रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ रसगङ्गाधरः
सिद्धो जातिविशेष उपाधिरूपं वाऽखण्डम्। तस्याश्च हेतुः क्वचिद्देवता-
महापुरुषप्रसादादिजन्यमदृष्टम्। क्वचिच्च विलक्षणव्युत्पत्तिकव्यकरणा-
स्वस्य सिद्धिः, ततश्च 'प्रतिभात्वं जातिः, नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वाद्' इत्यनुमानेन
तस्य जातित्वसिद्धिर्बोध्या। उपाधिर्वाऽखण्डमिति। यस्य निर्वचनं न सम्भवति
स उपाधिरखण्डः। तथा च विप्रतिपन्नत्वात् जातेस्तत्स्वरूपस्य च ये प्रकृतप्रतिभा-
निष्ठं प्रतिभात्वं जातिरूपं न मन्यन्ते तन्मतेनेदमखण्डोपाधिः। अयं च जातितुल्य-
योगक्षेमत्वात्कारणताया अवच्छेदकः। नौगेशभट्टास्तु समस्तमेवाखण्डोपाधिं जातिं
मन्वाना अखण्डमिति पाठं चिन्त्यं निर्दिशन्तः सखण्डमिति पाठमभिप्रयन्ति। यद्वा
तन्मते उपाधिमात्रस्य सखण्डत्वेनोपाधिर्वेत्येतावन्मात्रमेव पठनीयम्। एतन्मते च
चमत्कारप्रयोजकत्वं वैलक्षण्यं वाऽवच्छेदकमित्याद्यनुगमः कारणतायाः कर्त्तव्यः।
प्रतिभाहेतुं निरूपयति--तस्याश्चेत्यादिना। प्रतिभाया इत्यर्थः। क्वचित्=
व्युत्पत्त्यभ्यासरहिते पुरुषे। क्वचिच्च = अदृष्टाभावविशिष्टव्युत्पत्त्यभ्यासविशिष्टे
के रूप अनुमित एक जाति है। कारण में जो कारणता रहती वह कारणनिष्ठ
किसी अन्यूनानतिरिक्तवृत्ती धर्मान्तर से अवच्छिन्न होती है और वह धर्मान्तर उस
कारणता का अवच्छेदक होता है। जैसे-दण्ड घट का कारण है, अतः दण्ड मे
घटनिष्ठ कार्यता से निरूपित, कारणता है। उस कारणता का अवच्छेदक उससे
न्यून अथवा अधिक देश मे रहने वाला तद्दण्डत्व अथवा पृथिवीत्वादि नही हो
सकता, अपितु जितने में कारणता रहती उतने मे ही रहने वाला और उससे अधिक
मे न रहने वाला (अन्यूनानतिरिक्तवृत्ती) दण्डत्व नामक धर्म ही होता है। यह
दण्डत्व नित्य और अनेक ( सभी ) दण्डों मे समवाय सम्बन्ध से विद्यमान
(अनेकसमवेत) होने से जातिस्वरूप है। इसी तरह प्रतिभा मे जो काव्यनिरूपित
कारणता है उसका अवच्छेदक प्रतिभानिष्ठ कारणता से न्यूनदेश में अथवा अधिक
देश मे न रहने वाला प्रतिभात्व धर्म है और वह नित्य एवं सभी प्रतिभाओं मे
समवाय सम्बन्ध से विद्यमान होने से एक जाति है। किन्तु जाति का लक्षण
सभी शास्त्रों में एक नहीं है और अद्वैतवादी वेदान्ती तो जातिनामक कोई पदार्थ
मानते भी नहीं, क्योंकि उनके मत मे ब्रह्म से भिन्न सबके सब पदार्थ मिथ्या और
अनित्य हैं। अतः उक्त प्रतिभात्व को एक अखण्ड उपाधि, अर्थात् खण्डों में विभक्त
न होने वाला-निर्वचन के अयोग्य धर्म, भी कहा जा सकता है। नागेश भट्ट तो
किसी भी उपाधि को अखण्ड मानते हीं नहीं। अतः उनके अनुसार यह प्रतिभात्व
सखण्ड उपाधि है।