वनिरासः । एवमपि स्नानेन निर्मृष्टरागतायाः सम्भवा-
तस्याः स्नानसाधारण्यमिति तन्निरासाय सम्भोगकृतत्वमात्रसमर्थनाय च व्याचष्टे—
पुनः स्नानेत्यादिना । अस्यैवोपपादनम्—उत्तरोष्ठ इत्यादि । एवमेव चित्र-
चित्रमीमांसा में अप्पय्य दीक्षित ने ध्वनि का उदाहरण देते समय 'निश्शेषच्युत-
चन्दनं स्तनतटम्' आदि पद्य भी उद्धृत किया है। इसकी व्याख्या उन्होंने इस
प्रकार की है—
"(स्तनों से) चन्दन का मिटना तो दुपट्टे के घर्षण से भी सम्भव है। अतः 'पूर्ण-
रूप में (निश्शेष) चन्दन का मिटना' कहा गया है। किन्तु पूर्णरूप में चन्दन का मिटना
वापी-स्नान से भी हो सकता है। अतः 'यह सम्भोग से ही मिटा है' इस तथ्य को
स्पष्ट करने के लिए स्तनों से नहीं अपितु केवल उनके 'तटों, अर्थात् 'ऊपरी हिस्सों'
से चन्दन का मिटना बताया गया है। स्नान से यदि चन्दन मिटा होता तो पूरे स्तनों
से वह पूरी तरह धुल गया होता न कि केवल उनके ऊपरी भागों से । अतः ऊपरी
भाग मात्र से चन्दन मिटने के वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि यह कार्य सम्भोग-
कालिक गाढ़ आलिङ्गन से हुआ है; वापी-स्नान से नहीं । इसी तरह 'निर्मृष्टरागो-
ऽधरः' (अधरोष्ठ की लालिमा पूरी तरह मिट चुकी है) इस अंश में लालिमा का पूरी
तरह मिट जाना इसी लिए कहा गया कि उसका थोड़ा सा मिटना (फीका पड़ जाना)
तो पान खाने में विलम्ब होने से भी सम्भव है, केवल सम्भोगकालिक गाढ़ चुम्बन