रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० रसगङ्गाधरः
अपि तस्यायोगात्। शौर्यादिवदात्मधर्माणां गुणानाम् हारादिवदुपस्कार-
काणामलंकाराणां च शरीरघटकत्वानुपपत्तेश्च।
यत्तु 'रसवदेव काव्यम्' इति साहित्यदर्पणे निर्णीतम्, तन्न। वस्त्व-
लंकारप्रधानानां काव्यानामकाव्यत्वापत्तेः। न चेष्टापत्तिः, महाकवि-
संप्रदायस्याकुलीभावप्रसङ्गात्। तथा च जलप्रवाहवेगनिपतनोत्पतन-
वृत्तित्वस्य प्रकृतानुपयोगात्, अन्यथा दोषयुक्तस्यापि काव्यत्वं प्रसक्तं भवेदिति नेष्टसिद्धि-
रनया शङ्कया। अत एव ग्रन्थकृताऽपि काव्यत्वस्याऽव्याप्यवृत्तित्वसमर्थको यो व्यव-
हारः 'इदं पद्यं पूर्वार्धे काव्यम् उत्तरार्धे तु न काव्यम्' इति तस्यैव निराकरणमनुभव-
विरुद्धतया कृतम्। दोषस्याव्याप्यवृत्ततानिराकरणं तु नार्थः, तथासति बहुव्याकोप इत्यलं
परपक्षदूषणोद्भावनेन। तस्येत्यनेन काव्यत्वं परामृश्यते। सन्दर्भश्च व्याख्यातप्रायः।
किञ्च श्रुतिकटुत्वादिदोषाणां सर्वांशेन काव्यनिघ्नत्वात्तत्र काव्यत्वस्याव्याप्यवृत्ति-
तामाश्रित्यापि दुष्टस्याऽकाव्यत्वाभ्युपगमोऽनुपपन्न इत्याद्यपि विभावनीयमत्र प्रसङ्गे।
सगुणादिपदप्रतिपाद्यं गुणादिवैशिष्ट्यमपि शब्दशरीरके काव्ये नोपपद्यत इत्याह—
शौर्यादिवदित्यादि। आत्मधर्माणामुपस्कारकाणां चेति द्वयमपि हेतुगर्भं विशेषणम्।
यतो गुणा आत्मधर्मा यतश्चालङ्कारा उपस्कारकत्वेन शरीरानवयवा अत एषां काव्य-
शरीरघटकत्वानुपपत्तिरित्यर्थः।
विश्वनाथोक्तं काव्यलक्षणं दूषयितुं प्रथममर्थतस्तदनुवदति—यत्त्वित्यादिना।
वृत्तित्व के¹ सिद्ध होने पर भी 'इदं पद्यमस्मिन्नंशे निर्दुष्टम् = काव्यम्, अंशान्तरे च
दुष्टम् = अकाव्यम्' इस प्रतीति के प्रामाणिक न होने से काव्य का अव्याप्यवृत्तित्व,
अर्थात् पद्य के निर्दुष्ट अंशमात्र मे काव्यत्व का अस्तित्व, सिद्ध नहीं होता। साथ
ही, शौर्य आदि के समान काव्य की आत्मा (व्यङ्ग्यार्थ) के धर्म गुणों और शरीर के
आगन्तुक शोभाधायक अलङ्कारों को काव्यशरीर के अङ्गभूत तत्त्व कहा भी नहीं
जा सकता।
साहित्यदर्पण में विश्वनाथ ने यह निर्णय किया है कि काव्य वहीं है जो रसवान्
हो, अर्थात् रसोद्बोधक हो। किन्तु यह निर्णय अयुक्त है क्योंकि तब तो वस्तुप्रधान
(जहाँ वस्तु व्यङ्ग्य हो) और अलङ्कारप्रधान (जहाँ अलङ्कार व्यङ्ग्य हो) जो काव्य
हैं वे उनके अनुसार काव्य न हो सकेंगे। वे काव्य हैं भी नहीं—यह तो कहा नहीं
जा सकता, क्योंकि वैसा कहने पर तो महाकवियों की वर्णन-परम्परा हीं उच्छिन्न
१. एक ही अधिकरण के किसी अंश में जिसका अभाव और दूसरे अंश मे भाव
हो उसे 'अव्याप्यवृत्ती' कहते। अव्याप्य = अपने अधिकरण के सर्वांश को
व्याप्त किये बिना, वृत्ती = रहने वाला पदार्थ जो हो।