रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ रसगङ्गाधरः
अत्र घूर्णितासीदित्यनेनासमीक्ष्यकारिन् ! किमिदमनुचितं कृतवानसीत्यर्थसंब-
लितोऽमर्षश्चर्वणाविश्रान्तिधामत्वात्प्राधान्येन व्यज्यते । तत्र शब्दोऽर्थश्च
गुणः ।
यथा वा—
तल्पगतापि च सुतनुः श्वासासङ्गं न या सेहे ।
संप्रति सा हृदयगतं प्रियपाणिं मन्दमाक्षिपति ॥
प्रिया मया कमलकोरकेण मन्दं निहता सती मामवलोक्य तथा घूर्णितयुक्ताऽभूद्
यथा तस्या घूर्णितं मुखदिग्वपरिवर्तनमीषत्कुण्डलवत्ताण्डवयुक्तकुटिलभ्रूलतिकमासी-
दिति पद्यार्थः । अत्र सविशेषणघूर्णितत्वेन किमिदमनुचितमित्यादि व्यङ्ग्यम्, तेन
च वस्तुस्वरूपव्यङ्ग्येनान्ततोऽमर्षो नायिकाया व्यज्यते । अर्थसम्बलिकः = उक्त-
व्यङ्ग्यार्थव्यङ्ग्यत्वेन तद्विशिष्टः । तत्र परमव्यङ्ग्यभूतेऽमर्षे नायिकानिष्ठे। अर्थः =
वाच्यः प्रथमव्यङ्ग्यश्च । गुणः = गुणीभूतः । सोऽयममर्षस्य प्राधान्येन व्यङ्ग्यत्वाद्
भावध्वनिः ।
सम्प्रति विप्रलम्भशृङ्गाराख्य रसध्वनिमुदाहरति—तल्पगतेति । सुतनुः = सुकु-
मारतनुः । अयमेव हेतुः श्वासासांगाऽसहने । अत एव च नववधूरित्यनेन विवरणं
कमल की कली से धीरे से ठोकर मार दी तो (क्रोध के कारण) उसने एक नजर
मेरे ऊपर डाली और झट से अपना मुंह मोड़ लिया। नजर डालते समय उसके कानों
के दोनों कुण्डल कुछ हिल गए थे और भौंहें टेढ़ी हो गई थीं ॥”
इस पद्य में जो ‘झट से मुँह मोड़ लेने’ की बात कही गई है उससे नायिका का
‘हे अविवेकपूर्ण कार्य करने वाले प्रियतम ! तुमने यह अनुचित कार्य क्यों किया”
यह आक्रोश अभिव्यक्त होता । यतः यह क्षणिक आक्रोश क्षणिक अमर्ष (=क्रोध)
के बिना सम्भव नहीं अतः इस व्यङ्ग्य आक्रोश से इसके कारणीभूत अमर्ष की
मुख्य रूप में व्यञ्जना होती और (यही) सहृदयों का परमास्वाद्य—चर्वणाविषय
है । इस अमर्ष के प्रति व्यञ्जक शब्द, उसका वाच्यार्थ और आक्रोशस्वरूप
प्रथम व्यङ्ग्यार्थ ये सब के सब गुणीभूत हैं। अतः यह भावध्वनिस्वरूप उत्तमोत्तम
काव्य का उदाहरण है ।
अब उत्तमोत्तम काव्य का रसध्वनिस्वरूप तृतीय उदाहरण प्रस्तुत है—
“जो कोमल शरीर वाली नवोढ़ा शय्या पर लेटी रहने पर भी अपने प्रियतम
के श्वास के सामान्य आघात को भी न सह पा रही थी वही पितृगृह जाने की
पूर्वरात्रि में अपनी छाती पर रखे गए पति के हाथों को धीरे-धीरे हँटा रही है ॥”