रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २५
नापि केवलमदृष्टमेव कारणमित्यपि शक्यं वदितुम् । कियन्तंचित्कालं
काव्यं कर्तुमशक्नुवतः कथमपि संजातयोर्व्युत्पत्त्यभ्यासयोः प्रतिभायाः
प्रादुर्भावस्य दर्शनात् । तत्राप्यदृष्टस्याङ्गीकारे प्रागपि ताभ्यां तस्याः
प्रसक्तेः । न च तत्र प्रतिभायाः प्रतिबन्धकमदृष्टान्तरं कल्प्यमिति
कल्प्यते = अनुमीयते (नैयायिकादिमतेन), अर्थापत्त्या वा प्रमीयते (मीमांसकमतेन) ।
जन्मान्तरीयं कारणमिति प्रकृताऽभिप्रायेण, परमार्थतस्त्वैहिकस्यापि कारणस्य
कल्पनं भवत्येव । तत्र च कारणीभूतकर्मादितत्फलयोरानन्तर्याभावे कारणत्वोपपादक-
मदृष्टमपि कल्प्यमेवेति बोध्यम् । तदुक्तमाचार्यैः—
चिरध्वस्तं फलायालं न कर्माऽतिशयं विना ॥ इति ।
अन्यथा = कारणाऽकल्पने । व्यभिचारो व्यतिरेकव्यभिचारः । यद्यप्यन्वयव्य-
तिरेकाभ्यां कारणत्वावधारणं न सर्वसम्मतम्, तथापि तद्व्यभिचारयोः प्रत्येकं कार-
णताग्रहविघटकत्वं सम्प्रतिपन्नमेव सर्वेषाम् । निर्णयो निश्चयः प्रकृते, न तु पक्षप्रति-
पक्षविमर्शपूर्वकमर्थावधारणम्, तत्र प्रमात्वव्यवस्थापनेन भ्रमत्वाऽयोगात् ।
एतावता प्रबन्धेन व्युत्पत्त्यभ्यासाऽसहकृतादृष्टस्य प्रतिभाकारणत्वं व्यवस्थाप्य
व्युत्पत्त्यभ्यामयोरदृष्टाऽसहकृतयोः प्रतिभाकारणत्वं निर्णतुकामः पूर्वपक्षं निरस्यति —
नापीत्यादीना । कारणमित्यतः परं प्रतिभामात्रस्येति शेषः । अशक्नुवत इत्यनेन
तदानीं प्रतिभाऽभाववर्णनमुखेन तज्जनकादृष्टाऽभावः सूचितः । अदृष्टस्य = प्रतिभा-
जनकादृष्टविशेषस्य । प्रसक्तेरिति । अभिमतकारणसत्त्वे कार्योत्पत्तेरवश्यम्भावा-
यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रतिभा सर्वत्र अदृष्ट से ही उत्पन्न होती,
क्योंकि जो व्यक्ति कुछ समय तक काव्यनिर्माण नहीं कर पाता उसमें भी किसी
प्रकार व्युत्पत्ति और अभ्यास करने से प्रतिभा की उत्पत्ति देखी जाती है ।
यहाँ अदृष्ट के बिना ही केवल व्युत्पत्ति और अभ्यास से प्रतिभा की उत्पत्ति से यह
स्पष्ट है कि सर्वत्र अदृष्ट ही प्रतिभा का कारण नहीं होता । यदि उस व्यक्ति में
व्युत्पत्त्यादि के पूर्व भी प्रतिभाजनक अदृष्ट होता तो पहले ही प्रतिभा उत्पन्न
हो जाती और वह काव्यनिर्माण कर लेता । व्युत्पत्त्यभ्यास के पूर्व उसमें प्रतिभा-
जनक अदृष्ट के रहते हुए भी प्रतिभा की उत्पत्ति नहीं हो पाती, क्योंकि उसमें
कारणीभूत अदृष्ट के साथ-साथ प्रतिबन्धकीभूत अदृष्ट भी रहता जिसके प्रभाव से
कारणीभूत अदृष्ट प्रतिभा का उत्पादन कर नहीं पाता; जब व्युत्पत्त्यभ्यास से प्रति-
बन्धकीभूत अदृष्ट का सामर्थ्य अथवा स्वयम् वह अदृष्ट नष्ट हो जाता तब उसमें
कारणीभूत अदृष्ट से प्रतिभा उत्पन्न हो जाती—यह कहना भी युक्त नहीं हैं, क्योंकि
वैसे अनेक व्यक्तियों में अदृष्टमात्रकारणतावादी को कारणीभूत अदृष्टों के अतिरिक्त
प्रतिबन्धकीभूत अदृष्टों की कल्पना (अनुमिति) भी करनी पड़ेगी। किन्तु यह कल्पना