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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

प्रथमाननम् २१
भ्रमणानि कविभिर्वर्णितानि कपिबालादिविलसितानि च । न च तत्रापि
यथाकथंचित्परम्परया रसस्पर्शोऽस्त्येवेति वाच्यम् । ईदृशरसस्पर्शस्य
'गौश्चलति', 'मृगो धावति' इत्यादावतिप्रसक्तत्वेनाप्रयोजकत्वात् । अर्थ-
मात्रस्य विभावानुभावव्यभिचार्यन्यतमत्वादिति दिक् ॥
तस्य च कारणं कविगता केवला प्रतिभा । सा च काव्यघटनानु-
कूलशब्दार्थोपस्थितिः । तद्गतं च प्रतिभात्वं काव्यकारणतावच्छेदकतया
तन्नेत्यादिना खण्डनम् । परम्परयेति यथाकथञ्चिदित्यस्यैव विवरणम् । अङ्गरस-
विभावादितयाऽङ्गिरसस्पर्शित्वमत्र विवक्षितम् परम्परयेत्यनेन । स्वरसेन तु कपि-
विलसितादेरपि साक्षादेव सम्बन्धः । शेषं स्पष्टम् ॥
सम्प्रति लक्षितस्य कविकर्मणः काव्यस्य कारणं निरूपयति—तस्येत्यादिना ।
केवलेत्यनेन प्रतिभाया व्युत्पत्त्यभ्यासाऽसहकृतत्वं बोधयन् व्युत्पत्त्यभ्यासप्रतिभात्रितय-
पर्याप्तत्वं कारणत्वस्य निराचष्टे । लोकोत्तरवर्णनानिपुणताविशिष्टं काव्यं प्रति त्रित-
यस्य कारणत्वमित्यपरे । कविगतेत्यनेन प्रतिभायाः काव्यनिर्माणानुकूलतास्वरूप-
मुपलक्षणमाचष्टे । प्रतिभां वर्णयति—काव्येत्यादिना । अत्र यथावसरमिति
पूरणीयम् । कविगतेत्यनेन दर्शितं विवृणोति—तद्गतमिति । तत्पदेन प्रतिभा
ग्राह्या । कारणतावच्छेदकतयेति । अत्र प्रतिभानिष्ठा काव्यकारणता किञ्चि-
द्धर्माऽवच्छिन्ना, कारणतात्वात्, दण्डादिनिष्ठघटकारणतावदित्यनेन प्रयोगेण प्रतिभा-
हो जाएगी, क्योंकि उन्होंने अपने काव्यों में केवल रसोद्बोधक तत्त्वों का ही नहीं
अपितु जल-प्रवाह, वेग से गिरने, वेग से उछलने, चमत्कारपूर्ण भ्रमण, बन्दरों और
बालकों की आकर्षक लीलाओं का भी वर्णन किया ही है। ये साक्षात् रसोद्बोधक
तो हैं नहीं । ऐसी स्थिति में इन्हें अकाव्य कहना होगा, जो नितान्त अनुचित है।
ये वर्णन भी परम्परा रसोद्बोधक होने से काव्य हैं—यह मानने पर तो 'गौश्चलति'
आदि वाक्यों को भी काव्य कहना होगा, क्योंकि विश्व के समस्त पदार्थों के यथा-
सम्भव विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावों में किसी न किसी वर्ग में आ जाने
से सब में परम्परा रसोद्बोधकता है हीं। ऐसी स्थिति में 'गौश्चलति' आदि
वाक्यों का काव्यत्व मानना ही पड़ जाएगा । अतः साहित्यदर्पणकार का मत भी
उपादेय नहीं है ।
काव्य का हेतु प्रतिभामात्र है, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास से सहकृत प्रतिभा नहीं ।
उचित अवसर पर काव्यनिर्माण के लिए उपयोगी चमत्कारजनक पदार्थ और उसके
प्रतिपादक योग्य पद की कवि के ज्ञान में उपस्थिति को ही प्रतिभा कहते । उस
प्रतिभा मे रहने वाला प्रतिभात्व धर्म प्रतिभानिष्ठ काव्य की कारणता के अवच्छेदक