सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

च्छिन्नत्वात्। पापविशेषस्य तत्र प्रतिबन्धकत्वकल्पनाद्वा न दोषः।
प्रतिबन्धकाभावस्य च कारणता समुदितशक्त्यादित्रयहेतुतावादिनः
शक्तिमात्रहेतुतावादिनश्चाविशिष्टा। प्रतिवादिना मन्त्रादिभिः कृते कतिपय-
दिवसव्यापिनि वाक्स्तम्भे विहितानेकप्रबन्धस्यापि कवेः काव्यानुदयस्य
दर्शनात्॥


प्यदृष्टं कल्प्यमेवेत्याह—पापेत्यादि। वाशब्दोऽत्र समुच्चये। प्रतिभाऽनन्तरं काव्य-
निर्माणविलम्बेऽप्यैषैव गतिः। एतावतोक्तान्वयव्यभिचारप्रदर्शनमुखेन कार्यात्यन्ताभावेन
कार्यविलम्बेन च जनकीभूताऽदृष्टाऽभावतदुद्बोधविलम्बसाधनद्वारेणादृष्टव्युत्पत्त्य-
भ्यासत्रितयसाधारणमेव प्रतिभाकारणत्वं पर्यवस्यतीति पूर्वपक्षिण आकूतं निरस्तं
वेदितव्यम्, प्रतिभाऽत्यन्ताभावे कारणीभूतव्युत्पत्त्यभ्यासाभावकल्पनेन प्रतिभाविलम्बे
चादृष्टविशेषस्य प्रतिबन्धकत्वकल्पनेनैवोपपत्तावदृष्टस्य तत्रापि कारणत्वकल्पने
गौरवादिति निष्कर्षः। जनकत्वेनेदृशस्थलेऽदृष्टकल्पनाऽयुक्तत्वेऽपि प्रतिबन्धकी-
भूताऽदृष्टकल्पनमुभयसम्मतत्वात् प्रामाणिकत्वाच्च न गौरवपराहतमित्याह—
प्रतिबन्धकाऽभावस्येत्यादिना। शक्तिः = अदृष्टम्। यद्वाऽदृष्टाऽसहकृतत्वरूपमेव
वैलक्षण्यम्, तच्चैवंविधस्थलेऽपीति कारणतावच्छेदकावच्छिन्नयोर्व्युत्पत्त्यभ्यास-
स्वरूपयोः कारणयोः सद्भावेऽपि कथं न प्रतिभोत्पत्तिरित्यत्रोपपत्तिमाह—
पापविशेषस्येत्यादि। शेषं कृतव्याख्यानम् ॥


अनुमान की, जो तादृशवैलक्षण्य को मानने मे साधक प्रमाण और न मानने में
बाधक प्रमाण होता, तो कोई सङ्गति ही नहीं। इस प्रकार, वैलक्षण्य-साधक प्रमाण
न होने से उक्त वैलक्षण्य का अभाव प्रमाणित हो जाता है। यदि कहीं व्युत्पत्त्य-
भ्यास के बाद बिलम्ब से प्रतिभा की उत्पत्ति होती तो वहाँ कार्योत्पत्तिप्रतिबन्धक
अदृष्ट की कल्पना कर विलम्ब का उपपादन करना चाहिए। प्रतिबन्धक के रहते
हुई कार्य की उत्पत्ति न होने से प्रतिबन्धकाऽभाव को भी प्रसिद्ध कारण के विशेषण
के रूप में (प्रतिबन्धकाभावविशिष्ट कारण) अथवा स्वतन्त्र रूप में एक कारण
मानना ही है। प्रतिबन्धकाभाव को कार्य का अन्यतम कारण तो शक्ति (= अदृष्ट),
व्युत्पत्ति और अभ्यास—इन तीनों को समुदित रूप में काव्य का कारण मानने
वाले पूर्वपक्षो को भी कहना ही होगा, क्योंकि उक्त कारणत्रय के रहने पर भी
मन्त्रादि द्वारा कुछ दिनों के लिए वाक्स्तम्भन कर दिये जाने पर अनेक महाकाव्यों
के रचयिता भी उतने दिनों तक काव्यनिर्माण नहीं कर पाते। इसकी व्याख्या
प्रतिबन्धकाभाव को कारण माने बिना असम्भव है। अतः उभयसम्मत एवं प्रामाणिक
होने से प्रतिबन्धकाभाव में कारणता मानने में कोई दोष नहीं रह जाता।