रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २३
भ्यासौ । न तुत्रयमेव, बालादेस्तौ विनापि केवलान्महापुरुषप्रसादादपि
प्रतिभोत्पत्तेः । न च तत्र, तयोर्जन्मान्तरीययोः कल्पनं वाच्यम्, गौर-
पुरुषे च । अदृष्टादित्रितयसमुदिते प्रतिभाकारणत्वं निरस्यति- न तु त्रयमेवेति ।
अत्रैवकारेण क्वचित्केवलेनादृष्टेन क्वचिच्च त्रितयेन प्रतिभोत्पद्यत इत्यभ्युपेयम् ।
त्रितयघटकमदृष्टं च केवलादृष्टविलक्षणमेवेत्यपि नागेशमते बोध्यम् । पण्डितराज-
स्त्वदृष्टस्य तत्रैव कारणत्वं मन्यते यत्र दृष्टेन कारणेन प्रतिबन्धकाऽसमवहितेन
कार्योत्पादो न व्याख्येय इति नैतन्मते त्रितयं क्वचिदपि कारणं प्रतिभायाः । यत्र
च व्युत्पत्त्यभ्याससत्त्वेऽपि कार्याऽभावस्तत्र दृष्टं तदभावे चादृष्टं प्रतिबन्धकं
कल्पनीयम्, कार्योत्पादानुकूलव्युत्पत्त्यभ्यासाऽभावो वेत्यनुपदमेव व्यक्तीभविष्यति ।
त्रितयस्य कारणत्वाऽभावेऽदृष्टमात्रस्य च कारणत्वे युक्तिमाह—बालादेरित्या-
दिना । प्रसादादिति । प्रसादजन्यादृष्टादित्यर्थः । यद्यप्यदृष्टस्य सर्वत्र व्यापार-
रूपकारणत्वमेव, व्यापारेण च व्यापारिणो नाऽन्यथासिद्धिस्तथापि व्युत्पत्त्यभ्यासाऽ-
सहकृतत्वमात्राभिप्रायेण फलाऽयोगव्यवच्छेदेन वा केवलस्याऽदृष्टस्य प्रतिभाकारणत्व-
मुक्तं नाऽयुक्तमिति बोध्यम् । तत्र = बालादौ । जन्मान्तरीयव्युत्पत्त्यभ्यासकल्पनाऽभावे
उस काव्यकारणीभूत प्रतिभा का उत्पादक कहीं देवता या महापुरुष की कृपा
से अथवा तपस्या आदि से उत्पन्न विलक्षण अदृष्ट है । कहीं लौकिक एवं शास्त्रीय
व्युत्पत्ति और काव्यनिर्माण का अभ्यास ये दोनो मिलकर भी काव्यविशेषनिर्माण
के कारणीभूत प्रतिभा का उत्पादन करते । किन्तु ये दोनो प्रतिभाएँ भिन्न भिन्न
कारण से उत्पन्न होने से परस्पर-विलक्षण हैं । अतः इन दोनों प्रतिभाओं से उत्पन्न
काव्य भी परस्पर-विलक्षण ही होंगे, एक स्तर के नहीं । अदृष्ट, व्युत्पत्ति और
अभ्यास तीनों मिलकर प्रतिभा को उत्पन्न करते — यह तो माना नहीं जा सकता,
क्योंकि महापुरुष आदि के प्रसाद से उत्पन्न अदृष्ट मात्र से कुछ बाल-कवियों में
काव्य-निर्माणानुकूल प्रतिभा पाई जाती है। बाल-कवियों में वर्तमान प्रतिभा के कारण
अदृष्ट के साथ-साथ पूर्वजन्मजात व्युत्पत्ति और अभ्यास भी हैं—ऐसा कहना उचित
नहीं है । इसका एक कारण तो यह है कि पूर्वजन्मजात व्युत्पत्ति और अभ्यास के
प्रत्यक्ष सिद्ध न होने से उनकी सिद्धि हेतु प्रमाणान्तर की कल्पना करनी होगी, और
जन्मान्तरीय कर्म के अदृष्टद्वारा ही कारण होने से उक्त व्युत्पत्त्यादि से जन्य
अदृष्ट को भी व्यापार कारण के रूप मे मानना ही होगा । इससे इस पक्ष मे गौरव
दोष स्पष्ट है । दूसरे, उक्त स्थल मे व्युत्पत्त्यादि को भी अदृष्ट के साथ-साथ
प्रतिभा का कारण सिद्ध करने वाला कोई दृढतर प्रमाण है भी नही । प्रतिभा-
स्वरूप कार्य को हेतु मान कर उसके कारणीभूत व्युत्पत्त्यादि का अनुमान भी नहीं