रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ रसगङ्गाधरः
तया प्रतीतायां तस्यां मुख्यवाक्यार्थत्वायोगात् । न च दरमील-
न्नयनात्वविशिष्टनिरीक्षणं विधेयमिति नानुवाद्यतावच्छेदकत्वं तस्या इति
वाच्यम् । एवमपि नयनगतदरमीलनस्य तत्कार्यत्वेऽपि दरमील-
न्नयनात्वविशिष्टनिरीक्षणस्य रतिमात्रकार्यत्वात् । त्रपाया एव मुख्य-
त्वेन व्यङ्ग्यत्वे निरीक्षणोक्तेरनतिप्रयोजनकत्वापत्तेः । वाच्य-
व्यङ्ग्यत्वम् = ध्वनित्वम् । अनुवाद्यतावच्छेदकतयेति । निरीक्षणकर्त्र्या दयिताया
अनुवाद्यत्वम् उद्देश्यत्वम्, तत्कर्तृकदयितमुखाम्बुजस्य निरीक्षणं च विधेयम् । तत्र
दरमीलनयना दयितेति बोधाद्दरमीलनयनात्वव्यङ्ग्यत्रपाया अनुवाद्यविशेषण-
तयेत्यर्थः । तथा चास्या न वाक्यार्थे प्राधान्यम्, विधेयस्यैव तत्र प्राधान्यादित्याह--
मुख्येत्यादि । कथं निरीक्षत इति जिज्ञासायां दरमीलनयना यथा स्यात्तथेत्यादि-
रीत्या त्रपायास्तद्व्यङ्ग्यायाः कथञ्चिद्विधेयनिरीक्षणक्रियाविशेषणत्वं स्वीकृत्य सत्रपं
निरीक्षत इत्यर्थकरणेन कथं त्रपाया न प्रधानव्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्कां निराचष्टे--
नचेत्यादिना । तावताऽपि तथानिरीक्षणस्याऽन्यथानुपपत्त्या तत्कारणत्वेन रतेरवश्य-
व्यङ्ग्यतया तस्या एव प्रधानत्वं युक्तमिति समाधत्ते--एवमपीत्यादिना । तत्कार्य-
त्वेऽपि = त्रपाकार्यत्वेऽपि । अनतिप्रयोजनकेत्यादि । विनापि निरीक्षणंद रमीलन-
मात्रेण स्वकार्येणेव त्रपाया व्यञ्जनान्निरीक्षणस्य नैरर्थक्यापत्तेरित्यर्थः । रतिर्हि
अर्थात् उद्देश्य, दयिता का विशेषण = अनुवाद्यतावच्छेदक है, इस लिए व्यङ्ग्य
त्रपा भी उसी अनुवाद्य का विशेषण है । वाक्यार्थ में मुख्यविशेष्यता विधेयनिष्ठ
होती । अनुवाद्य तो गौण होता । अतः उसका विशेषण त्रपा भी गौण होगी ।
गौण व्यङ्ग्यार्थ में चमत्कारजनकता यदि हो भी तो भी उसे 'ध्वनि' नहीं कहा जा
सकता । अतः त्रपा मुख्य व्यङ्ग्य—ध्वनि—नहीं है । 'उस प्रकार देख रही है जिससे
उसके नेत्र अर्धमीलित हो गए हैं' इस रीति से दरमीलनयनात्व तथा उसके व्यङ्ग्य
त्रपा को निरीक्षणस्वरूप विधेय का विशेषण (=विधेयतावच्छेदक) मानकर भी
त्रपा को मुख्य व्यङ्ग्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस पक्ष में भी रति को व्यंग्य
मानना ही होगा जिससे त्रपा में मुख्यता नहीं आ सकती । कारण यह है कि नेत्र का
अर्धमीलित होना तो त्रपा से भी सम्भव है किन्तु अर्धमीलित नेत्रयुक्त होकर प्रियतम
का निरीक्षण तो रतिमात्र से सम्भव है, विना उसके नहीं । अतः वाच्य तादृश-
निरीक्षण की उपपत्ति के लिए रति को व्यङ्ग्य कहना हीं होगा । फिर तो त्रपा मुख्य
व्यङ्ग्य हो नहीं सकती, क्योंकि वैसा मानने पर निरीक्षण के बिना हीं नेत्रों के
अर्धमीलनमात्र से व्यङ्ग्य त्रपा के लिए और अन्य व्यङ्ग्य के अभाव
में उसके लिये भी पद्योक्त निरीक्षण की कोई आवश्यकता न होने से वह निरर्थक