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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

२८ रसगङ्गाधरः
न च सतोरपि व्युत्पत्त्यभ्यासयोर्यत्र न प्रतिभोत्पत्तिस्तत्रान्वयव्यभिचार इति
वाच्यम् । तत्र तयोस्तादृशवैलक्षण्ये मानाभावेन कारणतावच्छेदकानव-
कश्चिद् दोषः । अन्वयव्यभिचारं निराचष्टे—न चेत्यादिना । मानाऽभावेनेति ।
बैलक्षण्यं प्रतिभोत्पादनानुकूलोऽतिशयविशेषः कार्यदर्शनानुमेयः, तद्विषयकानुमित्यभावेन ।
अयमर्थः—वैलक्ष्ण्यस्यातीन्द्रियत्वेन कयोर्व्युत्पत्त्यभ्यासयोस्तद्वैलक्ष्ण्यं वर्त्तत
इति निर्णयः कार्यहेतुकानुमानेनैव करणीयः। प्रकृते च प्रतिभास्वरूपकार्याऽभावेन तद-
नुमानं न प्रक्रमते । प्रमाणान्तरं चात्राऽसम्भवि । तथा च वैलक्षण्यसाधकप्रमाणाऽभावे
न तादृशं वैलक्षण्यं तथाविधव्युत्पत्त्यभ्यासयोः प्रसिध्यति । कारणतावच्छेदकाऽभावे
च कारणतैव तादृशव्युत्पत्त्यभ्यासयोर्नास्तीति तत्र प्रतिभाऽनुत्पत्तिरिष्टैवेति नान्वय-
व्यभिचारः, कारणत्वाऽभिमताऽभावे कार्यत्वाऽभिमताऽभावस्येष्टत्वादिति । यत्र
पुनर्व्युत्पत्त्यभ्यासयोर्विलम्बेन प्रतिभोत्पत्तिस्तत्र दृष्टाऽभावे जनकत्वप्रतिबन्धकं किम-
ही क्रमशः हैं । प्रतिभाओं में रहने वाला प्रतिभात्व धर्म प्रतिभानिष्ठ काव्यनिरूपित
कारणता का अवच्छेदक है । वस्तुतः दो प्रतिभाओं से उत्पन्न काव्य भी द्विविध ही
होते । अतः प्रतिभाओं मे जैसे अदृष्टादिनिष्ठकारणतानिरूपित कार्यताओं के अव-
च्छेदक क्रमशः दोनो वैलक्षण्य होते उसी प्रकार प्रतिभाओं में जो काव्यनिष्ठकार्य-
तानिरूपित कारणताएं हैं उनके अवच्छेदक प्रतिभाद्वयनिष्ठ दोनों वैलक्षण्य ही क्रमशः
होते, उभयप्रतिभासाधारण प्रतिभात्व नहीं । इसी प्रकार उभयविध काव्यों मे जो
कार्यताएं हैं उनके अवच्छेदक भी क्रमशः उभयनिष्ठ वैलक्षण्यद्वय ही हैं, उभयकाव्य-
साधारण काव्यत्व नहीं । अब प्रश्न यह है कि जब व्युत्पत्ति शौर अभ्यास के रहने
पर भी प्रतिभा की उत्पत्ति नहीं होती तो ‘व्युत्पत्त्यभ्याससत्त्वेऽपि प्रतिभोत्पत्त्यभावः’
यह अन्वयव्यभिचार क्यों नहीं होता । इसके उत्तर मे यह कहा जा सकता है कि
कारणतावच्छेदक से अवच्छिन्न पदार्थ मे ही कारणता रहती है; व्युत्पत्त्यभ्यासनिष्ठ
प्रतिभाविशेषनिरूपित कारणता का अवच्छेदक, सभी व्युत्पत्ति-अभ्यासों से प्रतिभा
की उत्पत्ति न होने से, विशेष प्रकार के (=प्रतिभोत्पादनसमर्थ) व्युत्पत्त्यभ्यास-
निष्ठा वैलक्षण्य है; वह वैलक्षण्यस्वरूप कारणतावच्छेदक प्रतिभोत्पादन में असमर्थ
व्युत्पत्त्यभ्यास में नहीं रहता, अतः उसमे कारणता भी नहीं रहती; अत एव
प्रतिभा की उत्पत्ति उस व्युत्पत्त्यभ्यास से नहीं हो पाती । उक्त वैलक्षण्य के न
रहने मे कारण यही है कि उसके रहने मे कोई प्रमाण नहीं है । तात्पर्य यह है कि
वैलक्षण्य के भाव (अथवा अभाव) का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से हो नहीं सकता,
क्योंकि वैलक्षण्य अतीन्द्रिय है । अतः उसके भाव का निर्णय कार्यहेतुक अनुमान से
ही सम्भव है । प्रकृत स्थल मे जब कार्य उत्पन्न ही नहीं होता तो कार्यहेतुक